उलूक टाइम्स: पढ़ाना
पढ़ाना लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
पढ़ाना लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 19 अगस्त 2015

सरकारी स्कूल में जरूरी है अब पढ़ाना कोर्ट का आदेश है शुरु होना ही है शुरु हो भी जायें

ओ मास्साब
क्षमा करें
ओ मास्टरनी
भी कहा जाये
सारे पढ़ाने वाले
अपने उपर
इस बात को
ना ले जायें
यू जी सी के
प्रोफेसरान
बिल्कुल भी
ना घबरायें
अपनी मूँछों
में मक्खन
तेल लगायें
अगर मूँछे
नहीं हैं बहुत
छोटी सी
बात है
बस एक
मजाक है
परेशान भी
नजर नहीं आयें
सरकारी है
गैर सरकारी है
कान्वेंट का है
कहाँ का
पढ़ाने वाला है
बस इतना
ही यहाँ बतायें
तन्खा रोटी दाल
में घीं डालने
के लिये मिल
ही जाती है
उसके उपर
का तड़का
कहाँ से क्या क्या
करके लाते हैं
जरा जनता को
भी कभी समझाँयें
इंकम टैक्स वाले
भी जरा नींद से जागें
बस बीस करोड़
खाने वालों को छोड़ कर
कभी बीस बीस कर बीसों
जोड़ लेने वालों की
तकियों के नीचे
भी झाँक कर आयें
उत्तर प्रदेश के कोर्ट
के आदेश से जरा
भी ना घबरायें
पूरे देश में ना फैले
ये बीमारी जतन
करने में लग जायें
लगे रहें इसी तरह से
पढ़ाई की क्वालिटी
के ज्ञान विज्ञान
पर चर्चा कर दुनियाँ
को बेवकूफ बनायें
कोई नहीं भेजने
वाला है अपने पूत
कपूतो को कहीं भी
दाल भात बटने वाले
सकूल में बिना इस
देश के भगवान
से पूछे पाछे
इस तरह की अफवाह
कृपया ना फैलायें
‘उलूक’ की तरह रोज
नोचें एक खम्बा कहीं
अपने ही किसी
खम्बों में से ही
देश को इसी तरह
खम्बों के जुगाड़ से
उठाने का जुगाड़
लगाने का जुगाड़
बनायें और बनाते
ही चले जायें
दाऊद बस ये आया
आ गया ये
पकड़ा गया
बस सोचें और
खुल कर मुस्कुरायें।

चित्र साभार: magnificentmaharashtra.wordpress.com

गुरुवार, 28 मई 2015

लिख लेना कुछ भी पता है बिना लिखे तुझ से भी नहीं रहा जायेगा

कल भी लिखा था
आज भी लिखना है
कल भी शायद कुछ
लिखा ही जायेगा
लिखना इसलिये
नहीं कि लिखना
जरूरी होता है
लिखना इसलिये
नहीं कि किसी को
पढ़ना भी होता है
लिखना
इसलिये नहीं
कि किसी को
पढ़ाना होता है
किसी को
समझाना होता है
किसी को
दिखाना होता है
किसी को
बताना होता है
ऐसा भी नहीं कि
आज नहीं
लिखा जायेगा
तो कोई
मातम मनायेगा
या कल फिर
लिखने नहीं
दिया जायेगा
वैसे भी कौन
लिखने वाला
बताता है कि
किसलिये
लिख रहा है
कौन समझाता
है कि क्या
लिख रहा है
ऊपर वाला
जानता है
क्या लिखा जायेगा
लिखा जायेगा या
नहीं लिखा जायेगा
उसका करना कराना
नियत होता है
उसे ये भी
पता होता है कि
लिखना लिखाना
नीचे वाले के
करने कराने
से होता है
करने कराने
पर होता है
नीचे वाले की
नीयत में
क्या होता है
बस उस का ही
ऊपर वाले को
जरा भी पता
नहीं होता है
इसलिये आज
का लिखा
लिख दिया
कल का लिखा
कल लिखा जायेगा
जब करने कराने
वाला कुछ
अपना करेगा
या कुछ ‘उलूक’ पर
चढ़ कर उससे
कुछ करायेगा ।

चित्र साभार: www.illustrationsof.com

शनिवार, 9 मई 2015

लिखने लिखाने वालों का लिखना लिखना तेरा लिखना लिखाना लिखने जैसा ही नहीं

लिखने
लिखाने
की बातें

वैसे

बहुत कम
की जाती हैं

कभी कभी

गलतियाँ भी
मगर हो
ही जाती हैं

बातों बातों में
पूछ बैठा कोई

कहीं लिखने
वाले से ही
लिखने लिखाने
के बावत यूँ ही

क्यों लिखते हो
कहाँ लिखते हो
क्या लिखते हो

ज्यादा कुछ नहीं
कुछ ही बताओ
मगर बताओ तो सही

हम तो बताते भी हैं
लिखते लिखाते भी हैं
छपते छपाते भी हैं

किताबों में कहीं
अखबारों में कहीं

तुम तो दिखते नहीं
लिखते हुऐ भी कहीं

पढ़े तो क्या पढ़े
कैसे पढ़े कुछ कोई

लिखने वाले
के लिये ऐसा नहीं
किसी ने पूछी हो
नई बात अब कोई

उसे मालूम है
वो भी
लिखता है कुछ

कुछ भी
कभी भी
कहीं भी

बस यूँ ही
लिखता है
जिनके
कामों को
जिनकी
बातों को

उनको करने
कराने से ही
फुरसत नहीं

पढ़ने आते हैं मगर
कुछ भटकते हुऐ

जो पढ़ते तो हैं
लिखे हुऐ को यहीं

पल्ले पढ़ता है कुछ
या कुछ भी नहीं

पढ़ने वाला ही तो
कुछ कहीं लिखता नहीं ।

चित्र साभार: fashions-cloud.com

सोमवार, 8 सितंबर 2014

जो भी उसे नहीं आता है उसे पढ़ाना ही उसको बहुत अच्छा तरह से आता है

रसोईया नहीं है
पर कुछ ना कुछ
जरूर परोसता है
मेरे आस पास ही है
कोई बिना मूँछ का
जो अपनी
मूँछे नोचता है
उसे देख कर ही
मुझे पता नहीं
क्या हो जाता है
और वो है कि
मेरे पास ही
आ आ कर
कुछ ना कुछ
गाना शुरु
हो जाता है
महिलाओं को
देखते ही उसकी
बाँछे खिल जाती हैं
बहुत अच्छी तरह
पता होता है उसे
बीबी उसकी
घर पर ही दिन में
दिन भर के लिये
सो जाती है
सारी दुनियाँ के
ईमानदारों में
उसका जैसा ईमान
नहीं पाया जाता है
बस यही बात जोर
जोर से बताता है
और बाकी बातों
को दूसरों की बातों
के शोर में दबाता है
दुकान बातों की
कहीं भी खोल
कर बैठ जाता है
उसकी दुकान के
तराजू के पलड़े
के नीचे चिपकाया
हुआ चुम्बक
वैसे भी कोई नहीं
देख पाता है
उसकी हरकतों का
पता इसको भी है
और उसको भी है
जानते बूझते हुऐ भी
इसके साथ मिलकर
वो भी उसके गिरोह में
शामिल हो जाता है
दुनियाँ के दस्तूर
रोज बदल रहे हैं
बड़ी तेजी के साथ
एक चार सौ बीस
चार सौ बीस को
बस मोरल पढ़ाता है
जयजयकार होती है
आजकल कुछ ऐसे ही
सफेदपोशों की सब जगह
सबको पता होता है
बंदर ही बिल्लियों को
लड़ा लड़ा कर
रोटियाँ कुतर जाता है
‘उलूक’ तेरी किस्मत
ही है खराब कई सालों से
गुलशन उजाड़ता है
कोई और ही हमेशा
और उल्लू को फालतू में ही
बदनाम कर दिया जाता है ।

चित्र साभार: https://www.etsy.com

रविवार, 11 मई 2014

किताबों के होने या ना होने से क्या होता है

किताबें सब के
नसीब में
नहीं होती हैं
किताबें सब के
बहुत करीब
नहीं होती हैं
किताबें होने से
भी कुछ
नहीं होता है
किताबों में जो
लिखा होता है
वही होना भी
जरूरी नहीं होता है
किताबों में लिखे को
समझना नहीं होता है
किताबों से पढ़ कर
पढ़ने वालो से बस
कह देना ही होता है
किताबों को खरीदना
ही नहीं होता है
किताबों का कमीशन
कमीशन नहीं होता है
किताबें बहुत ही
जरूरी होती है
ऐसा कहने वाला
बड़ा बेवकूफ होता है
किताबें होती है
तभी बस्ता
भी होता है
किताबें डेस्क
में होती है
किताबें अल्मारी
में सोती हैं
किताबे दुकान
में होती हैं
किताबे किताबों के
साथ रोती हैं
किताबों में
लिखा होना
लिखा होना
नहीं होता है
किताबों में
इतिहास होता है
किताबों में हास
परिहास होता है
किताबों की बातों को
किताबों में ही
रहना होता है
जो अपने
आस पास होता है
किताबों से नहीं होता है
किसी को पता
भी नहीं होता है
होना या ना
होना भी
किताबों में
नहीं होता है
सब पता होना
इतना भी जरूरी
नहीं होता है
इतिहास
पुराना हो
बहुत अच्छा
नहीं होता है
नया होने
के लिये
ही कुछ
नया होता है
जो पहले से
ही होता है
उसका होना
होना नहीं होता है
किताबों को पढ़ना
और पढ़ाना होता है
बताना कुछ
और ही होता है
जिसको इतना
पता होता है
गुरुओं का भी
गुरु होता है ।

गुरुवार, 29 दिसंबर 2011

भीड़

भीड़ को
पढा़ते पढ़ाते
अब वो
भीड़ बनाना
अच्छा सीख
गया है

भीड़ पहले
कभी भी
उसका पेशा
नहीं रही

भीड़ से
निपटने में
अचानक
उसे लगा
भीड़ बहुत
काम की
चीज हो
सकती है

उस दिन
से उसने
पेशा ही
बदल डाला

अब वो
केवल एक
इशारा भर
करता है

कुछ
अजीब सा
वो भी
आसमान
की तरफ
देख कर

भीड़
चली आती है
भीड़
आपस में
बात करती है
खुले हाथ
लहराती है

लौटते हुवे
भीड़ की
मुट्ठियाँ
बंद होती हैं

एक दूसरे
से कुछ
छिपाते हुवे

एक भीड़
लौटी
वो फिर
इशारा
शुरू
कर देता है

मैने
बहुत दिन
असफल
कोशिश की
उस भीड़
का हिस्सा
बन जाने
के लिए

अब मैंने
भी वही
इशारा
करना शुरु
कर दिया है

पर कोई
नहीं आता
मेरे आसपास

भीड़
रोज
देखती है
मुझे उसी
इशारे के
साथ
जो उसका
भी है
और मैं
भीड़
देखता हूँ
जाते हुवे
उसकी तरफ
उसी इशारे
की तरफ
जिस इशारे
को सीखने
के लिये
मैने
भी अपना
पेशा छोड़
दिया है ।