उलूक टाइम्स

शनिवार, 4 फ़रवरी 2012

बंदर

बंदर
अब जंगल में
नहीं पाये जाते हैं

पहाड़
के कस्बे में
कूड़े के ढेर पर
खाना ढूंढते हुऐ
देखे जाते हैं

बंदर
देख रहा है
गाँव के घर को
टूटता हुवा

गाँव
के लोगों को
मैदान की ओर
फूटता हुवा

बंदर
को भी
आदमी का
व्यवहार

अब
बहुत अच्छी
तरह समझ मेंं
आने लगा है

नकलची बंदर

कोशिश कर
अपने को
आदमी ही
बनाने लगा है

ऎसा ही
होता रहा
तो वो दिन
दूर नहीं

जब
आप देखेंगे
बंदर सपरिवार
पहाड़ छोड़
देहरादून को
जाने लगा है

वैसे भी
बंदर अब
बंदर नहीं
रह गया है

प्राकृतिक
भोजन और
रहन सहन के बिना

अब
आदमी जैसा
ही हो गया है

बंदर
के बच्चे
बच्चों की
तरह प्यारे
कोमल
दिखाई दिया
करते थे कभी

कूड़े
के ढेर से
शुरू किया
है पेट भरना
बंदर ने जब से

बच्चे
भी हो गये हैं
उसके बूढे़ से
रूखे सूखे से तब से

आदमी
का बच्चा
भी दिखने लगा
है जैसा अभी

बंदर
जानता है
आदमी ने
पहाड़ को
बनाना नहीं है

जंगल
को पनपाना
भी नहीं है

आदमी
तो व्यस्त है

खबरे सिलने
बनाने में

बंदर के
उजड़ने
की खबर
अखबार टी वी
पर दिखाने में

जंगल
पर डाक्यूमेंटरी
बनवाने में

जानवरों
के नाम पर
फंड उगवाने में

एन जी ओ
चलाने में

बंदर ने भी
छोड़ दिया
आदमी पर
करना विश्वास

जंगल
को छोड़
बंदर चल दिया
लेकर एक नयी आस

बनाने
मैदानी शहर में
एक आलीशान
आशियाना

इससे पहले
आदमी
समझ सके
बंदर समझ चुका है

और बंदर
को भी ना पडे़
कुछ भी
अपनी तरफ से
फाल्तू में
उसको समझाना।

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2012

गधा

गधा धोबी को छोड़
कौन पालना है चाहता
पर कभी अनायास मुझे
जरूर है याद दिलाता
बच्चा गधा गधे का बच्चा
भोला होता है और सच्चा
जवान तगड़ा
कुवाँरा गधा
बेरोजगार गधा
रोजगार में गधा
मुहब्बत की खोज में
खो जाता है गधा
मुहब्बत मिल गयी अगर
पागल हो जाता है गधा
गधे को देख देख
खुश हो जाता गधा
गधे से ही फिर कभी
दुखी हो जाता गधा
शादी शुदा परिवार
का मारा गधा
बीबी बच्चों के दुलार
का मारा गधा
हर तरफ गधों की
भरमार से
घबराता गधा
ढेंचू ढेंचू
आवाज करना
चाह कर भी ना
कर पाता गधा
घर के दरवाजे पर
गधों का नाम
खुदवाता गधा
हरेक बात पर
सर हिलाता गधा
समझ लेता
है सबकुछ
गधों को
समझाता गधा
पागलों का
सरदार भी
कहलाता गधा
गधों का सरदार
भी हो जाता
वो ही गधा
गधों के प्रकार
बताता गधा
अपने को गधों से
बाहर पाता गधा
गधों के प्रतिशत का
हिसाब लगाता गधा
वोट देने हर बार
हो आता गधा
अपने गधे को
जिता नहीं पाता गधा
गधों की सरकार
कभी नहीं बना
पाता गधा
गधे का गधा
ही रह जाता गधा ।

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2012

हाथी का स्वागत है।

पेडो़ के कटने से
जंगल के हटने से
हाथी परेशान है
खाने की कमी है
इसलिये गांव की
तरफ रुझान है
आदमी से टकरा रहा है
आदमी उसको
जंगल को भगा रहा है
मैदान में घमासान है
पहाड़ तो पहाड़ हैं
रह गये सिर्फ हाड़ हैं
खबर कुछ नई
इस प्रकार है
हाथी भी अब
पहाडो़ पर आने
को तैयार है
ये खुशी की बात है
यहां जगह की
बहुत इफरात है
आदमी को पहाड़
से वैसे भी क्या
काम है
हाथी यहाँ आयेगा
चैन की बंसी बजायेगा
आदमी वैसे भी
यहां बहुत दिनो
तक अब नहीं
टिक पायेगा
सरकार का सर दर्द
भी जायेगा
फिर गैरसैंण कोई
नहीं चिल्लायेगा
जंगल को बचायेंगे
हाथी का पहाड़ मे
बड़ा घर बनायेंगे
कुछ खुद ही चले
जा रहे हैं पहाड़ से
बचे कुचे लोगों को
मिलकर हम भगायेंगे
पहाड़ को बचायेंगे।

बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

मौन की ताकत

कुछ
मौन रहे
कुछ रहे
चुप चुप

कुछ
लगे रहे
कोशिश में

लम्बे
अर्से तक
उनको
सुनने की
छुप छुप

पर
कहां
कैसे सुन पाते

कोई
मूड में
होता
सुनाने के
जो सुनाते

एक
लम्बे दौर
का आतंक
अत्याचार
भ्रष्टाचार

धीरे धीरे
चुपचाप
गुमसुम
बना देता है

हिलता
रहता मौन

अंदर से
सिमटते
सिमटते

अपने
को ठोस
बना देता है
मजबूत
बना देता है

ऎसे
मौन की
आवाज

कोई
ऎसे ही

कैसे
सुन सकता है

वो
जो ना
बोल सकता है

ना कुछ
कह सकता है

ऎसे
सारे मौन
व्यक्त
कर चुके हैं

अपने अपने
आक्रोश

बना चुके हैं
एक कोश

किसने
क्या कहा
किसने
क्या सुना
कोई नहीं
जान पायेगा

पर
हरेक
का मौन

एक होकर
अपनी बात

सबको
एक साथ
चिल्ला चिल्ला
के सुनायेगा

आतंकियों
भ्रष्टाचारियों
अत्याचारियों को

पता है
मौन की बात

अब ये
सारे लोग

खुद
आतंकित
होते चले जायेंगे

मौन
ने बोये हैं
जो बीज
इस बीच

प्रस्फुटित होंगे

बस
इंतजार है
कुछ और
दिनो का

धीरे धीरे
सारे मौन
खिलते
चले जायेंगे

किसका
कौन सा
मौन रहा होगा

कोई कैसे
जान पायेगा

जब
सब से
एक सा
एक साथ
प्रत्युत्तर पायेगा

खिलेगा
मौन का फूल

महकेगा

आतंक
अत्याचार
व्यभिचार
भ्रष्टाचार
की जमीन पर

ठीक
उसी कमल
की तरह

जिसे
कीचड़ में
भी खिलना
मंजूर होता है

मौन
मुखरित होगा

मौन
सुनेगा
मौन के गीत

मौन गायेगा
मौन मुस्कुरायेगा ।

मंगलवार, 31 जनवरी 2012

वोट घुस गया

लम्बे इंतजार के बाद
हुवा आज मैं सपरिवार
वोट देने के लिये तैयार
बहुत खुश था जैसे
बनाने जा रहा था अपनी
केवल अपनी सरकार
वोटर आई डी कार्ड
लौकर से निकाला
बटुवे की चोर जेब
के अंदर डाला
जूते को पौलिश लगाया
सिर में तेल डाल
बालों को संवारा
छोटे बेटे को बताया
पड़ोसी को सुनाया
दरवाजा अंदर से
बंद जरूर कर लेना
वोट डालने जा रहा हूँ
यूँ गया और यूँ ही
वापस आ रहा हूँ
एक बूथ के बगल
से निकल रहा था
हर पार्टी का आदमी
बड़ी आशा भरी
निगाहो से हमे
तौल रहा था
हौले हौले अपने
बूथ पर पहुंच पाया
लिस्ट देखने वाले को
वोटर आई डी कार्ड
मैने हाथ में थमाया
पूरी लिस्ट जब छान
मारी तो अपना ही
नहीं पूरे परिवार के
नामों को गायब पाया
निराश हो कर
अगल बगल
के कुछ और बूथों में
चक्कर लगाया
मैं अपने परिवार के
सांंथ खो चुका था
किसी को कहीं
भी नहीं ढूंड पाया
वापस लौट के जब आ
रहा था चाल में वो
तेजी नहीं पा रहा था
मन ही मन चुनाव आयोग
को धन्यवाद देता जा रहा था
एक कविता अपनी भड़ास का
अंतिम हथियार कुड़ता हुवा
सोचता चला जा रहा था
आज शायद एक पाप
करने से ऊपर वाले
ने मुझे बचा लिया
इसीलिये मेरा
और मेरे परिवार
वालों के नाम को
वोटर लिस्ट से
ही हटा लिया ।

सोमवार, 30 जनवरी 2012

चुनाव पूर्व संध्या

एक बार फिर

कल
चांद सितारों
की तमन्ना बोने

देखें
कितने लोग
अपने कोटरों से
निकल कर आते हैं

अपने अपने
घोड़ो पर
दांव लगाने
कहाँ कहाँ से
कूद फांद
लगाते हैं

लम्बी
दौड़ का
एक घोड़ा
कोई चलेगा
खच्चर से
भी बनाने

कोई
तगड़े घोड़े
को पीछे भी
खिसकायेगा

अपने अपने
घोड़ों की
इस रेस में

इस
बार दुवा
करियेगा

असली
दौड़ का घोड़ा
घोड़ों से ही
ना उलझ पायेगा

मेरे देश
को चाहिये
जो दिशा

उसे
देने के लिये
वो ही
सबसे आघे
निकल जायेगा

बरसों से
बोती
आ रही है

जो
चांद और सितारे
इस धरती की
अबोध संताने

घोड़ा
अपने लिये ही

केवल
नहीं जुटायेगा

चांद सितारे
तोड़ कर
ना भी ला पाये

कोई बात नहीं
उनकी रोशनी
ही काफी होगी

उससे एक
मुस्कान हर
चेहरे पर देने

पाँच 

सालों मे
कम से कम
कुछ बार
जरूर
आ जायेगा।

रविवार, 29 जनवरी 2012

प्रचार बंद हुवा

शक्ति प्रदर्शन
चिल्ल पौं
हल्ला गुल्ला
भौं भौं
सब आज
हो गया पूरा
पांच बजे
और आम
जनता का
हुवा सवेरा
कान पक
गये थे
इतने दिनो
के शोर से
कल से
शायद बाग
की तितलियाँ
दिखाई दे जायेंगी
मधुमक्खियाँ वैसे
तो रोज ही
गुनगुनाया
करती ही हैं
पर अब उनकी
भिन भिन
सुनाई दे जायेंगी
नारे लगाते लगाते
थक गये होंगे
जो बेचारे
थोड़ा राहत
आज पायेंगे
नमक के
पानी से गरारे
भी शायद कुछ के
घरवाले करवायेंगे
जोश देखकर
लोगों का
वैसे आज मन
खुश बहुत हो गया
था मेरा
लग रहा था जैसे
नेता इस जलूस
के इसके बाद
बोर्डर पर
लड़ने जायेंगे ।

शनिवार, 28 जनवरी 2012

चुनाव नहीं ये युद्ध है

नजारे बदलते
जा रहे हैं
हम जो थे
वो अब शायद
नजर नहीं
आ रहे हैं
प्रशाशन को
हम पर कितना
भरोसा है
वो हमारे पहाडी़
राज्य की
शांत वादियों
में गूंजती हुवी
अत्याधुनिक शस्त्रों
से सुसज्जित
अर्ध सैनिक बलों
के फ्लैग मार्च से
होने वाली की
बूटों की आवाज
से हमें
बता रहे हैं
हम अब वोटर
कहाँ रह गये
लगता है
आतंकवादी
होते जा रहे हैं
तीस जनवरी को
हम देते हैं
जिस देश में
महात्मा गांंधी
को श्रद्धांजलि
वो दिन चुनाव
का दिन नहीं
रह गया है
हम शायद
अपनो के बीच
अपनों से ही
कोई युद्ध
करने जा
रहे हैं।

गुरुवार, 26 जनवरी 2012

इंतजार

पाँच दिन बाद
सबकुछ पहले
जैसा लगता है
हो जायेगा
आम आदमी
हो रही चिल्ल पौं
से थोड़ा राहत
जरूर पायेगा
छटे दिन से
भविष्यवाणी
का गणित
शुरू कर
दिया जायेगा
अंगुली पर लगी
स्याही को मिटाने
में लग जायेगा
वोटर तो
सब कुछ
उसके बाद
भूल जायेगा
चुनाव आयोग
का फूल बंद
होना शुरू हो
जायेगा
कली बनेगा
एक फिर
वापस खोल में
चला जायेगा
बचा एक
और महीना
बहुतों के
खून सुखायेगा
अन्ना का
स्वास्थ भी
तब तक
ठीक हो जायेगा।

मंगलवार, 24 जनवरी 2012

चुनाव और आदमी का प्रतिशत

हर बार
की तरह
इस बार
भी
दिखा रहा है
आज का
अखबार भी

चुनाव की
बेला पर
जाति
समीकरण
का
समाचार भी

बिना
इसके
चुनाव
हमेशा
अधूरा रह
जाता है

आदमी का
समीकरण
इन सब
में विलीन
हो कर
खो जाता है

हर जाति
का प्रतिशत
दिखाया
गया है
आज के
अखबार में
मीडिया
भी खूब
भटकाती
रही है
इस
तरह के
समाचार में

आदमी
का प्रतिशत
आज तक
क्यों नहीं
छप पाया
किसी भी
समाचार में

कैसे
बताये कोई
जब
भेजते हैं ये
वोट देने
जातियों को
जातियों के लिये
हर सरकार में

आदमी
जिस दिन
वोट देने पर
उतर आयेगा

जाति
समीकरण
इंसानियत
की किताब
में कहीं
खो जायेगा

जीतने
हारने वाला
सिर्फ आदमी
हो जायेगा

पढे़ लिखे
लोगों का
मुंह तब बंद
हो जायेगा

आदमी का
प्रतिशत
वाकई में
उस दिन
पूरा सौ
हो जायेगा।

सोमवार, 23 जनवरी 2012

मास्टर और वोट

वोटिंग के बचे
अब दिन नौ
सड़क पर भी
बढ़ गयी है
बहुत पौं पौं।

राष्ट्रीय पार्टी 'क' में
घुसे हुवे मेरे मित्र 'च'
पूछे मेरे मित्र 'छ' से
जो पार्टी 'ख' में बहुत
ही माने जाते हैं
स्टार प्रचारक के रूप में
भी पहचाने जाते हैं
भाई जरा बताओ
थोड़ा अंदाज लगाओ
कहां गिरा रहे हैं
मास्टर साहब
अपना एक वोट
'छ' जी मुस्कुराये
फिर भाई 'च'
को समझाये
मास्टर लोग
पढे़ लिखे माने
जाते हैं
वहुत सोच समझ
हिसाब से ही
अपना वोट
गिराते हैं
तुम्हें क्यों
नजर आ रहा
है उनकी नजर
में खोट।
मियां 'च'
ने कहकहा लगाया
'छ' जी को
फिर फुसफुसा
के बताया
राजनीतिज्ञ हैं
आप हम मानते हैं
अर्से से आपकी
काबीलियत सभी
पहचानते हैं
पर आप इन मास्टरों
को कहां जानते हैं
पढे़ लिखों की दुविधा
कहां करेगी चोट
पैराशूट लगा कर
जब गिरायेंगे ये वोट
कुछ मास्टर यहां आते हैं
क्या यहां डालेंगे वोट
कुछ मास्टर वहां
भी देखे जाते हैं
क्या वहां डालेंगे वोट
जो मास्टर कहीं नहीं
दिख रहे हैं
कैसे पता लगाओगे
कहाँ डालेंगे अपना
कीमती वोट ।

रविवार, 22 जनवरी 2012

नेता और हैलीकौप्टर

पहाड़ी गांव में
स्कूल हस्पताल
अब रहने दो
मत ही बनाओ
टीचर डाक्टर
कुछ वहां जो
मजबूरी में
आ ही जाते थे
तैनाती उनकी भी
अब मत करवाओ
छोटी मोटी जरूरत
की चीजें भी गांव
वालों को दिलवाने की
अब जरूरत नहीं है
पहाड़ी गांवों से
हो रहा है पलायन
किसी को भी
अब मत बताओ
पहाड़ के गांव का
एक माडल मेरे
खाली दिमाग में
पता नहीं कहां से
आ रहा है
उसे प्रयोग में लाओ
और मेरा एक वोट
ले के जाओ
बता रहा हूँ
अभी के अभी
गोबर के अंदर ये
आईडिया मेरे दिमाग
में कहां से घुस आया
कल जब खंण्डूरी
एक हैलीकौप्टर लेकर
मेरे शहर के आसमान
में मडराया
आज वही तमाशा
दो हैलीकौप्टर के सांथ
सोनिया ने भी दोहराया
पिछली आपदा ने अधिकतर
पहाड़ी मार्गों को
जब से है बहाया
कोई भी नेता मेरे शहर में
सड़क के रास्ते घुसने से
बहुत ही घबराया
लेकिन ये मेरी समझ
में अब है आया
लोग तो लोग
कोई भी प्रतिनिधी
इस मामले को सामने
क्यों नहीं लाया
शायद विकास अब
पहाड़ का होने ही
वाला है
इलेक्शन होते ही
एक एक गांव
यहां का
एक एक हैलीपैड
पाने वाला है
फिर कुछ भी जरूरी
नहीं रह जायेगा
पाँच साल मे एक बार नहीं
हर समय पहाडों के
उपर हैलीकौप्टर मडरायेगा
पहाड़ी गांव का वासी
सब कुछ ही पा जायेगा
पलायन भी नहीं होगा
एक हैलीकौप्टर उड़ायेगा
दो घंटे में अपने को
देश की राजधानी में पायेगा
जो मर्जी में आयेगा
वो सब कर ले जायेगा।

शनिवार, 21 जनवरी 2012

आईडिया

ईमानदार
वोटर
ईमानदार
व्यक्ति को
ही वोट अब
डाल पायेगा
भ्रष्ट वोटर
भ्रष्ट के लिये
ही वोट
मांग पायेगा
क्रोस पोलिंग
बिल्कुल भी
बर्दाश्त नहीं
की जायेगी
इसके लिये
ई वी ऎम मैं
तकनीकि
बदल दी जायेगी
अगर कोई गलत
बटन दबायेगा
मशीन से 220
वोल्ट का
झटका खायेगा
ईमानदार
अगर आप हैं
ईमानदार पर
बटन दबाईयेगा
भ्रष्ट हैं अगर
तो दूसरी मशीन
को मंगवाइयेगा
इस तरह से
कम समय
में पोलिंग
हो पायेगी
मशीन पोलिंग
स्टेशन पर
ही तुरंत
रिजल्ट बतायेगी
ईमानदार
कितने वोटर
वोट देने
आ गये थे
ये आंकणा
अन्ना के
बाद में
काम आयेगा ।

शुक्रवार, 20 जनवरी 2012

बहुमत

बहुमत से
जीतना
अच्छा
होता होगा

जो आज हैं
वो भी
बहुमत से हैं
जो कल होंगे
वो भी
बहुमत से
ही होंगे

बहुमत
लोग ही
बनाया
करते हैं
फिर
बहुमत पर
लोग ही
गुर्राया
करते हैं

मैं तो अपने
आस पास के
बहुमत से
परेशान हूँ

बहुमत
लोग अपनी
सुविधा से
ही बनाते
आये हैं

मेरे
आसपास
मैंंने
महसूस
किया है
बहुमत को
बहुत
नजदीकी से

लोग
लगे हैं
मट्ठा
डालने में
बहुमत से

हमसे
नाराज भी
हो जाते हैं
लोग
बहुमत के

हमने
लेकिन हमेशा
अपने को
अल्पमत में
पाया है

बहुत से
लोग
बहुमत
के साथ
अभी भी
जा रहे हैं

अपने लिये
अल्पमत
का गड्ढा
सजा रहे हैं

क्या किया
जा सकता है
कुछ नहीं
कभी नहीं
कोई नहीं
जान पायेगा
कभी
कि
बहुमत
कितनी
चालाकी से
बनाया
जाता है

गलत
बातों को
इस तरह
से सजाया
जाता है
किसी को
भी पता
नहीं चल
कभी पाता है
कि
वो जा
रहा है
बहुमत
के साथ
अपने
लिये ही
एक कब्र
तैयार
करने
के लिए

जाग जाओ
ऎसा बहुमत
मत बनाओ।

गुरुवार, 19 जनवरी 2012

एक राजा के लम्बे कान

धन्ना नाई
की कहानी

मेरी माँ 
मुझे

सुनाती थी

पेट में उसके
कोई भी
बात नहीं
पच पाती थी

निकल ही
किसी तरह
कही भी
आती थी

राजा ने
बाल काटने
उसे
बुलाया था

उसके
लम्बे कान
गलती से
वो देख
आया था

बताने पर
किसी को भी
उसे मार
दिया जायेगा
ऎसा कह कर
उसे धमकाया था

पर बेचारा
आदत का मारा
निगल
नहीं पाया था

एक
पेड़ के
ठूँठ के सामने
सब उगल
आया था

पेड़ की
लकड़ी का
तबला कभी
किसी ने
बना के
बजाया था

उसकी
आवाज में
राजा का
भेद भी
निकल
आया था

मेरी
आदत भी
उस नाई
की तरह ही
हो जाती है

अपने
आस पास
के सच
देख कर
भड़क जाती है

रोज तौबा
करता हूँ
कहीं
किसी को
कुछ नहीं
बताउंगा

सभी तो
कर रहे हैं
करने दो
मैं कौन सा
कद्दू में तीर
मार ले जाउंगा

उस समय
मैं अपने को
सबसे अलग सा
देखने लग जाता हूँ

सारे लोग
बहुत सही
लगते हैं
और
मैं अकेला
जोकर हो जाता हूँ

एक राजा के
दो लम्बे कान
तो बहुत
पुराने हो गये

कहानी सुने भी
मुझे अपनी माँ से
जमाने हो गये

आज रोज
एक राजा
देख के
आता हूँ
उसके लम्बे
कानों को
भी हाथ
लगाता हूँ
वहाँ कोई
किसी को
भाव नहीं देता
जान जाता हूँ

फिर रोज
धन्ना नाई
की तरह
कसम खाता हूँ

पर यहाँ
आ कर तो
हल्ला मचाने में
बहुत मजा आता है

लगता है
नक्कार खाने मे
तूती बजाने
जैसे कोई जाता है

देखना ये है
कि इस ठूंठ का
कोई कैसे
तबला बना पाता है

फिर
मेरे राजाओं
के लम्बे लम्बे
कानों की खबर
इकट्ठा कर
उनके कान भरने
चला जाता है?

चित्र साभार: Fresh Korean

बुधवार, 18 जनवरी 2012

आशा है

समय के साथ
कितने माहिर
हो जाते हैं हम
चोरी घर में
यूँ ही
रोज का रोज
करते चले
जाते हैं हम
दिल्ली में चोर
बहुत हो गये हैं
जागते रहो
की आवाज भी
बड़ी होशियारी से
लगाते हैं हम
बहुत सारे चोर
मिलकर बगल
के घर में लगा
डालते हैं सेंघ
पर कभी कभी
पड़ोस में ही
होकर हाथ मलते
रह जाते हैं हम
चलो चोरी में
ना मिले हिस्सा
कोई बात नहीं
बंट जायेगा चोरी
का सामान कल
कुछ लोगों में जो
हमारे सांथ नहीं
फिर भी आशा
रखूंगा नहीं
घबराउंगा
बड़े चोर पर ही
अपना दांव
लगाउंगा
आज कुछ भी
हाथ नहीं
आया तो भी
बिल्कुल नहीं
पछताउंगा
कभी तो बिल्ली
के भाग से
छींका जरुर
टूटेगा और
मैं भी अपनी
औकात से
ज्यादा लपक के
ले ही आउंगा।