उलूक टाइम्स

बुधवार, 4 जनवरी 2012

दिल बहलाने

मधुमक्खी हर रोज
की तरह है भिनभिनाती
फूलों पर है मडराती
एक रास्ता है बनाती
बता के है रोज जाती
मौसम बहुत है सुहाना
इसी तरह उसको है गाना
भंवरा भी है आता
थोड़ा है डराता
उस डर में भी तो
आनन्द ही है आता
चिड़िया भी कुछ
नया नहीं करती
दाना चोंच में है भरती
खाती बहुत है कम
बच्चों को है खिलाती
रोज यही करने ही
वो सुबह से शाम
आंगन में चली है आती
सबको पता है रहता
इन सब के दिल में
पल पल में जो है बहता
हजारों रोज है यहाँ आते
कुछ बातें हैं बनाते
कुछ बनी बनाई
है चिपकाते
सफेद कागज पर
बना के कुछ
आड़ी तिरछी रेखाऎं
अपने अपने दिल
के मौसम का
हाल हैं दिखाते
किसी को किसी
के अन्दर का फिर भी
पता नहीं है चलता
मधुमक्खी भंवरे
चिड़िया की तरह
कोई नहीं यहां
है निकलता
रोज हर रोज है
मौसम बदलता
कब दिखें बादल और
सूखा पड़ जाये
कब चले बयार
और तूफाँ आ जाये
किसी को भी कोई
आभास नहीं होता
चले आते हैं फिर भी
मौसम का पता
कुछ यूँ ही लगाने
अपना अपना दिल
कुछ यूँ ही बहलाने ।

मंगलवार, 3 जनवरी 2012

दोस्त

आईना क्यों
नहीं दिखाता
मेरा सच मुझे
उसे देखने
के लिये
कहां से लाऊं
मैं तुम्हारी
पैनी नजर
आईना मेरा
दोस्त तो कभी
नहीं रहा
फिर भी
उसने कभी
नहीं दिखाया
मुझे मेरे अंदर
का हैवान
मैने सोचा
आईना दिखाता
है हमेशा सच
तुम्हारी पैनी
नजर बड़ी
कमाल की
है मेरे दोस्त
जो मेरा
आईना कभी
नहीं देख
पाया मेरे
अंदर छुपा
तुमने देख
ही डाला
अपनी इस
बाजीगरी को
देश के नाम
कर डालो
और दिखा,
दो दुनिया को
सारे वो सच
जो सामने
नहीं आते
किसी के
कभी भी
तुम्हें देख
कर छुप
नहीं पाते
आओ कुछ
करो देश
के लिये
मेरे तो झूट
बहुत छोटे हैं
इस देश
के सामने।

रविवार, 1 जनवरी 2012

अलविदा 2011

बहुत कुछ सिखा गया
मुझे यह बीता साल
कितना गलत पढ़ाता
रहा हूँ मैं सवाल
लोग कक्षा में वैसे तो
बहुत कम आ रहे हैं
पर कभी कभी आकर
जो वो पढा़ रहे हैं
पाठ्यक्रम में बिल्कुल
भी नहीं दिखा रहे हैं
सच बोलना है अंदर
बताया जाता रहा है
बाहर झूठ को गले से
लगाया जाता रहा है
जरूरत मुझको ही अब
पड़ गयी है फिर से
स्कूल जाने की
सच को झूठ बताके
बच्चों को पढ़ाने की
अगले साल शायद
सीख लूँ मै भी कलाकारी
ताकि आने वाले बच्चे
सीख लें थोड़ा मक्कारी
अपने को बचा के
शायद आगे ले जायेंगे
हम जैसे लोगों से खुद
व समाज को बचा पायेंगे।