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रविवार, 29 जून 2014

काम की बात काम करने वाला ही कह पाता है

पहली तारीख को
वेतन की तरह
दिमागी शब्दकोश
भी जैसे कहीं से
भर दिया जाता है
महीने के अंतिम
दिनो तक आते आते
शब्दों का राशन
होना शुरु हो जाता है
दिन भर पकता है
बहुत कुछ
ऊपर की मंजिल में
पर शाम होते ही
कुछ कुलबुलाना
शुरु हो जाता है
इसीलिये शायद
अपने आप को
अच्छी बातों में
व्यस्त रखने को
कहा जाता है
सूखे हुऐ पेड़ के
ठूँठ पर बैठे हुऐ
‘उलूक’ से कुछ भी
नहीं हो पाता है
पता नहीं किस तरह
की बेरोजगारी ने
जकड़ा हुआ है उसे
हर शख्स के चेहरे में
उसे एक आईना
लगा हुआ दूर से
ही नजर आता है
कुछ कहने ना कहने
की बात ही नहीं उठती
देखने के लिये उसे
अपना ही चेहरा
बस नजर आता है
हर शाख पै उल्लू बैठा है
किसलिये और क्यों
कहा जाता है
इस बात को इसी तरह
वो बहुत अच्छी तरह
से समझ पाता है
शाम होते होते
दिन भर के पकाये
हुऐ कुछ कुछ में से
कुछ यहाँ बियाबान में
परोसने के लिये
चला आता है
वैसे भी एक ही जैसी
चीजों को दिन भर
देख देख कर कोई भी
बोर हो जाता है
कहते हैं माहौल
बदलने से थोड़ा सा
मूड भी हल्का
हो ही जाता है ।

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