उलूक टाइम्स: चिट्ठाकार
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शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

चिट्ठाकार हैं कुछ स्वाभिमानी हैं कुछ थोड़ा सा बस पानी पानी हैं

 
थोड़ी सी हैं कुछ बातें हैं
खुद की हैं जो
खुद को बस थोड़ी सी समझानी हैं

किसी और से क्या कहना है कुछ
जब समझ में उसको
उसकी अपनी ही बातें नहीं आनी हैं

दिखता जो कुछ है
उसपर कुछ लिखना है
कहानी तो बस कुछ और ही
दिखे से इतर दो एक बनानी हैं

गांधी रखकर खोज  में अपनी
बंदर तीन उठा गोद में अपनी
नाख  कान आंख अपनी ही
खुद की ही तो बंद करवानी हैं

सच ही सोचेंगे सच ही खोदेंगे
सच की ही लड़ाई 
लड़ने को  ही
बस कुछ लिखने में ही ठानी है

अपने अपने लिखे लिखाए में
अपनी बातें इसकी बातें उसकी बातें
बातें तो बस आनी जानी हैं

कुछ पढ़ते हैं इसका ही लिखा
कुछ को लिखा उसका बस पढ़ना है
कुछ को बस लिखना ही है
पढ़ना ही बस बेमानी है

कुछ लिखते पढ़ते हैं
कुछ पढ़ते हैं फिर लिखते हैं
सब की अपनी आदत हैं
समझ में कुछ कुछ ही तो आनी हैं

चिट्ठाकारी से जन्मे हैं
कुछ चिट्ठे हैं
चिट्ठाकार हैं कुछ
स्वाभिमानी हैं
कुछ थोड़ा सा बस
पानी पानी हैं
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                                            चित्र साभार: https://www.dreamstime.com/

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मंगलवार, 2 जनवरी 2024

ऐसे ही २०२४ नहीं है आया कल्कि आयेंगे सुना है अभी तो मंदिर ही है आया



लिखना बंद हुआ ‘उलूक’ कुछ दिन
मगर क्यों हुआ समझ में ही नहीं आया
पढ़ना बंद किया लोगों ने
क्यों कोई आस पास लिखे के नजर नहीं आया

सोचेंगे ही नहीं अब पढ़ने वालों के बारे में
एक नया साल है अब आया
लिखेंगे मनमौजी कुछ भी कहीं भी
लिखने वाला आँखिर क्यों कर शरमाया

लिख रहे है ‘रविकर’ लिख रहे हैं ‘विश्वमोहन’
‘रूपचन्द्र’ का लिखना कौन रोक पाया
विद्वानों की पंक्ति इतनी सी भी नहीं है
एक से एक हैं यहाँ ये आया वो भी आया

दूरदर्शन अखबार समाचार सब ही आभासी हैं 
सब जानते हैं लोग किस ने है कब्जाया
चिट्ठा ज़िंदा है अभी कुछ
कुछ कुछ हैं चिट्ठाकार
लिखते हैं निर्भीक कुछ नहीं कमाया

कुछ लिखते अपनी कुछ लिखते हैं पतंग
कुछ ने दिनचर्या लिखने का मन है बनाया
‘उलूक’ लिखता है भडास हमेशा
बकवास को पढ़ने कौन इच्छा से सामने है आया

चित्र साभार: https://in.pinterest.com/pin/607493437217436922/

शनिवार, 1 जुलाई 2017

चिट्ठाकार चिट्ठाकारी चिट्ठे और उनका अपना दिन एक जुलाई आईये अपनी अपनी मनायें


चिट्ठा 
रोज भी लिखा जाता है 

चिट्ठा 
रोज 
नहीं भी लिखा जाता है 

इतना कुछ
होता है आसपास 

एक के नीचे 
तीन 
छुपा ले जाता है 

मजबूरी है 
अखबार की भी 

सब कुछ 
सुबह लाकर 
नहीं बता पाता है 

लिखना लिखाना 
पढ़ना पढ़ाना 
एक साथ एक जगह 
होता 
देखा जाता है 

चिट्ठाकारी 
सबसे बड़ी है 
कलाकारी 

हर कलाकार 
के 
पास होता है 
पर्दा खुद का 

खुद ही खोला 
खुद ही 
गिराया जाता है 

खुद छाप लेता है 
रात को 
अखबार अपना 

सुबह 
खुद ही पढ़ने 
बिना नागा 
आया जाता है 

अपनी खबर 
आसानी से छपने की 
खबर मिलती है 

कितने लोग 
किस खबर 
को
ढूँढने 

कब निकलते है

बस यही अंदाज 
यहाँ
नहीं लगाया 
जाता है 

जो भी है 
बस लाजवाब है 
चिट्ठों की दुनियाँ

‘उलूक’ 
अपनी लिखी किताब
खुद बाँचना

यहाँ के अलावा 
कहीं और
नहीं 
सिखाया जाता है । 

“ हैप्पी ब्लॉगिंग” 

चित्र साभार: Dreamstime.com

शुक्रवार, 30 जून 2017

बुरा हैड अच्छा टेल अच्छा हैड बुरा टेल अपने अपने सिक्कों के अपने अपने खेल

           
              चिट्ठाकार दिवस की शुभकामनाएं ।


आधा
पूरा 
हो चुके 


साल
के 
अंतिम दिन 

यानि

ठीक 
बीच में 

ना इधर 
ना उधर 

सन्तुलन 
बनाते हुऐ 

कोशिश 
जारी है 

बात
को 
खींच तान 
कर

लम्बा 
कर ले 
जाने
की 

हमेशा 
की
तरह 

आदतन 

मानकर

अच्छी
और 
संतुलित सोच 
के
लोगों को 

छेड़ने
के लिये 
बहुत जरूरी है 

थोड़ी सी 
हिम्मत कर 

फैला देना 
उस
सोच को 

जिसपर 

निकल
कर 
आ जायें 

उन बातों 
के
पर 

जिनका 
असलियत 
से

कभी 
भी कोई 
दूर दूर 
तक
का 
नाता रिश्ता 
नहीं हो 

बस

सोच 
उड़ती हुई 
दिखे 

और 
लोग दिखें 

दूर 
आसमान 
में कहीं 

अपनी
नजरें 
गढ़ाये हुऐ 

अच्छी
उड़ती हुई
इसी 
चीज पर 

बंद
मुखौटों 
के
पीछे से 

गरदन तक 
भरी

सही 
सोच को 

सामने लाने 
के
लिये ही

बहुत
जरूरी है 

गलत
सोच के 

मुद्दे

सामने 
ले कर
आना 

डुगडुगी
बजाना 

बेशर्मी के साथ 

शरम
का 
लिहाज 
करने वाले 

कभी कभी 

बमुश्किल 
निकल कर 
आते हैं
खुले में

उलूक’ 

सौ सुनारी 
गलत बातों
पर 

अपनी अच्छी 
सोच
की 

लुहारी
चोट 
मारने
के
लिये।

सोमवार, 8 फ़रवरी 2016

श्रद्धांजलि अविनाश जी वाचस्पति



एक चिट्ठाकार का चले जाना
कोई नयी बात नहीं होती है
सभी जाते हैं जाना ही होता है

चिट्ठेकार का कोई बिल्ला
ना आते समय चिपकाया जाता है ना जाते समय
कुछ चिट्ठेकार जैसा बताने वाला
चिपकाया हुआ उतारा ही जाता है

तुम भी चल दिये चिट्ठे कितना रोये पता नहीं
चिट्ठों में दिखता भी नहीं है
चिट्ठों की खुशी गम हंसना या रोना

कुछ चिट्ठे कम हो जाते हैं
कुछ चिट्ठे गुम हो जाते हैं
कुछ गुमसुम हो जाते हैं

विश्वास होता है किसी को
कि ऐसा ही कुछ होता है
इसी विश्वास के कारण
निश्वास भी होता है

आना जाना खोना पाना तो लगा रहता है
तेरे आने के दिन क्या हुआ पता नहीं
चिट्ठों का इतिहास जैसा अभी किसी चिट्ठेकार ने
कहीं लिख दिया हो ऐसा भी दिखा नहीं

जाने के दिन टिप्पणी नहीं भी मिलेगी तो भी
श्रद्धांजलि जगह जगह
इफरात से एक नहीं कई बार
चिट्ठे में ही नहीं कई जगह
दीवार दर दीवार मिलेगी

बहुत सारे चिट्ठेकारों में से एक
अब बहुत बड़ा कह लूँ
कम से कम जाने के बाद
तो बड़ा और बड़े के आगे
बहुत लगा लेना जायज हो ही जाता है

दुनियाँ की यादाश्त वैसे भी
बड़ी बड़ी बातों को
थोड़ी देर तक जमा करने की होती है

चिट्ठे चिट्ठाकारी चिट्ठाकार जैसा
बहुत सारा बहुत कुछ
गूगल में ही गडमगड होकर
गजबजा जाता है

‘उलूक’ तू भी आदत से बाज नहीं आ पाता है
तुझे और तेरी उलूकबाजी को
उड़ने का हौसला देने वाले के जाने के दिन भी
तुझसे कुछ उलटा सीधा कहे बिना नहीं रहा जाता है

‘अविनाश जी वाचस्पति’
अब नहीं रहे इस दुनियाँ में
थोड़ी देर के लिये मौन रहकर
श्रद्धा से सर झुका कर
श्रद्धांजलि देने के लिये
दोनो हाथ आकाश की ओर
क्यों नहीं उठाता है ।


चित्र साभार: nukkadh.blogspot.com

गुरुवार, 19 फ़रवरी 2015

ब्लागर होने का प्रमाणपत्र कहाँ मिल पायेगा कौन बतायेगा

चिट्ठाकार कौन है
कौन बतायेगा
खुद को समझने
लगे कोई यूँ ही
तो क्या
किया जायेगा
किसी को तो
बताना ही पढ़ेगा
या हर कोई यहाँ
बेलगाम हो जायेगा
बपौती मेरी नहीं है
मुझे मालूम है
पर सुनने में बुरा
सबसे पहले उसे
ही लगेगा
जो होगा नहीं और
इसी बात को लेकर
बात ही बात में
बड़बड़ायेगा
टिप्पणी एक
बहुत खतरनाक
चीज है
किसे पता है कौन देगा
और कहाँ दे जायेगा
जमघट होता है
दिखता है क्यों होता है
समझ में किसके
आ पायेगा
ब्लागर की ब्लागरी
का भूत कौन
उतार पायेगा
तूने कह तो दिया
सब सतह में है
तैरता हुआ जैसे
तेरे कहने पर
कौन मुहर लगायेगा
चिट्ठाकारी की इंदीरा
कौन होगी कौन मोदी
अपने को बतायेगा
‘उलूक’ तू यहाँ क्यों है
 तेरी समझ में
ना आने वाला है
ना आ पायेगा
तुझे तो बस फैलाना है
कहीं ना कहीं कुछ कूड़ा
डस्टबिन सरकारी
किसी सरकार का
तुझे कभी भी
उपलब्ध नहीं हो पायेगा
लिखता रह कुछ भी
कभी भी कहीं भी
बिना किसी प्रमाणपत्र
के तू कभी एक
ब्लागर नहीं हो पायेगा ।

 चित्र साभार: whatsupaggiehort.blogspot.com