जब भी तू
समझाने की कोशिश करता है
दो और दो चार
कोई भाव नहीं देता है
सब ही कह देते हैं दूर से ही नमस्कार
जमाने की नब्ज में बैठ कर जिस दिन
शुरु करता है तू
शब्दों के साथ व्यभिचार
जयजयकार गूँजती है चारों ओर
और समझ में आना शुरु होता है
उसी क्षण से व्यवहार।
'सरगोशीयों के स्वर' में मुद्रित24 पृ65
'सरगोशीयों के स्वर' में मुद्रित24 पृ65
