उलूक टाइम्स

बुधवार, 31 जुलाई 2013

बाहर के लिये अलग बनाते है अंदर की बात खा जाते हैं !

मुड़ा तुड़ा कागज का एक टुकड़ा
मेज के नीचे कोने में पड़ा मुस्कुराता है

लिखी होती है कोई कहानी अधूरी उसमें
जिसको कह लेना
वाकई आसान नहीं हो पाता है

ऎसे ही पता नहीं कितने कागज के पन्ने
हथेली के बीच में निचुड़ते ही चले जाते हैं

कागज की एक बौल होकर
मेज के नीचे लुढ़कते ही चले जाते हैं

ऎसी ही कई बौलों की ढेरी के बीच में बैठे हुऎ लोग
कहानियाँ बनाने में माहिर हो जाते हैं

एक कहानी शुरु जरूर करते हैं
राम राज्य का सपना भी दिखाते हैं
राजा बनाने के लिये किसी को भी
कहीं से ले भी आते हैं

कब खिसक लेते हैं बीच में ही और कहाँ को
ये लेकिन किसी को नहीं बताते हैं

अंदर की बात को कहना
इतना आसान कहाँ होता है
कागजों को निचोड़ना नहीं छोड़ पाते हैं

कुछ दिन बनाते हैं कुछ और कागज की बौलें
लोग राम और राज्य दोनो को भूल जाते हैं

ऎसे ही में कहानीकार और कलाकार
नई कहानी का एक प्लॉट ले
हाजिर हो जाते हैं ।

मंगलवार, 30 जुलाई 2013

सीधे सीधे बता पागल मत बना

कबीर जैसा कैसे बनूँ
कैसे कुछ ऎसा कहूँ

समझ में खुद के भी कुछ आ जाये
समझाना भी सरल सरल सा हो जाये

पहेलियाँ कहाँ किसी की
सहेलियाँ 
हुआ करती हैं
समझने के लिये दिमाग तो लगाना ही पड़ता है

जिसके पास जितना होता है
उतना ही बस खपाना पड़ता है

जिसके समझ में आ गई
जिंदगी को सुलझाता चला जाता है

उससे पहेली पूछने फिर
किसी को कहीं नहीं आना पड़ता है

उसका एक इशारा
अपने 
आप में पूरा संदेश हो जाता है

उसे किसी को कुछ
ज्यादा में बताना भी नहीं पड़ता है

दूसरी तरफ ऎसा भी कहीं पाया जाता है
जिसको आस पास का बहुमत ही पागल बनाता है

जहाँ हर कोई 
एक कबूतर को बस यूं ही देखता चला जाता है

पूछने पर एक नहीं हर एक
उसे कौवा एक बताना चाहता है

एक अच्छी भली आँखो वाले को
डाक्टर के पास जाना जरूरी हो जाता है
बस इन्ही बातों से कोई दीवाना सा हो जाता है

सीधे सीधे किसी बात को कहने में शरमाता है

कभी आदमी को गधा
कभी गधे को आदमी बनाना सीख जाता है

समझने वाला
समझ भी अगर जाता है
समझ में आ गया है करके
किसी को भी बताना नहीं चाहता है

अब आप ही बताइये

बहुमत छोड़ कर
कौन ऎसे पागल के साथ में आना  जाना चाहता है ।

सोमवार, 29 जुलाई 2013

सभी देखते हैं, मोर नाचते हैं. कितने बाँचते हैं !

सभी को दिखाई
दे जाते हैं रोज
कहीं ना कहीं
कुछ मोर उनके
अपने जंगलों
में नाचते हुऎ
सब लेकिन
कहाँ बताते है
किसी और को
जंगल में मोर
नाचा था और
उन्होने उसे
नाचते हुए
देखा था
बस एक तेरे
ही पेट में
बातें जरा सा
रुक नहीं
पाती हैं
मोर के नाच
खत्म होते ही
बाहर तुरंत
निकल के
आती हैं
पता है तू
सुबह सुबह
जंगल को
निकल के
चला जाता है
शाम को लौट
के आते ही
मोर के नाच
की बात रोज
का रोज यहाँ
पर बताता है
बहुत सारे
मोर बहुत से
जंगलो में रोज
नाचते हैं
बहुत सारे
लोग मोर
के नाच को
देखते हैं फिर
मोर बाँचते हैं
कुछ मोर
बहुत ही
शातिर माने
जाते हैं
अपने नाचने
की खबर
खुद ही
आकर के
बता जाते हैं
क्यों बताते हैं
ये बात
सब की
समझ में
कहाँ आ
पाती है
कभी दूसरे
किसी जंगल
से भी एक
मोर नाचने
की खबर
आती है
यहाँ का
एक मोर
वहां बहुत
दिनो से
नाच रहा है
कोई भी
उसके नाच
को पता
नहीं क्यों
नहीं बाँच
रहा है
तब जाके
हरी बत्ती
अचानक ही
लाल हो
जाती है
बहुत दिनों
से जो बात
समझ में
नहीं आ
रही थी
झटके में
आ जाती है
मोर जब
भी कहीं
और किसी
दूसरे जंगल
में जाना
चाहता है
अपना नाच
कहीं और
जाकर दिखाना
चाहता है
जिम्मेदारी
किसी दूसरे को
सौंपना नहीं
चाहता है
बिना बताये
ही चला
जाता है
बस दूसरे
मोर को
जंगल में
नाचते रहना
का आदेश
फोन से
बस दे
जाता है
इधर उसका
मोर नाच
दिखाता है
उधर उसका
भी काम
हो जाता है
सब मोर
का नाच
देखते हैं
किसी को
पता नहीं
चल पाता है ।

रविवार, 28 जुलाई 2013

किस को करना है हिट किसको जाना है पिट मिलकर बतायें

स्कोर क्या हुआ
कहीं दो कहीं तीन
कहीं तो कुछ
भी नहीं हुआ
आया जरूर था
कह कर नहीं गया
बस जीरो एक दिखा
कितने हिट मिले
रोज का रोज
कौन गिनता फिरे
कहीं उम्दा दिखे
कहीं सुंदर दिखे
कहीं वाह वाह
हर कोई लिखे
कुछ समझ में
थोड़ा सा आये
कुछ पूरा ऊपर
ऊपर ही निकल
कर उड़ जाये
अब किससे
क्या कहा जाये
सब्जी की दुकान में
मछली भी मिल जाये
गूगल से बुलाये
ट्वीटर से हकाये
खुद आये ना आये
पता चिपका कर
ही चला जाये
ब्लागिंग की दुनिया
गोल है चपटी नहीं
इधर से जाने वाला
उधर भी मिल जाये
मैं तेरे घर में आऊँ
तू मेरे घर में आये
मैं तेरे पै दे जाऊँ
तू मेरे पै दे जाये
ना बैट नजर आये
ना बौल नजर आये
आँख बंद कर के
चौके छक्के उड़ाये
टिप्पणी के खेल
का तेंदुलकर हो जाये
अपना अपना
बैट अपने साथ
लेकर आयें
अपनी बौल
दूसरे के हाथ
ना थमायें
टीम भावना
सर्वोपरि बनायें
फुटबाल खेलने
वालों को काहे
मैच देखने के
लिये बुलायें
अच्छा हो
अगर इस सब
को नियम बना
संविधान में
भी ले आयें
देश एक है
नेता एक हैं
हम भी साथ
कुछ निभायें ।

शनिवार, 27 जुलाई 2013

लिखने से कोई विद्वान नहीं होता है


सम्पादक जी को
देखते ही 
साथ में किसी जगह कहीं 
मित्र से
रहा नहीं गया 
कह बैठे यूँ ही

भाई जी
ये भी लिख रहे हैं 
कुछ कुछ आजकल 

कुछ कीजिये इन पर भी कृपा 

कहीं
पीछे पीछे के पृष्ठ पर ही सही
थोड़ा सा
इनका कुछ छापकर 

क्या पता किसी के
कुछ
समझ में भी आ जाये

ऎसे ही कभी
बड़ी ना सही 
कोई छोटी सी दुकान 
लिखने पढ़ने की
इनकी भी कहीं
किसी कोने में एक खुल जाये 

मित्रवर की
इस बात पर 
उमड़ आया बहुत प्यार
मन ही मन किया उनका आभार 

फिर मित्र को
समझाने के लिये बताया 

पत्रिका में
जो छपता है 
वो तो कविता या लेख होता है 

विद्वानो के द्वारा
विद्वानो के लिये
लिखा हुआ
एक संकेत होता है 

आप मेरे को
वहाँ कहाँ अढ़ा रहे हो
शनील के कपडे़ में
टाट का टल्ला 
क्यों लगा रहे हो 

मेरा लिखना
कभी भी
कविता या लेख नहीं होता है 

वो तो बस
मेरे द्वारा
अपने ही 
आस पास
देखी समझी गयी
कहानी का
एक पेज होता है 

और आस पास
इतना कुछ होता है
जैसे
खाद बनाने के लिये 
कूडे़ का
एक ढेर होता है 

रोज
अपने पास इसलिये 
लिखने के लिये 
कुछ ना कुछ
जरूर होता है 

यहाँ आ कर
लिख लेता हूँ 

क्योंकि 
यहाँ लिखने के लिये ही
बस एक विद्वान होना
जरूरी नहीं होता है 

खुद की
समझ में भी
नहीं 
आती हैंं
कई बार कई बात 

उसको भी
कह देने से 
किसी को कोई भी 
कहाँ यहाँ
परहेज होता है 

विद्वान लोग
कुछ भी
नहीं लिख देते हैं

'उलूक'
कुछ भी
लिख देता है

और 
उसका
कुछ मतलब
निकल ही आये 
ये जरूरी भी
नहीं होता है ।

चित्र साभार: http://www.clipartpanda.com/