उलूक टाइम्स: समझदार को बहुत ज्यादा ही समझदारी आती है

चिट्ठा अनुसरणकर्ता

रविवार, 26 जुलाई 2015

समझदार को बहुत ज्यादा ही समझदारी आती है

सब्जी
और घास
साथ साथ
उगती हैं
दूर से
देखने पर
दोनों एक
सी नजर
भी आती हैं

पर सब्जी
पकाने के
लिये घास
नहीं काटी
जाती है

बकरियों के
रेहड़ में
कुत्ते भी
साथ में हों
तब भी
वही बात
हो जाती है

मांंसाहारियों
के द्वारा
खाने के लिये
बकरियाँ ही
काटी जाती हैं

हिंदी में लिखी
किसी की
अपने घर
की रोज की
चुगलखोरी
साहित्य में नहीं
गिनी जाती हैं

कोई कुछ
लिख रहा
हो अगर
पहले उसकी
लिखी गई
बातों को
समझने की
कोशिश की
जाती है

अपने ही
घर के किसी
आदमी के
द्वारा कही
जाती हैं
और
समझ में
रोज रोज
ही नहीं अगर
आती हैं तो
किसी दिन
कभी पहले
उससे ऐसी
उल जलूल
क्यों लिखी हैं
इस तरह
की बातें
पूछे जाने
की कोशिश
की जाती है

काले अक्षरों
की भैंसे
बनाना अच्छी
बात नहीं
मानी जाती हैं

अक्षरों की
भैंसों की
रेहड़ को
हाँकने वाले
की तुलना
साहित्यकारों
से नहीं
की जाती है

‘उलूक’
बैचेन मत
हुआ कर
अगर कभी
तेरे कनस्तर
पीटने की
आवाज दूर
से किसी को
शादी बारात के
ढोल नगाड़े
का भ्रम पैदा
कर जाती हैं

साहित्यकार
समझने वाले
को समझदारी
आती है और
बहुत आती है ।

चित्र साभार: www.fotosearch.com

4 टिप्‍पणियां:

  1. अपनी लेखनी से भैंस का चारा परोसते-परोसते जब लेखक थक जाता है तो फिर वो बेचारा बुद्धिजीवियों को दिमागी कसरत करनेवाला नाश्ता परोसता है पर उसमें भूसे, खली, दाने और घास-फूस की महक ज़रूर होती है. पर इस चारा-साहित्य की भी उपयोगिता है, अगर आप इसका स-स्वर पाठ करें तो मच्छर- मक्खी दूर भाग जाते हैं और भूत-पिशाच निकट नहीं आते हैं.

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. आभार आदरणीय गोपेश जी ब्लाग पर पधारने और टिप्प्णी करने के लिये ।

      हटाएं
  2. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन गुरदासपुर आतंकी हमला और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

    जवाब देंहटाएं