दिन के आसमान में उड़ते हुऐ
चील कौओं कबूतरों के झुंड
और रात में
आकाश गंगा के चारों ओर बिखरे
मोती जैसे तारों की गिनती करते करते
एक दो तीन से अस्सी नब्बे होते जाते
कहीं थोड़ा सा भी
ध्यान भटकते ही गड़बड़ा जाते
गिनती भूलते भूलते उसी समय लौट आते
उतनी ही उर्जा और जोश से फिर से
किसी एक जगह से गिनती करना शुरु हो जाते
ऐसा एक दो दिन की बात हो ऐसा भी नहीं
रोज के पसंदीदा खेल हो जाते
कोई थकान नहीं कोई शिकन नहीं
कोई गिला नहीं किसी से शिकवा नहीं
सारे ही अपने होते
और इसी होते होते के बीच झुंड बदल जाते
कब गिनतियाँ आदमी और भीड़ हो जाते
ना दिखते कहीं तारे और चाँद
ना ही चील के विशाल डैने ही नजर आते
थकान ही थकान मकान ही मकान
पेड़ पौँधे दूर दूर तक नजर नहीं आते
गिला शिकवा किसी से करे या ना करें
समझना चाह कर भी नहीं समझ पाते
समझ में आना शुरु होने लगता
यात्रा का बहुत दूर तक आ जाना
कारवाँ में कारवाँओं के समाते समाते
होता ही है होता ही है
कोई बड़ी बात फिर भी नहीं होती इस सब में
कम से कम अपनापन और अपने
अगर इन सब में कहीं नहीं खो जाते ।

यही तो विडंबना है कि इस भीड में अपनों का अपनापन कहीं खो जाता है।
जवाब देंहटाएंआभार आशा जी ।
हटाएंशुभ प्रभात
जवाब देंहटाएंकाफी बड़ी बात कर दी आपने
समझने के लिये बार-बार पढ़ना पड़ा
पढ़ते-पढ़ते भूल भी गई
कि क्या पढ़ा
और फिर से पढ़ने लगी
कुछ ऊपर से निकल गया
कुछ अन्दर समा गया
जानदार पोस्ट
साधुवाद
सादर
कब जिंदगी का कौन सा पन्ना खुल कर सामने आ जाये कहाँ पता चल पाता है ? आभारी हूँ यशौदा जी ।
हटाएंबहुत ही सुन्दर प्रस्तुति, रक्षा बंधन की हार्दिक शुभकामनायें।
जवाब देंहटाएंआभार राजेंद्र जी ।
हटाएंपावन पर्व रक्षाबंधन की असंख्य शुभकामनाएं...
जवाब देंहटाएंसुंदर प्रस्तुति...
दिनांक 11/08/2014 की नयी पुरानी हलचल पर आप की रचना भी लिंक की गयी है...
हलचल में आप भी सादर आमंत्रित है...
हलचल में शामिल की गयी सभी रचनाओं पर अपनी प्रतिकृयाएं दें...
सादर...
कुलदीप ठाकुर
आभार कुलदीप जी ।
हटाएंरक्षाबंधन की शुभकामनाएं !
जवाब देंहटाएंमेघ आया देर से ......
: महादेव का कोप है या कुछ और ....?
आभार कालीप्रसाद जी ।
हटाएंबहुत ही बढ़िया सर!
जवाब देंहटाएंसादर
आभार यश ।
हटाएंबहुत सुन्दर प्रस्तुति।
जवाब देंहटाएं--
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (11-08-2014) को "प्यार का बन्धन: रक्षाबन्धन" :चर्चा मंच :चर्चा अंक:1702 पर भी होगी।
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भाई-बहन के पवित्र प्रेम के प्रतीक
पावन रक्षाबन्धन पर्व की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
आभार शास्त्री जी ।
हटाएंभीड़ के बीच अकेलापन और अकेलेपन के बीच अपनेपन और किसी अपने को ढूँढ़ती तलाशती नज़र... शब्दों के बिखरे हुये तारे और अंतिम पंक्तियों पर दिल को छू लेना... कमाल!!
जवाब देंहटाएंसलिल जी
हटाएंआपकी टिप्प्णी करने की अदा ही कमाल है :)
आभारी हूँ ।
बहुत ही सुन्दर
जवाब देंहटाएंआभार ।
हटाएंबहुत सारगर्भित प्रस्तुति...बहुत सुन्दर
जवाब देंहटाएंआभारी हूँ कैलाश जी ।
हटाएंबहुत सुन्दर प्रस्तुति।
जवाब देंहटाएंरक्षाबंधन की शुभकामनाएँ !
आभार ।
हटाएंवाह्ह्ह ..पढ़ते पढ़ते जाने कहाँ कहाँ की सैर कर आये हम ... कही डूबे कहीं उतरे ... जिन्दगी के हर पन्ने सिमट गये .. :)
जवाब देंहटाएंआभर सुनीता ।
हटाएंखुले निरभ्र आकाश में तारों की गणना उन्मुक्ता से ,सहस्रों की भीड़ में खोता अकेला निस्संग आदंोी गिनती शून्य होता आदमी। बढ़िया रचना।
जवाब देंहटाएंआभार वीरू जी ।
हटाएंपढ़ते-पढ़ते भूल गई कहाँ थी गिनती ,और कहाँ आ गई -गिनती में हमेशा गड़बड़ हो जाती है !
जवाब देंहटाएंजी आभार :)
हटाएंसुन्दर अति सुन्दर। शुक्रिया आपकी प्रेरक टिप्पणियों का सार्थक टाइम्स उलूक का।
जवाब देंहटाएंआभार ।
हटाएंऎसी रचनाएँ रोमांचित कर जाती हैं... एक अलग प्रकार का रोमांच होता है.
जवाब देंहटाएंआभार संजय ।
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