उलूक टाइम्स: स्वतंत्र
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रविवार, 10 अगस्त 2025

पहुंचा कर महफ़िलों में बिना भूले कि प्रश्न पाठ्यक्रम से हटा दिए गए हैं

हां सही किया
देर से ही सही
इधर उधर देखना छोड़ दिया
और सीख लिया
नाक की सीध में चलना
नाक को ही बस देखते हुए

तुझे ज्ञान होना चाहिए
कि तेरा अस्तित्व तभी तक है
जब तक तेरी आंखें बंद हैं
जुबां सिली हुई है
और कानों में मैला जमा हुआ है

हां तेरे आने जाने में
कोई रोक टोक
कहीं भी नहीं है कभी भी नहीं है
बड़ी महफिलों में तो खासकर
पर वैधानिक चेतावनी के साथ
कि शर्तें लागू हैं

हां तू स्वतंत्र भी है
और 15 अगस्त भी
बस 5 ही दिन नजदीक है
सफेद कपड़े देख लेना
सिलवटें तो नहीं बची हैं
पिछले सालों की

आना है तुझे अनिवार्य रूप से
झंडारोहण देखने और सुनने भाषण
वो बात अलग है
तुझे रहना होगा वहां भी शशर्त

खबरदार
आदत डाल ले कि सब कुछ उत्तर होता है
प्रश्न पाठ्यक्रम से हटा दिए गए हैं

हां बकवास करने से
तुझे कोई नहीं रोक रहा है ‘उलूक’
वो भी शशर्त वैधानिक चेतावनी के साथ
कि पढ़ने के बाद कोई ये नहीं कह बैठे
समझ में आ गया है |

चित्र साभार: https://www.istockphoto.com/

'सरगोशीयों के स्वर' में मुद्रित 34  पृ87   

शुक्रवार, 12 जून 2020

गुलामी सुनी सुनाई बात है लगभग सत्तर साल की महसूस कर बेवकूफ स्वतंत्र तो तू अभी कुछ साल पहले ही से तो हो रहा था




देखा
नहीं था
बस
कुछ सुना था

कुछ
किताबों के
सफेद पन्नों
पर

काले से
किसी ने कुछ
आढ़ा तिरछा सा
गड़ा था

उसमें से थोड़ा
मतलब का कुछ कुछ
पढ़ा था

बहुत कुछ
यूँ ही
पन्नों के साथ चिपका कर
बस
पलट 
चला था 

पल्ले ही नहीं
 पड़ा था

ना गुलाम
देखे थे
ना गुलामी
महसूस की थी
कहीं कोई
बंदिश नहीं थी

सब कुछ
आकाश था
चाँद तारों
और
चमकदार सूरज से
लबालब
भरा था

ऐसा
भी नहीं था
कहीं कूड़ा नहीं था

जैविक था
अजैविक भी था
सोच में भी
अलग से रखा
कूड़ादान
भी वहीं था

वैसा ही जैसे
 आज का
अभी का हो
रखा चमका हुआ
नया था

खुल भी रहा था
बन्द
ढक्कन के साथ
हो
रहा था

एक था गाँधी
कर गया था
गुड़ का गोबर
तब कभी

अभी अभी
कहीं कोई कह
रहा था

गाय बकरी भैंस
के दिन
फिर रहे थे
अब
कहीं जाकर

गोबर का
बस और बस
सब गुड़
हो रहा था

लड़का 
लिये छाता  
एक छत से कूदता
दूसरी छत
चाकलेट फेंकता

धूप से बचाता 
नीचे कहीं
राह चलती

एक लड़की

सामाजिक
दूरी बना
खुश
हो रहा था

समय
घड़ी की टिक टिक
के साथ

अन्दर
कहीं घर के
तालाबन्द हो कर
जार जार
खुशी के आँसू
दो चार बस रोज

 दिखाने का
कुछ रो
रहा था

महामारी
दौड़ा रही थी
मीलों
आदमी नंगे पाँव
सड़क पर

नेता
घर बैठ
चुनावी रैलियाँ
बन्द सारे
दिमागों में
बो रहा था

‘उलूक’
गुलामी
सुनी सुनाई बात है
लगभग
सत्तर साल की

महसूस कर
बेवकूफ

स्वतंत्र तो
तू अभी
कुछ साल
पहले ही से
हो रहा था।

चित्र साभार: www.123rf.com

गुरुवार, 13 दिसंबर 2018

गुलाम के इशारे पर चलता है स्वतंत्रता पढ़ाने को चला आता है


स्वतंत्र एक शब्द है स्वतंत्रता एक ख्वाब है 
गुलाम और गुलामी आम है और खास है

नकारते रहिये
हो गये  तो सीढ़ी आपके पास है
नहीं हो पाये अगर
का मतलब
साँप कहीं ना कहीं है 
और बहुत नजदीक है
और आसपास है

साँप और सीढ़ी के बीच एक रिश्ता है
इसीलिये खेला भी जाता है

हर गुलाम अपने नीचे 
बस गुलाम देखना चाहता है
गुलाम सोचना चाहता है

हर गुलाम 
एक बड़े गुलाम का खास होना चाहता है
गुलाम
गुलाम होकर भी
गुलाम हूँ सोचना भी नहीं चाहता है

गुलामी खून में होती है खून लाल होता है
सभी का एक जैसा
आदमी से लेकर जानवर का तक

सारे गुलाम स्वतंत्रता जीते हैं ख्वाब पीते हैं
इसके गुलाम
उसको स्वतंत्रता पढ़ाते हैं
उसके गुलाम
स्वतंत्रता सिखाने वाले शिक्षकों की पाँत में
सबसे आगे खड़े नजर आते हैं

नियम स्वतंत्र होते है
पालन करने वाले गुलाम होते हैं
गुलामी कुछ ना कुछ दे जाती है
स्वतंत्रता पागलों के काम आती है

स्वतंत्रता सपने जगाती है
सोना बहुत जरूरी है
गुलामों को नींद जरूरत से ज्यादा आती है

गुलाम बहुत आतुरता के साथ
स्वतंत्रता लिखना चाहता है
लिखना शुरु करता है
मालिक सपने में आना शुरु हो जाता है

‘राम’ ईश्वर है 
‘उलूक’ गुलाम उसके नाम पर
तुझे धमका कर 
तेरा क्रिया करम श्राद्ध सब
अभी और अभी यहीं कर देना चाहता है

देश स्वतंत्र हुआ था गुलामों से
कुछ सुना था 
फिर क्यों हर तरफ अपने आसपास अपने ऊपर 
किसी एक गुलाम का साया नजर आता है

घर में ही घर के भेड़िये नोच रहे होते हैं
अपनी भेड़ें अपने हिसाब से
शेर का गुलाम
शेर की एक तस्वीर का झंडा ला ला कर
क्यों लहराता है ?

चित्र साभार: https://apptopia.com/

'सरगोशीयों के स्वर' में मुद्रित 26   पृ69 

शनिवार, 15 अगस्त 2015

आजादी जिंदा और गुलामी मरी हुई बात कुछ समझ में आई ?

सूरज डूब गया
बहुत अच्छी तरह
आज का दिन भी
पिछले उन्हत्तर
सालों की तरह
बीतना था बीत गया
स्वतंत्रों की स्वतंत्रता
हर जगह नजर आई
बेचारी गुलामी
गुलामों की
दूर दूर तक कहीं
भी नजर नहीं आई
गुलाम और
गुलामी की बात
आजाद और
आजादी के साथ
करने की हिम्मत
आज के दिन तो
कम से कम
नहीं ही आनी थी
समझ में नहीं आया
क्यूँ और
किसलिये चली आई
लगता है बंदर के
बारे में नहीं सोचने
की प्रतिज्ञा आज
के दिन के लिये
किसी ना किसी ने
किसी कारण से
है करवाई
क्या फायदा हुआ
कैसे भूल गया
बचपन में स्कूल में
हर साल झंडे के साथ
प्रभात फेरी थी करवाई
गुलामी नहीं रही
शहीदों के साथ साथ
ही शहीद हो गई
किताबों में एक नहीं
कई सारी तेरे पढ़ने
परीक्षा देने के लिये
ही गई थी लिखवाई
‘उलूक’ रात में भी
ढंग से नहीं देखने
की बात तेरे बारे
में थी सुनी सुनाई
पहली बार हुआ
अचँभा जरा सा
जब चमगादड़ की
तरह उल्टा लटकने
की करामात तेरी
सामने से चली आई
जिंदा आजादी की
बात छोड़ कर आज
भी तुझे मरी हुई
गुलामी की
याद चली आई ।

चित्र साभार: thinkramki.blogspot.com