भैंस के बराबर काले अक्षरों को
रोज चरागाह पर चराने की आदत
किसी को हो जाना एक अच्छी बात है
अक्षरों के साथ खेलते खेलते
घास की तरह उनको उगाना
शुरु हो जाना बहुत बुरी बात है
बिना एक सोच के
खाली लोटे जैसे दिमाग में शायद
हवा भी रहना नहीं चाहती है
ऐसे में ही सोच
खाली में से खाली खाली ही
कुछ बाहर निकाल कर ले आती है
उसी तरह से जैसे
किसी कलाकार की कूँची
किसी एक को
किसी एक को
एक छोटा सा झाड़ू जैसा नजर आती है
साफ जगह होने से कुछ नहीं होता है
झाड़ने की आदत से मजबूर
सफाई को तक बुहारना शुरु हो जाती है
सफाई को तक बुहारना शुरु हो जाती है
बहुत कुछ होता है
आसपास के लोगों के दिमाग में
और हाथ में भी
पर मंद बुद्धी का क्या किया जाये
वो अपनी बेवकूफियों के हीरों के सिवाय
कुछ भी देखना नहीं चाहती है
और क्या किया जाये
‘उलूक’ तेरी इस फितरत का
जो सोती भी है सपने भी देखती है
जो सोती भी है सपने भी देखती है
नींद में होने के बावजूद
आँखे पूरी की पूरी
खुली नजर भी आती हैं ।
आँखे पूरी की पूरी
खुली नजर भी आती हैं ।