उसके चेहरे पर शिकन नहीं है
सुना है उसकी शोध छात्रा ने
शिकायत की है छेड़ छाड़ की
अच्छे दिन लाने वाले लोगों को
वैसे भी देश देखना है
ये बातें तो छोटे लोग करते हैं तेरे जैसे
कोई हल्ला गुल्ला जब नहीं है कहीं कोई
एफ आई आर नहीं है कोई कहीं
कोई सबूत नहीं है
फिर अगर कोई
खुले आम बिना किसी झिझक
मुस्कुराते हुऐ घूमता है तो
तेरे को काहे चिढ़ लग रही है
लड़के लड़कियाँ परीक्षा दें
या मोमबत्तियाँ लेकर
शहर की गलियों में
शोर करने निकल पड़े
निर्भया होने से तो बच ही गई है
वैसे भी जब तक
कोई अपराध सिद्ध नहीं हो जाता है
कोई अपराध सिद्ध नहीं हो जाता है
अपराध कहाँ
और कब माना जाता है
और अगर घर की बात
घर में रहे तो अच्छा होता है
‘उलूक’ तुझे तो
इस सब के बारे में सोच कर ही
झुर झुरी हो जाया करती है
झुर झुरी हो जाया करती है
उनको पता चल गया तू सोच रहा है
तो बबाल हो जायेगा
उसने किया है तो होने दे
बड़े आदमी के बड़े हाथ
और सारे आस पास के
बड़े लोग उसके साथ
तू अपनी गुड़ गुड़ी
खुशी से यहाँ छाप
खुशी से यहाँ छाप
सिर खुजा
और उसको
मौज करते हुऐ
और उसको
मौज करते हुऐ
रोज का रोज देखता जा
फाल्तू की अपनी बात
उलूक टाइम्स में ला
ला कर सजा ।
ला कर सजा ।
बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (14-06-2014) को "इंतज़ार का ज़ायका" (चर्चा मंच-1643) पर भी होगी!
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक
आभार !
हटाएंसुंदर रचना
जवाब देंहटाएंआभार ।
हटाएंसुन्दर रचना सन्देश...
जवाब देंहटाएंआभार ।
हटाएंआपकी कविता पढ़कर मैं असहज भी हुआ और गुस्सा भी आया। आपने सत्ता, चुप्पी और समाज की दोहरी सोच को बहुत साफ दिखाया। हर पंक्ति ताना मारती है और सिस्टम की क्रूर हँसी सुनाती है। मुझे यह अच्छा लगा कि आप सबूत, एफआईआर और “बड़े आदमी” के खेल को सीधे पकड़ते हो।
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