उलूक टाइम्स: रेखा
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रविवार, 19 जुलाई 2015

हाशिये भी बुरे नहीं होते हैं अगर खुद ही खींचे गये होते हैं

हाशिये खुद ही बनें
खुद के लिये खुद ही
समझ में आ जायें
खुद चला चले कोई
मानकर कुछ
निशानों को हाशिये
और फिर खुद ही
खींच ले लक्ष्मण रेखा
हाशिये के पार
निकल लेने के बाद
सोच कर कि भस्म
वैसे भी कोई नहीं होता
रावण तक जब
नहीं हो सका
हाशियों में धकेलने
के मौके की तलाश में
रहने वालों के लिये
हाशिये माने भी
नहीं रखते हैं
एक जैसे ही रेंगते हुऐ
समझ में आने वाले
समझ लेते हैं रेंगना
एक दूसरे का बहुत
ही आसानी से
बहुत जल्दी और
आनन फानन में
खींच देते हैं एक
काल्पनिक हाशिया
सीधा खड़ा होने की
कोशिश में लगे
हुऐ के लिये और
जब तक समझ पाये
जमीन की हकीकत
खड़े होने की कोशिश
में धकियाये हुआ
हाशिये के पार से
देखता हुआ नजर
आता है खुद को ही
लक्ष्मण भी नहीं
होता है कहीं
रेखाऐं भी दिखती
नहीं हैं बस
महसूस होती हैं
क्या बुरा है ऐसे में
सीख लेना ‘उलूक’
पहले से ही खुद ही
चल कर खड़े हो लेना
हाशिये के पार
खुद खींच कर
खुद के लिये
एक हाशिया।

चित्र साभार: www.slideshare.net

शुक्रवार, 10 जुलाई 2015

कविता को टेढ़ा मेढ़ा नहीं सीधे सीधे सीधा लिखा जाता है


मन करता है किसी समय
एक सादे सफेद पन्ने पर
खींच दी जायें कुछ आड़ी तिरछी रेखायें

फिर बनाये जायें कुछ नियम
उन आड़ी तिरछी
रेखाओं के आड़े पन और तिरछे पन के लिये

जिससे आसान हो जाये समझना
किसी भी आड़े और तिरछे को
कहीं से भी कभी भी सीधे खड़े होकर

बहुत कुछ बहुत सीधा सीधा दिखता है
मगर बहुत ही टेढ़ा होता है
बहुत कुछ टेढ़ा दिखता है
टेढ़ा दिखाता है
जिसको सीधा करने के चक्कर में
सीधा करने वाला खुद ही टेढ़ा हो जाता है

टेढ़े होने ना होने का
कहीं कोई नियम कानून भी नजर नहीं आता है
ऐसा भी नहीं होता है
टेढ़ा हो जाने के कारण कोई टेढ़ी सजा भी पाता है

नियम कानून व्यवस्था के सवाल
अपनी जगह पर होते हैं
लेकिन सीधा सीधा है का पता
टेढ़ों के साथ रहने उठने बैठने के साथ ही
पता चल पाता है

‘उलूक’ लिखने दे
सब को उन के अपने अपने नियमों के हिसाब से
सीधा होने की कतई जरूरत नहीं है
कुछ चीजें टेढ़ी ही अच्छी लगती हैं
उन्हें टेढ़ा ही रहने दिया जाता है

क्यों झल्लाता है
अगर तेरे लिखे को किसी से भूल वश
कविता है कह दिया जाता है ।

चित्र साभार: www.dreamstime.com

'सरगोशीयों के स्वर' में मुद्रित 61 पृ144 

रविवार, 25 मई 2014

रेखाऐं खींच कर कह देना भी कहना ही होता है

पूरी जिंदगी
ना सही
कुछ ही दिन
कभी कभी
कुछ आड़ी तिरछी
सौ हजार ना सही
दो चार पन्नों
में ही कहीं
पन्ने में नहीं
कहीं किसी दीवार
में ही सही
खींच कर
जरूर जाना
जाने से पहले
जरूरी भी
नहीं है बताना
वक्त बदलता है
ऐसा सुना है
क्या पता
कोई कभी
नाप ही ले
लम्बाईयाँ
रेखाओं की
अपनी सोच
के स्केल से
और समझ में
आ जाये उसके
कुछ बताने के लिये
हमेशा जरूरी
नहीं होती हैं
कुछ भाषाऐं
कुछ शब्द
दो एक सीधी
रेखाओं के
आस पास
पड़ी रेखाऐं
होना भी
बहुत कुछ
कह देता है
हमेशा नहीं
भी होता होगा
माना जा सकता है
पर कभी कहीं
जरूर होता है
समझ में आते ही
एक या दो
या कुछ और
रेखाऐं रेखाओं के
आसपास खींच देने
वाला जरूर होता है
रेखाऐं बहुत मुश्किल
भी नहीं होती हैं
आसानी से समझ
में आ जाती है
बहुत थोड़े से में
बहुत सारा कुछ
यूँ ही कह जाती हैं
जिसके समझ में
आ जाती हैं
वो शब्द छोड़ देता है
रेखाओं का
ही हो लेता है ।