उलूक टाइम्स: धनुष
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गुरुवार, 29 अगस्त 2019

‘फॉग’ चल रहा है ‘डबल क्रॉस’ चल रहा है खुश्बुओं का जोर है बस फैलने फैलाने को मचल रहा है


कहीं 
‘फॉग’
चल रहा है 

कहीं
‘डबल क्रॉस’
चल रहा है 

मौसम
बारिश का है 

मौज में

बस 
भ्रम
फैलाने को
बदल रहा है 

सफल है
सफलता है 

सीखने
सिखाने
को
मिल रहा है 

खाली
तरकश है 
खून खराबे
से ही
बस
उसे
बड़ी नफरत है 

बस
तीर को
ही
छल रहा है 

बन्दूकें हैं
बन्द सन्दूकों में हैं 

अपनी
रक्षा का
अधिकार है 

संवैधानिक है
स्वीकार है 

कुछ खेल हैं
 कुछ खिलौने हैं 

एक धनुष
बिना प्रत्यंचा
का

बस
दिखाने
को ही
निकल रहा है 

तेजी है
रफ्तार है

चाँद छोड़
 मंगल
तक
 जाने को
तैयार है 

घर की
औरतों के

बस
गहने
ही
बेच खाने
को
मचल रहा है 

जश्न
के
शोर हैं

आशाओं
के
सपनों को

बहकाने
वाले
मोर हैं 

सब कुछ
बदल रहा है

‘उलूक’
ध्यान
किस ओर है 

घर
पूरा
हिल रहा है

और 
तेरा
‘फॉग’
चल रहा है 
‘डबल क्रॉस’
चल रहा है

खुश्बुओं
का
जोर है

बस
फैलने
फैलाने को
मचल रहा है ।



मंगलवार, 19 मार्च 2019

इस होली पर दिखा देता हजार रंग गिरगिट क्या करे मगर चुनाव उसके सामने से आ जाता है

होली

खेल
तो सही

थोड़ी सी

हिम्मत की
जरूरत है

सात रंग
तेरे
बस में नहीं

तेरी
सबसे बड़ी
मजबूरी है

बातों
में तेरे
इंद्र भी
दिखता है

धनुष भी

तू
किसी तरह
भाषण में
ले आता है

इन्द्र धनुष
लेकिन
कहीं भी

तेरे
आस पास
दूर दूर तक
नजर
नहीं आता है

रंग ओढ़ना

कोई
तुझसे सीखे

इसमें कोई
शक नहीं है

होने भी
नहीं देगा
तू

तेरे
शातिर
होने का

असर
और पता

मेरे
घर में

मेरे
अपनों की

हरकत से
चल जाता है

कुत्तों
की बात

इन्सानों
के बीच में

कहीं पर
होने लगे

अजीब
सी बात
हो जाती है

आठवाँ
आश्चर्य
होता है

जब
आदमी भी

किसी
के लिये

कुत्ते
की तरह
भौंकना

शुरु
हो जाता है

सारे रंग
लेकर
चले कोई
उड़ाने
भी लगे

किसे
परेशानी है

घर का
मुखिया
ही बस

एक लाल
रंग के लिये

वो भी
पर्दा
डाल कर

पीछे
पड़ जाता है

तो
रोना आता है

मुबारक
हो होली

सभी
चिट्ठाकारों को

टिप्पणी
करने
वालों

और
नहीं करने
वालों को भी

टिप्पणी
के साथ
मुफ्त
टिप्पणी
के ऑफर
के साथ

इन्सान
ही होता है

गलती
से चिट्ठा भी
लिखने लगता है

चिट्ठाकारों
में शामिल
भी हो जाता है

‘उलूक’
को तो
वैसे भी

नहीं
खेलनी है
होली

इस होली में

बिरादरी में
किसी का
मर जाना

त्यौहार ही
उठा
ले जाता है ।

चित्र साभार:
https://www.theatlantic.com/

मंगलवार, 24 अक्टूबर 2017

हर सफेद बोलने वाला काला एक साथ चौंच से मिला कर चौंच खोलता है

गरम
होता है
उबलता है
खौलता है

कभी
किसी दिन
अपना ही लहू
खुद की
मर्दानगी
तोलता है

अपना
ही होता है
नजदीक का
घर का आईना
रोज कब कहाँ
कुछ बोलता है

तीखे एक तीर
को टटोलता है
शाम होते ही
चढ़ा लेता
है प्रत्यंचा
सोच के
धनुष की

सुबह सूरज
निकलता है
गुनगुनी धूप में
ढीला कर
पुरानी फटी
खूँटी पर टंगी
एक पायजामे
का इजहार

बह गये शब्दों
को लपेटने
के लिये
खींच कर
खोलता है

नंगों की
मजबूरी
नहीं होती है
मौज होती है

नंगई
तरन्नुम में
बहती है
नसों में
हमखयालों
की एक
पूरी फौज के
कदमतालों
के साथ

नशेमन
हूरों की
कायानात के
कदम चूमता है
हिलोरे ले ले
कर डोलता है

‘उलूक’
फिर से
गिनता है
कौए अपने
आसपास के

खुद के
कभी हल
नहीं होने वाले
गणित की नब्ज

इसी तरह कुछ
फितूर में फिर
से टटोलता है ।

चित्र साभार: Daily Mail

शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2016

कैसे नहीं हुआ जा सकता है अर्जुन बिना धनुष तीर और निशाने के


जरूरी नहीं है अर्जुन ही होना
ना ही जरूरी है 
हाथ में धनुष और तीर का होना

कोई जरूरी नहीं है किसी द्रोपदी के लिये
कहीं कोई स्व्यंवर का होना
आगे बढ़ने के लिये जरूरी है बस
मछली की आँख का सोच में होना

खड़े खड़े रह गये एक जगह पर
शेखचिल्ली की समझ में समय तब आता है जब
बगल से निकल कर चला गया कोई धीरे धीरे
अर्जुन हो गया है का समाचार बन कर अखबार में
छ्पा हुआ नजर आना शुरु हो जाता है

समझ में आता है कुछ हो जाने के लिये
आँखों को खुला रख कर कुछ नहीं देखा जाता है
कानों को खुला रख कर सुने सुनाये को
एक कान से आने और दूसरे कान से जाने
का रास्ता दिया जाता है

कहने के लिये अपना खुद का
कुछ अपने पास नहीं रखा जाता है
इस का पकाया उस को और
उस का पकाया किसी को खिला दिया जाता है

नीरो की तरह बाँसुरी कोई नहीं बजाता है
रोम को खुद ही अपने ही किसी से
थोड़ा थोड़ा रोज जलाये जाने के तरीके सिखला जाता है

एक दो तीन दिन नहीं महीने नहीं साल हो जाते हैं
सुलगना जारी रहता है
अर्जुन हो गये होने का प्रमाण पत्र लिये हुऐ
ऐसे ही कोई दूसरी लंका के सोने को उचेड़ने की सोच लिये
राम बनने के लिये अगली पारी की तैयारी के साथ
सीटी बजाता हुआ निकल जाता है

‘उलूक’ देखता रह अपने अगल बगल
कब मिलती है खबर
दूसरा निकल चुका है मछली की आँख की सोच लेकर
अर्जुन बनने के लिये अर्जुन के पद चिन्हों के पीछे
कुछ बनने के लिये फिर एक बार
रोम को सुलगता रहने देने का
आदेश किस अपने को दे जाता है ।

चित्र साभार: Clipart Kid
'सरगोशीयों के स्वर' में मुद्रित 19 पृ54