जल जंगल जमीन जानवर और जनसरोकार
इन सबको आत्मसात किया हुआ एक जनकवि
रंगकर्मी गायक और साहित्यकार
हिमालय सा विशाल व्यक्तित्व
उत्कृष्ट संप्रेषण कला
कोमल हृदय जैसे सरस्वती का हो अवतार
आज तेरी तीसरी पुण्यतिथि पर
ये घृष्टता करने की कोशिश कर रहा हूँ
गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’
आज का ये पन्ना तुझ को दिल से समर्पित कर रहा हूँ
पता है मुझे
सूरज को एक दिया दिखाने की
बस कोशिश कर रहा हूँ
तू तो है एक विशाल सागर
जनमानस में हमेशा ही रहेगा
जीते जी तुझसे नहीं हुई मुलाकात
कभी इसका बहुत अफसोस रहेगा
तेरे किस आयाम की बात की जाये
पता नहीं कहाँ कौन सी चीज मुझ से छूट जाये
तूने अपने गीतों से जनमानस को हमेशा ही सहलाया
भूत बताया और वर्तमान बताया
तेरे ही जनगीतों ने
केदारनाथ हादसे का भविष्य साफ साफ बताया
तेरी कविताओं ने जन जन में आशा का दीप जलाया
तेरे ही शब्दों में (अनुवाद)
"क्यों उदासी ले कर आता है
क्यों मुहँ तू अपना झुकाता है
किसलिये घुटने जमीन पर टिकाता है
ऎसा हमेशा ही नहीं हो जाता है
जल्दी ही देखेगा सामने अपने
अच्छा दिन भी जरूर आता है"
सरकारी और सरकारी कुनबा
तुझे कभी सम्मानित नहीं कर पाया
पर उसे कहाँ जरूरत थी इस सम्मान की
जिसने जीवन व्यापन के लिये रिक्शा तक हो चलाया
लगी लगाई नौकरी को तक
जन आन्दोलनों की खातिर लात मारने में
एक मिनट का समय भी नहीं लगाया
ऎसा कौन सा आन्दोलन था
जो तेरे गीतों के बोलों के बिना ही हो चल पाया
जन जन के मानस में जितना
स्थान तूने अपना बनाया
उसके सामने हर सम्मान बौना हो आया
माना आज तू नहीं है शरीर से
कहीं हमारे आस पास
तेरे गीतों ने तेरे होने का अहसास हमेशा ही है दिलाया
आभार जयमित्र सिंह बिष्ट और मनमोहन चौधरी
आज मुझे ‘गिर्दा’ से आपने सच में है रुबरू करवाया !
'सरगोशीयों के स्वर' में मुद्रित 65 पृ155
