मन करता है किसी समय
एक सादे सफेद पन्ने पर
खींच दी जायें कुछ आड़ी तिरछी रेखायें
फिर बनाये जायें कुछ नियम
उन आड़ी तिरछी
रेखाओं के आड़े पन और तिरछे पन के लिये
जिससे आसान हो जाये समझना
किसी भी आड़े और तिरछे को
कहीं से भी कभी भी सीधे खड़े होकर
बहुत कुछ बहुत सीधा सीधा दिखता है
मगर बहुत ही टेढ़ा होता है
बहुत कुछ टेढ़ा दिखता है
टेढ़ा दिखाता है
जिसको सीधा करने के चक्कर में
सीधा करने वाला खुद ही टेढ़ा हो जाता है
टेढ़े होने ना होने का
कहीं कोई नियम कानून भी नजर नहीं आता है
ऐसा भी नहीं होता है
टेढ़ा हो जाने के कारण कोई टेढ़ी सजा भी पाता है
नियम कानून व्यवस्था के सवाल
अपनी जगह पर होते हैं
लेकिन सीधा सीधा है का पता
टेढ़ों के साथ रहने उठने बैठने के साथ ही
पता चल पाता है
‘उलूक’ लिखने दे
सब को उन के अपने अपने नियमों के हिसाब से
सीधा होने की कतई जरूरत नहीं है
कुछ चीजें टेढ़ी ही अच्छी लगती हैं
उन्हें टेढ़ा ही रहने दिया जाता है
क्यों झल्लाता है
अगर तेरे लिखे को किसी से भूल वश
कविता है कह दिया जाता है ।
चित्र साभार: www.dreamstime.com
'सरगोशीयों के स्वर' में मुद्रित 61 पृ144
