भैंस के बराबर काले अक्षरों को
रोज चरागाह पर चराने की आदत
किसी को हो जाना एक अच्छी बात है
अक्षरों के साथ खेलते खेलते
घास की तरह उनको उगाना
शुरु हो जाना बहुत बुरी बात है
बिना एक सोच के
खाली लोटे जैसे दिमाग में शायद
हवा भी रहना नहीं चाहती है
ऐसे में ही सोच
खाली में से खाली खाली ही
कुछ बाहर निकाल कर ले आती है
उसी तरह से जैसे
किसी कलाकार की कूँची
किसी एक को
किसी एक को
एक छोटा सा झाड़ू जैसा नजर आती है
साफ जगह होने से कुछ नहीं होता है
झाड़ने की आदत से मजबूर
सफाई को तक बुहारना शुरु हो जाती है
सफाई को तक बुहारना शुरु हो जाती है
बहुत कुछ होता है
आसपास के लोगों के दिमाग में
और हाथ में भी
पर मंद बुद्धी का क्या किया जाये
वो अपनी बेवकूफियों के हीरों के सिवाय
कुछ भी देखना नहीं चाहती है
और क्या किया जाये
‘उलूक’ तेरी इस फितरत का
जो सोती भी है सपने भी देखती है
जो सोती भी है सपने भी देखती है
नींद में होने के बावजूद
आँखे पूरी की पूरी
खुली नजर भी आती हैं ।
आँखे पूरी की पूरी
खुली नजर भी आती हैं ।
बढ़िया है भाई जी-
जवाब देंहटाएंआभार
बढ़िया प्रस्तुति ..
जवाब देंहटाएंबहुत सुन्दर प्रस्तुति।
जवाब देंहटाएं--
आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (10-06-2014) को "समीक्षा केवल एक लिंक की.." (चर्चा मंच-1639) पर भी होगी!
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक
सुशील जी, आपकी रचनाएँ सदैव ही विचारोद्दोलक होती हैं, सार्थक रचना!
जवाब देंहटाएंकल 11/जून/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
जवाब देंहटाएंधन्यवाद !
बहुत सुन्दर और सटीक अभिव्यक्ति....
जवाब देंहटाएंमैं आपके कविता पढ़कर मुस्कुरा भी देता हूँ और सोच में भी पड़ जाता हूँ। आपने अक्षरों, सोच और आदतों को जिस तरह जोड़ा है, वह सीधा दिमाग पर असर करता है। मुझे “भैंस के बराबर काले अक्षर” वाली पंक्ति खास लगी, क्योंकि आपने सीखने और समझने के फर्क को साफ कर दिया।
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