बहुत परेशान रहते हैं लोग
जो चिट्ठाकारी नहीं समझते हैं
लेकिन चिट्ठा लेखन करने वाले पर
मिलकर बहस करते हैं
पड़ोसी का खरीदा हुआ
अखबार माँग कर पढ़ने वाले लोग
महीने के सौ दो सौ बचा कर
बहुत कुछ बाँचने का दावा करते हैं
शहर के लोग ना चिट्ठी जानते हैं
ना चिट्ठों से ही उनका कोई लेना देना है
उनकी परेशानी है
अखबार में आने से
रोक दी जा रही खबरों से
जो कहीं कहीं चिट्ठों में कुछ
गैर सरकारी लोग लिख ले जाते हैं
गौरी लंकेश हो जाते हैं
गोली खाते हैं मर जाते हैं
गौरी लंकेश एक बहाना है
लोग रोज मर रहे हैं
लिखने वाले नहीं
वो लोग जिनको पता है
वो क्या कर रहे हैं
शहर छोड़िये पूरे राज्य में
कितने चिट्ठाकार हैं जरा गिनिये
जरूरी है आप लोगों के लिये गिनना
कल कितने लोगों को गोली खानी है
कितने लोगों ने मरना है
कितने लोगों को
बस यूँ ही किसी झाड़ झंकार के
पीछे मरी हुई एक लाश हो कर तरना है
कितनों के नाम मजबूरी में
अखबार में छापे जायेंगे
‘उलूक’ ‘गौरी लंकेश’ हो जाना
सौभाग्य की बात है
तुझे पता है
सारे पूँछ कटे कुत्ते
पूँछ कटे कुत्ते के पीछे ही जाकर
अपनी कटी पूँँछ बाद में छुपायेंगे।
चित्र साभार: Asianet Newsable
'सरगोशीयों के स्वर' में मुद्रित25 पृ67
