एक सी नहीं मानी जाती हैं
आधुनिक चित्रकारी
कुछ खड़ी कुछ पड़ी रेखायें
खुद कूदी हुयी मैदान पर
या जबरदस्ती की मारी
और कुछ भी लिख देने की बीमारी
होली पर जैसे आसमान की तरफ रंगीन पानी मारती
खिलखिलाते बच्चे के हाथ की पिचकारी
उड़ते फिर फैल जाते हुऐ रंग
बनाते अपने अपने आसमान
जमीन पर अपने हिसाब से घेर कर अपने हिस्से की जमीन
और मिट्टी पर बिछ गये चित्रों को बेधती आँखें गमगीन
खोलते हुऐ अपने सपनों की बाँधी हुई
गठरियों पर पड़ चुकी बेतरतीब गाँठों को
कहीं जमीन पर उतरती तितलियाँ
कहीं उड़ती परियाँ रंगीन परिधानों में
फूलों की सुगंध कहीं चैन तो कहीं उसी पर भंवरे बैचेन
किसी के लिये यही सब
महीना पूरे होते होते रसोई में खाली हो चुके
राशन के डब्बों के ऊपर
उधम मचाते नींद उड़ाते रद्दी बासी अखबार कुतरते चूहे
किसी की माथे पर पड़ी चिंता की रेखायें
कहीं कंकड़ पत्थर से भरी
कहीं फटी उधड़ी खाली हो चुकी जेब
किसी कोने पर खड़ी
एक सच को सच सच लिख देने के द्वंद से
आँख बचाती सोच ऊल जलूल होती हुयी दिशाहीन
अच्छा होता है कुछ
देखे अन्देखे सुने सुनाये
उधड़े नंगे हो चुके झूठ के पन्ने में उतर कर
व्यंग के मुखौटे में बेधड़क निकल लेने से
कभी कभी यूँ ही कुछ नहीं के खाली बरतनों को पीट लेना
‘उलूक’महीने के अन्तिम दिन कैलेण्डर मत देखा कर
राशन नहीं होता है लिखना महीने का ।
चित्र साभार: https://www.timeanddate.com/

पर अन्तिम ही दिन तो कैलेंडर देखना ज्यादा होता है कि ये दिनांक कब गुजरे और नए माह की शुरुआत हो और अकाउंट में कुछ क्रेडिट होने का sms आए ...
जवाब देंहटाएंकई बहुराष्ट्रीय कंपनियों में तो माह के आखिर में ही तनख़्वाह आती है।
आधुनिक चित्रकारी भी होती तो रंगीन है, पर संदेहास्पद लगती है,कम लोगों को ही समझ आती है, जैसे मंदिर में भगवान् की मौज़ूदगी संदेहास्पद रहती है।
आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज शुक्रवार 01 नवम्बर 2019 को साझा की गई है......... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंजी नमस्ते,
जवाब देंहटाएंआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (०२ -११ -२०१९ ) को "सोच ज़माने की "(चर्चा अंक -३५०७) पर भी होगी।
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
आप भी सादर आमंत्रित है
….
अनीता सैनी
एक
जवाब देंहटाएंसच को
सच सच
लिख देने के
द्वंद से
आँख बचाती
सोच
बहुत खूब !! अति सुन्दर ।
वाह्ह्ह बहुत खूब
जवाब देंहटाएंGreat post https://drawings.archicgi.com/
जवाब देंहटाएंसच कडवा है .. महीने के अंतिम दिन केलेंडर देखना और जेब देखना भी एक सच है कडुवा सच ...
जवाब देंहटाएंपर देखना फिर भी जरूरी है ... तगड़ा वाला व्यंग ...
कुछ भी लिख देने में "कुछ" तो होता ही है, "अंतिम दिनों में कलेंडर देखना" यथार्थ उजागर किया है
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