उलूक टाइम्स: 30 जनवरी
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शुक्रवार, 30 जनवरी 2026

पिता होना बात तो है पर राष्ट्रपिता होना ? कभी न चाहते हुए भी कुछ लिखना जरूरी हो जाता है

हम हैं
कितना हैं
हमको आभास है
अपने उतना होने का
हम बिल्कुल भी नहीं थे
जब तुम थे पूरे से भी जियादा
तुम नहीं थे तब हम हैं
कितना हैं पता नहीं है
हमारे होने और हमारे न होने में
बहुत बड़ा फासला नहीं है
आज हैं कल नहीं भी होंगे
कितना नहीं होंगे
समय फैसला करेगा
तुम कल भी थे आज भी हो
और तुम रहोगे भी
तुम्हारा होना भी उतना ही जरूरी है
तुम थे तब हालात बहुत खराब थे
तुम नहीं थे हालात और भी खराब हो गए
संतुलन की धुरी में
तुमने तब भी बनाए रखा विश्वास
आज भी है तुम्हारे नहीं होने के बाद भी
हमने तुम्हें नहीं देखा हमने तुम्हारे बारे में सुना
कितने भाग्यशाली होंगे वो लोग जो तुम्हारे साथ थे
कितने अभागे हैं हम
तुम नहीं हो हमारे साथ हमारे ही कारण
एक पीढ़ी से लेकर दूसरी पीढ़ी
क्या अनंत तक अंत नहीं है तुम्हारा
आज के दिन तुम्हें याद करना
सबसे जरूरी है
क्योंकि
आज भी वैसे ही दिन हैं
जैसे तब थे जब तुम थे
‘उलूक’ नतमस्तक है तेरे सामने
जब तू नहीं है
राष्ट्रपिता बापू
आज ही नहीं हर दिन तेरा दिन है
नमन |

चित्र साभार: https://www.shutterstock.com/



गुरुवार, 30 जनवरी 2014

आज के दिन अगर तू नहीं मारा जाता तो शहर का साईरन कैसे टेस्ट हो पाता

सुबह सुबह आज भी
सुनाई दिया जो
रोज सुनाई देता था
आप सोच रहे होंगे
अलार्म जी नहीं
उसकी जरूरत
उनको पड़ती है
जिनको साउंड स्लीप
रोज आती है
किसी भी बात की
चिंता जिन्हे कभी
नहीं सताती है
अपने यहाँ नींंद
उस समय ही
खुल पाती है
जब एक आवाज
कुछ देर हल्की
फिर होते होते
तेज हो जाती है
दूध नहीं लाना है आज
तब महसूस होता है
क्यों दूध भी नल
में नहीं आता है
पानी मिला हुआ
ही तो होता है
पानी के नल में ही
क्यों नहीं दे
दिया जाता है
बाकी सब वही
होना था रोज रोज
का जैसा रोना था
बस ग्यारा बजे
सायरन मेरे शहर में
आज कुछ नया
सा जब बज उठा था
पहले लगा कहीं
आग लग गई होगी
फिर पुराना दिमाग
सोता हुआ सा
कुछ कुछ जगा था
आज की तारीख
पर ही तो कभी
गांंधी मारा गया था
देश के द्वारा
हर साल इसी दिन
मौन रख रख कर
उसका एहसान
उतारा गया था
कितनी किश्ते
बचीं हैं अभी तक
बताया नहीं गया था
क्या पता कुछ
ब्याज जोड़ कर
कुछ और वर्षों के
लिये सरकाया गया था
दो मिनट बाद
फिर बजा साईरन
मेरा शहर उठा उठा
एक साल के लिये
फिर से सो गया था
और मैं भी उठा
दूध की बाल्टी
पकड़ कर घर की
सीढ़ियांं उतरना
शुरु हो गया था ।