अपने बच्चों को समझाने में
लगे हुऐ एक माँ बाप
उनको उनसे उनकी दिमाग की
खिड़की खोलने को कहते हुऐ
जोर लगा कर कुछ समझा रहे थे
लग नहीं रहा था कुछ ऐसा
जैसे बच्चे कुछ सुनना भी चाह रहे थे
माँ बाप बच्चों की तरफ देख कर
कुछ बोल रहे थे
बच्चे अपने घर के
पड़ोस के मकान की खिड़कियों की
तरफ देख कर मुस्कुरा रहे थे
खिड़कियों के बारे में
शायद माँ बाप से ज्यादा पता था उनको
घर से लेकर स्कूल तक जाते जाते
रोज ना जाने कितनी खिड़कियों को
खुलते बंद होते देखते हुऐ आ रहे थे
समझ रहे थे
स्कूल में गुरु लोग खिड़कियों को
खोलने की विधि का प्रयोग
प्रयोगशाला में करवाना चाह रहे थे
उसी बात को लेकर
घर के लोग घर पर भी
खिड़कियों की बात
कर कर के दिमाग खा रहे थे
सोच रहे थे समझ रहे थे
हिसाब किताब भी थोड़ा बहुत लगा रहे थे
पुराने मकानो की खिड़कियों की तुलना
नये मकानो की खिड़कियों से किये जा रहे थे
माँ बाप की चिंताओं को जायज मान ले रहे थे
देख रहे थे समझ रहे थे
पुरानी खिड़कियों के कब्जे जंग खा रहे थे
खुलते जरूर थे रोज ना भी सही कभी कभी भी
लेकिन आवाजें तरह तरह की
खुलने बंद होने पर बना रहे थे
खिड़कियाँ दरवाजे समय के साथ
पुराने लोगों के पुराने हो जा रहे थे
शायद इसी लिये
सभी लोग नयी पौँध से उनकी
अपनी अपनी खिड़कियों को खोल
कर रखने की अपेक्षा किये जा रहे थे
‘उलूक’ की समझ में नहीं आ रहा था कुछ भी
उसे उसके पुराने मकान के खंडहर में
खिड़की या दरवाजे नजर ही नहीं आ रहे थे ।
'सरगोशीयों के स्वर' में मुद्रित 52 पृ124