उलूक टाइम्स: बचपन से चलकर यहाँ तक गिनती करते या नहीं भी करते पर पहुँच ही जाते

शनिवार, 9 अगस्त 2014

बचपन से चलकर यहाँ तक गिनती करते या नहीं भी करते पर पहुँच ही जाते



दिन के आसमान में उड़ते हुऐ 
चील कौओं कबूतरों के झुंड
और रात में 
आकाश गंगा के चारों ओर बिखरे
मोती जैसे तारों की गिनती करते करते
एक दो तीन से अस्सी नब्बे होते जाते

कहीं थोड़ा सा भी
ध्यान भटकते ही गड़बड़ा जाते
गिनती भूलते भूलते उसी समय लौट आते

उतनी ही उर्जा और जोश से फिर से
किसी एक जगह से गिनती करना शुरु हो जाते
ऐसा एक दो दिन की बात हो ऐसा भी नहीं
रोज के पसंदीदा खेल हो जाते

कोई थकान नहीं कोई शिकन नहीं 
कोई गिला नहीं किसी से शिकवा नहीं
सारे ही अपने होते
और इसी होते होते के बीच झुंड बदल जाते

कब गिनतियाँ आदमी और भीड़ हो जाते
ना दिखते कहीं तारे और चाँद
ना ही चील के विशाल डैने ही नजर आते
थकान ही थकान मकान ही मकान
पेड़ पौँधे दूर दूर तक नजर नहीं आते
गिला शिकवा किसी से करे या ना करें
समझना चाह कर भी नहीं समझ पाते

समझ में आना शुरु होने लगता
यात्रा का बहुत दूर तक आ जाना
कारवाँ में कारवाँओं के समाते समाते
होता ही है होता ही है
कोई बड़ी बात फिर भी नहीं होती इस सब में
कम से कम अपनापन और अपने
अगर इन सब में कहीं नहीं खो जाते ।

32 टिप्‍पणियां:

  1. यही तो विडंबना है कि इस भीड में अपनों का अपनापन कहीं खो जाता है।

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  2. शुभ प्रभात
    काफी बड़ी बात कर दी आपने
    समझने के लिये बार-बार पढ़ना पड़ा
    पढ़ते-पढ़ते भूल भी गई
    कि क्या पढ़ा
    और फिर से पढ़ने लगी
    कुछ ऊपर से निकल गया
    कुछ अन्दर समा गया

    जानदार पोस्ट
    साधुवाद

    सादर

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    1. कब जिंदगी का कौन सा पन्ना खुल कर सामने आ जाये कहाँ पता चल पाता है ? आभारी हूँ यशौदा जी ।

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  3. बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति, रक्षा बंधन की हार्दिक शुभकामनायें।

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  4. पावन पर्व रक्षाबंधन की असंख्य शुभकामनाएं...
    सुंदर प्रस्तुति...
    दिनांक 11/08/2014 की नयी पुरानी हलचल पर आप की रचना भी लिंक की गयी है...
    हलचल में आप भी सादर आमंत्रित है...
    हलचल में शामिल की गयी सभी रचनाओं पर अपनी प्रतिकृयाएं दें...
    सादर...
    कुलदीप ठाकुर

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  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (11-08-2014) को "प्यार का बन्धन: रक्षाबन्धन" :चर्चा मंच :चर्चा अंक:1702 पर भी होगी।
    --
    भाई-बहन के पवित्र प्रेम के प्रतीक
    पावन रक्षाबन्धन पर्व की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  6. भीड़ के बीच अकेलापन और अकेलेपन के बीच अपनेपन और किसी अपने को ढूँढ़ती तलाशती नज़र... शब्दों के बिखरे हुये तारे और अंतिम पंक्तियों पर दिल को छू लेना... कमाल!!

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    1. सलिल जी
      आपकी टिप्प्णी करने की अदा ही कमाल है :)
      आभारी हूँ ।

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  7. बहुत सारगर्भित प्रस्तुति...बहुत सुन्दर

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  8. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    रक्षाबंधन की शुभकामनाएँ !

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  9. वाह्ह्ह ..पढ़ते पढ़ते जाने कहाँ कहाँ की सैर कर आये हम ... कही डूबे कहीं उतरे ... जिन्दगी के हर पन्ने सिमट गये .. :)

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  10. खुले निरभ्र आकाश में तारों की गणना उन्मुक्ता से ,सहस्रों की भीड़ में खोता अकेला निस्संग आदंोी गिनती शून्य होता आदमी। बढ़िया रचना।

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  11. पढ़ते-पढ़ते भूल गई कहाँ थी गिनती ,और कहाँ आ गई -गिनती में हमेशा गड़बड़ हो जाती है !

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  12. सुन्दर अति सुन्दर। शुक्रिया आपकी प्रेरक टिप्पणियों का सार्थक टाइम्स उलूक का।

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  13. ऎसी रचनाएँ रोमांचित कर जाती हैं... एक अलग प्रकार का रोमांच होता है.

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