यूँ ही अचानक
कैसे हुआ इतना बड़ा कुछ
तब तक समझ में नहीं आयेगा
उसके धीरे धीरे थोड़ा थोड़ा होने के निशान रोज के
अपने आसपास अगर देख नहीं पायेगा
इतने दिन भी नहीं हुऐ हैं
कि याद ना आयें खरोंचें लगी हुई सोच पर
और भूला जाये रिसता हुआ कुछ
जो ना लाल था ना ही उसे रक्त कहना सही होगा
अपने आस पास के नंगे नाँचों के बगल से
आँख नीची कर के निकल जाने को
वैसे याद नहीं आना चाहिये
भूल जाना सीखा जाता है
यद्यपि वो ना तो बुढ़ापे की निशानी होता है
ना ही उसे डीमेंशिया कहना ठीक होगा
ऐसे सारे महत्वाकाँक्षाओं के बबूल बोने के लिये
सौंधी मिट्टी को रेत में बदलते समय
ना तो शर्म आती है ना ही अंधेरा किया जाता है
छोटे छोटे चुभते हुवे काँटो को
निकाल फेंकने के लिये भी समय कहाँ होता है
बूँद दर बूँद जमा होते चले जाते हैं
सोच की नर्म खाल को ढकते हुऐ से
मोमबत्तियाँ तो सम्भाल कर ही रखी जाती हैं
जरा सा में टूट जाती हैं
मोम बिना जलाये भी बरबाद हो जाता है समय के साथ
और हर बार एक दुर्घटना फिर झिंझोड़ जाती है
पूछते हुऐ कितनी बार और
किस किस छोटी घटना से
बचते हुऐ अपने आसपास की आँखे फेरेगा ‘उलूक’
जो दिखाई और सुनाई दे रहा है
वो अचानक नहीं हुआ है
महत्वाकाँक्षाओं के मुर्दों के कफनों के
जुड़ते चले जाने से बना
विशाल एक झंडा हो गया है
जो लहरायेगा बिना हवा के
ढक लेगा सोच को
कहीं कुछ भी
नजर आने लायक नहीं रह जायेगा
सौंधी मिट्टियों से बनी रेत की
आँधियों में सब उड़ जायेगा
कुछ नहीं बचेगा
महत्वाकाँक्षाओं के भूतों से लबालब
एक शमशान हो जायेगा।





