उलूक टाइम्स: चराना
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सोमवार, 9 जून 2014

दुनियाँ है रंग अपने ही दिखाती है

भैंस के बराबर काले अक्षरों को
रोज चरागाह पर चराने की आदत
किसी को हो जाना एक अच्छी बात है

अक्षरों के साथ खेलते खेलते
घास की तरह उनको उगाना
शुरु हो जाना बहुत बुरी बात है

बिना एक सोच के
खाली लोटे जैसे दिमाग में शायद
हवा भी रहना नहीं चाहती है

ऐसे में ही सोच
खाली में से खाली खाली ही
कुछ बाहर निकाल कर ले आती है

उसी तरह से जैसे
किसी कलाकार की कूँची
किसी एक को
एक छोटा सा झाड़ू जैसा नजर आती है

साफ जगह होने से कुछ नहीं होता है
झाड़ने की आदत से मजबूर
सफाई 
को तक बुहारना शुरु हो जाती है

बहुत कुछ होता है
आसपास के लोगों के दिमाग में
और हाथ में भी
पर मंद बुद्धी का क्या किया जाये
वो अपनी बेवकूफियों के हीरों के सिवाय
कुछ भी देखना नहीं चाहती है

और क्या किया जाये
‘उलूक’ तेरी इस फितरत का
जो 
सोती भी है सपने भी देखती है
नींद में होने के बावजूद
आँखे 
पूरी की पूरी
खुली 
नजर भी आती हैं ।