उलूक टाइम्स

सोमवार, 16 जनवरी 2012

काले कौआ

कौऔं को बुलाने का
सुबह बहुत सुबह
हल्ला मचाने का
रस्में निभाने का
क्रम आज भी जारी है
कौऔं का याद आना
मास के अंतिम दिन का
मसांति कहलाना
जिस दिन का होता है
भात दाल बचाना
संक्रांति के दिन के
उरद के बड़े सहित
पकवान बनाना
दूसरे दिन सुबह
पकवानों की माला
गले में लटकाना
फिर चिल्ला चिल्ला
के कौऔ को बुलाना
"काले काले घुघुति माला खाले"
दादा जी के जमाने थे
वो भी रस्में निभाते थे
सांथ छत पर आते थे
काले काले भी
हमारे सांथ चिल्लाते थे
देखे थे मैने तब कौऎ आते
जब भी थे उनको हम बुलाते
वो थे आते घुघुती खाते
फिर थे उड़ जाते
समय के सांथ
परिवर्तन हैं आये
कौऔ ने सांथ
हमारे नहीं निभाये
कौऔ को बुलाना
और उनका आना
इतिहास सा हो गया
कौआ पता नहीं
कहाँ
है खो गया
कल को फिर हम
सुबह सुबह चिल्लायेंगे
कौऎ शायद इस बार भी
नहीं आ पायेंगे
लगता है कौऔं के
यहा चुनाव अब नहीं
हो पाते हैं
इस लिये वो जरूरी
नहीं समझते होंगे
और इसीलिये अब
वो हमसे मिलने
पकवान निगलने
शायद नहीं आते हैं।

शुक्रवार, 13 जनवरी 2012

उलूक उवाच अथ चुनाव कथा


दूरदृष्टि
पक्के इरादे
के
साथ

संभाली है
कमान

एक
अच्छे
आदमी
के

चुनाव
की

कुछ
बुरे 
लोगों
की
फौज ने

अच्छे
के
कंधे

अभी
मजबूत
किये
जा रहे हैं

चुनाव
के बाद

गोलियां
इसी कंधे
से
चलाने के लिये

कुछ
अच्छे लोगों
ने

संभाली है
बागडोर

एक
बुरे आदमी
के
चुनाव प्रचार
की

इरादे
नेक हैं
निशाना
एक है

अच्छे
के साथ
भी है
एक भीड़

बुरे
के साथ
भी 
है
दूसरी भीड़

एक
के बाद एक

रोज
निकल के
आ रही हैं
भीड़े
सड़क पर
लगातार

लोग
लगा रहे हैं
गणित
चाय के
खोमचों पर
हमेशा
की तरह
आजकल

अन्ना
और उसकी
सफेद
टोपियां भी
खो गयी हैं

पता 
नहीं
कहां

इन सब
समीकरणों
के बीच

मुझे
मालूम है

मैने
भी
देना है
एक वोट

इन
सभी
भ्रमों से
उलझते हुवे

कुछ
दिन बाद
और

फिर
भूल जाना है
कुछ
सालों के लिए।

गुरुवार, 12 जनवरी 2012

मतदान दूर है

शतरंंज खेलना
हर किसी को
यहाँ कहाँ आता है
फिर भी कोशिश कर
वो एक बिसात
बिछाता है।
काले या सफेद नहीं
मोहरों को दोनो
ओर से चलाता है
हारना नहीं चाहता है
जीतने वाले को
अपना बताता है।
खेल देखने वालों को
कभी भी पता
नहीं चल पाता है
वो कब इधर और
कब उधर पाला
बदल चला जाता है।
लेकिन किस्मत और
उपर वाले के खेल
को कौन भांप
कभी पाता है
जब अचानक
बिसात का एक
मोहरा अपनी
चाल खुद ब खुद
चलता चला
जाता है
बहुत लम्बा
कितना भी
लम्बा खेल
खेलने वाला
क्यों न हो
अपनी ही
चाल में एक बार
कभी कभी
फंस ही जाता है।

बुधवार, 11 जनवरी 2012

चुनाव और मास्टर की सोच

चुनाव का
बुखार
आज भी
बहुत तेजी
दिखा रहा था

मैं मास्टर
समर्थकों की
भीड़ से
बचता हुवा
जा रहा था

मास्टरी
दिमाग
फिर हमेशा
की तरह
कुलबुला
रहा था

सोच रहा था
इस खर्चीले
चुनाव की
जगह परीक्षा
अगर करा
दी जाये

नेता देश
के एक
राष्ट्र व्यापी
परीक्षा
से चुने जायें

कुछ शेषन
या अन्ना
जैसे कड़क
परीक्षा नियंत्रक
नियुक्त कर
दिये जायें

नकल करने
की बिल्कुल
भी इजाजत
ना दी जाये
और
आशावाद
चढ़ते ही
जाने लगा
आसमान

अचानक
फिर से
निराशा ने
दिया एक
झटका
और
कराया मुझे
ये भान
परीक्षा तंत्र
भी तो इसी
देश का
काम करायेगा

नकल जो
नहीं कर पाया
मास्टर को
घूस दे कर
के आयेगा

अन्ना की
ये कोशिश
कहीं फिर
एक बार
धोखा खायेगी

टोपी सफेद
जिन लोगों
ने भुनाई
इस बार
परी़क्षा होगी
तो भी उनकी
ही कौपी
नम्बर लायेगी

फिर से
सबसे कम
पढ़ने वाला
प्रथम आयेगा

अनपढ़ ही
इस देश को
लगता है
हमेशा चलायेगा।

मंगलवार, 10 जनवरी 2012

चुनाव

नामांकन दर नामांकन
चहल पहल नगर में
नजर हर जगह
आ रही थी
गुजरा जब आज बाजार से
दारू दिखी तो नहीं कहीं
पर खुश्बू चारों ओर से
बयार की तरह आ रही थी
रसायन शास्त्री की नाक
ईथायल एल्कोहल है
कहीं आसपास करके
उसे बार बार बता रही थी
ठंड बहुत थी
लाजमी है गरमी की
जरूरत भी हो जाती है
दारू अंदर जाती है
इतनी अहसान फरोश
भी नहीं होती है
गरमी तो पैदा
कर ही जाती है
कई दलों के समर्थक
दिखाई दे रहे थे
पता नहीं चल रहा था
किसके कितनी गटकाये हुवे थे
आचार संहिता में शराब
पीने पर पाबंदी
नहीं होती है शायद
इतना क्या कम नहीं है कि
चुनाव आयोग के लोग
नहीं लगाये हुवे थे
इस सारी खुश्बू का
हिसाब किस हिसाब
में जोड़ा जायेगा
ये तो चुनाव आयोग
ही बता पायेगा
ना जुड़े कोई बात नहीं
वोट तो पड़ ही जायेगा ।

सोमवार, 9 जनवरी 2012

इतवारी मुद्दा

दैनिक हिन्दुस्तान रविवार का पन्ना छ:
पढ़ कर हुवा मैं भावुक और गया बह ।

शिक्षक संघर्ष समिति खफा सुन राज्य सरकार
वादाखिलाफी का लगाया आरोप किया खबरदार।

खबर है "बेरोजगार और शिक्षक सरकार से खफा"
"बेरोजगार शिक्षक" होती तो ज्यादा आता मजा।

विपक्ष के हो गये मजे सरकार को नहीं देगें ये अब वोट
साठ से पैंसठ नहीं किये हैं ये अब खायेंगे देखो चोट।

इतना जरूर अच्छा हुवा है कोई नहीं बदला अपना दल
सरकार के दल वाला नहीं गया और कहीं पाला बदल।

इस बार सरकार के दल वाले शिक्षक हो गये थोड़ा विफल
सांठ गांठ है ही विपक्ष के शिक्षक शायद अब दें तकदीर बदल।

चिंता की कोई बात नहीं है सरकार जिसकी भी आयेगी
बहुत जोर है बूढे़ बाजुओं में पैंसठ जरुर करवायेगी।

बाकी खबर खबर है ये बेरोजगार कैसे फंसे खबर में
शायद सोचे होंगे रास्ता साफ हो जायेगा ये तो जायेंगे कबर में।

रविवार, 8 जनवरी 2012

ठंड और विचार

ठंड से
जम 
गये
विचार आज

मौन हो गये

आकाश
में बादल

सामने
पहाडियों

पर बर्फबारी

कम तापमान

रजाई के अंदर
दिन भर
उछल कूद


फिर भी
गरमी की

हो रही है आज
विचारों को जरुरत

बेचारे
विचार भी

जानते हैं
कुछ 
अचार
की तरह

सब लोग छांट
लेते हैं उन्हें
अपनी सुविधा
अनुसार हमेशा

ज्यादातर होता

आया है यहां
बना के पेश
कर दी जाये
व्यंग रूपी
अगर खीर

लोग उसका

भी रूपांतरण
कर फेंकते हैं
तीखा तीर

ठंड में

रहने दिये
जाये विचार
कुछ देर

अचार भी

बनता है पक्का

कुछ 
समय छोड़
दिया जाये
अगर यूं ही
मर्तबान में ।

शनिवार, 7 जनवरी 2012

जुल्म

दैनिक
हिन्दुस्तान 
भी

देखिये
कैसा
जुल्म
ढा रहा है


ना
पचने वाली

एक खबर
आज

सुना रहा है

गढ़वाल में

प्रोफेसर लोगों
की नेतागिरी
पर संकट
मंडरा रहा है

हाय हाय
मेरे 
तो
सीने में

जोर का दर्द
उठा जा रहा है

कुलपति जी

वहाँ के ऎसा
कैसे कर पा
रहे होंगे

या खाली में

हमारे लिये
एक खबर
बना रहे होंगे

भगवान करे

मेरे कुलपति
के कान में
ये खबर ना
जा पाये

वर्ना

कहीं

उनको भी
वैसा 
ही
बुखार
ना 
चढ़ जाये

प्रोफेसरी
से
क्या
हो पाता है


नेतागिरी
से ही 
तो देश
पढ़ 
पाता है

स्कूल
में पढ़ायेंगे

तो खाली बच्चे
पास हो जायेंगे

नेताओं को
पढ़ा 
लिये
अगर

तो 
सात पीढि़यों
का भला
कर
ले जायेंगे

नेताओं को
वैसे 
भी
पढ़ाने की

जरूरत है

स्कूल में

पढा़ भी दिया
तो कौन सा
कद्दू में तीर
मार जायेंगे।

शुक्रवार, 6 जनवरी 2012

बिल्ली युद्ध

आइये शुरू
किया जाये
एक खेल

वही पुराना

बिल्लियों को
एक दूसरे से
आपस मे
लड़वाना

जरूरी नहीं

की बिल्ली
मजबूत हो

बस एक अदद

बिल्ली का होना
है बेहद जरूरी

चूहे कुत्ते सियार

भी रहें तैयार

कूद पड़ें

मैदान में
अगर होने
लगे कहीं
मारा मार

शर्त है

बिल्ली बिल्ली
को छू नहीं
पायेगी

गुस्सा दिखा

सकती है
केवल मूंछ
हिलायेगी

मूंछ का

हिलना बता
पायेगा बिल्ली
की सेना को
रास्ता

सारी लड़ाई

बस दिखाई
जायेगी

अखबार टी वी

में भी आयेगी

कोई बिल्ली

कहीं भी नहीं
मारी जायेगी

सियार कुत्ते

चूहे सिर्फ
हल्ला मचायेंगे

बिल्ली के लिये

झंडा हिलायेंगे

जो बिल्ली

अंत में
जीत पायेगी

वो कुछ

सालों के लिये
फ्रीज कर दी
जायेगी

उसमें फिर

अगर कुछ
ताकत बची
पायी जायेगी

तो फिर से

मरने मरने
तक कुछ
कुछ साल में
आजमाई जायेगी

जो हार जायेगी

उसे भी चिंता
करने की
जरूरत नहीं

उसके लिये

दूध में अलग
से मलाई
लगाई जायेगी।

गुरुवार, 5 जनवरी 2012

चिढ़

लगती है चिढ़

हो जाती है चिढ़

हंसी में भी
साफ साफ नजर
आती जाती
दिख जाती है चिढ़

बहुत सारे गुल
खिलाती है चिढ़

कोई क्या करे
लग रही है
समझ में भी
आती है चिढ़

बहुत लगती है
खुद को भी
चिढ़ाती है

बहुत चिढ़ाती
है चिढ़

फेवीकौल
नहीं होती है
फिर भी चिपक
जाती है चिढ़

कई कई बार
लग जाती है चिढ़

बहुत जोर की
लगती है
बता कर नहीं
आती है चिढ़

घरवालों से
हो जाती है चिढ़
घरवाली भी
दिखलाती है चिढ़
रिश्तेदारों से
हो जाती है चिढ़

पड़ोसी को
पड़ोसन से
करवाती है चिढ़

दोस्तों के बीच में भी
घुस आती है चिढ़

नौकरी में
सतरंगी रंग
दिखाती है चिढ़

कहाँ नहीं जाती है चिढ़

यहां तक की
फोटो में भी
आ जाती है चिढ़

पेंट का रंग
बन जाती है चिढ़
जीन्स की लम्बाई
कराती है चिढ़
साड़ी की कीमत
सुनाती है चिढ़

किस किस से
नहीं हो जाती है चिढ़

कई तरीकों से
घुस जाती है चिढ़

हर एक की
एक अलग
हो जाती है चिढ़

सबको ही
कभी तो
लग ही
जाती है चिढ़

कब कैसे किस को
कहाँ लग जाती चिढ़

छोटी सी बात पर
उठ जाती है चिढ़

पहले से नहीं
रहती है कहीं
बता कर भी
नहीं आती जाती है चिढ़

क्या आप को
अपना कुछ पता
बताती है चिढ़

चिढ़ थी चिढ़ है
और रहेगी भी चिढ़

समझते समझते
आग में डाले
घीं की तरह से
और भी भड़क
जाती है चिढ़ ।

बुधवार, 4 जनवरी 2012

दिल बहलाने

मधुमक्खी हर रोज
की तरह है भिनभिनाती
फूलों पर है मडराती
एक रास्ता है बनाती
बता के है रोज जाती
मौसम बहुत है सुहाना
इसी तरह उसको है गाना
भंवरा भी है आता
थोड़ा है डराता
उस डर में भी तो
आनन्द ही है आता
चिड़िया भी कुछ
नया नहीं करती
दाना चोंच में है भरती
खाती बहुत है कम
बच्चों को है खिलाती
रोज यही करने ही
वो सुबह से शाम
आंगन में चली है आती
सबको पता है रहता
इन सब के दिल में
पल पल में जो है बहता
हजारों रोज है यहाँ आते
कुछ बातें हैं बनाते
कुछ बनी बनाई
है चिपकाते
सफेद कागज पर
बना के कुछ
आड़ी तिरछी रेखाऎं
अपने अपने दिल
के मौसम का
हाल हैं दिखाते
किसी को किसी
के अन्दर का फिर भी
पता नहीं है चलता
मधुमक्खी भंवरे
चिड़िया की तरह
कोई नहीं यहां
है निकलता
रोज हर रोज है
मौसम बदलता
कब दिखें बादल और
सूखा पड़ जाये
कब चले बयार
और तूफाँ आ जाये
किसी को भी कोई
आभास नहीं होता
चले आते हैं फिर भी
मौसम का पता
कुछ यूँ ही लगाने
अपना अपना दिल
कुछ यूँ ही बहलाने ।

मंगलवार, 3 जनवरी 2012

दोस्त

आईना क्यों
नहीं दिखाता
मेरा सच मुझे
उसे देखने
के लिये
कहां से लाऊं
मैं तुम्हारी
पैनी नजर
आईना मेरा
दोस्त तो कभी
नहीं रहा
फिर भी
उसने कभी
नहीं दिखाया
मुझे मेरे अंदर
का हैवान
मैने सोचा
आईना दिखाता
है हमेशा सच
तुम्हारी पैनी
नजर बड़ी
कमाल की
है मेरे दोस्त
जो मेरा
आईना कभी
नहीं देख
पाया मेरे
अंदर छुपा
तुमने देख
ही डाला
अपनी इस
बाजीगरी को
देश के नाम
कर डालो
और दिखा,
दो दुनिया को
सारे वो सच
जो सामने
नहीं आते
किसी के
कभी भी
तुम्हें देख
कर छुप
नहीं पाते
आओ कुछ
करो देश
के लिये
मेरे तो झूट
बहुत छोटे हैं
इस देश
के सामने।

रविवार, 1 जनवरी 2012

अलविदा 2011

बहुत कुछ सिखा गया
मुझे यह बीता साल
कितना गलत पढ़ाता
रहा हूँ मैं सवाल
लोग कक्षा में वैसे तो
बहुत कम आ रहे हैं
पर कभी कभी आकर
जो वो पढा़ रहे हैं
पाठ्यक्रम में बिल्कुल
भी नहीं दिखा रहे हैं
सच बोलना है अंदर
बताया जाता रहा है
बाहर झूठ को गले से
लगाया जाता रहा है
जरूरत मुझको ही अब
पड़ गयी है फिर से
स्कूल जाने की
सच को झूठ बताके
बच्चों को पढ़ाने की
अगले साल शायद
सीख लूँ मै भी कलाकारी
ताकि आने वाले बच्चे
सीख लें थोड़ा मक्कारी
अपने को बचा के
शायद आगे ले जायेंगे
हम जैसे लोगों से खुद
व समाज को बचा पायेंगे।

शनिवार, 31 दिसंबर 2011

खबर

एक

देता है

कुछ
अनुदान

दो को

दो

कार्यक्रम
बनाता है

फिर

तीन
को बताता है

तीन
बहुत दूर से

चार
को बुलाता है

अतिथि
गृह में
ठहराता है

सलाद
कटवाता है

गिलास
धुलवाता है

चार
सेवा टहल
करवाता है

टी ए डी ए
भरवाता है

खर्राटे भरकर
सो जाता है

पांच

झाडू़
लगवाता है

मंच सजाता है

देर से घर जाता है

पांच

फिर
सुबह सुबह
आ जाता है

आदत
से मजबूर
खुद पर
खिसियाता है

कोई भी
उपस्थित
नहीं हुवा
समय पर

पाता है

दो और चार
टहल के आते हैं

कौलर अपने
उठाते हैं

धूप में
बैठ जाते हैं

श्रोता
एक घंटा
देर से आते हैं

बेहयाई
से फिर
मुस्कुराते हैं

तीन
घर में
बीन बजाता है

कुछ को
मोबाईल फोन
मिलाता है

कार्यक्रम
हुवा या नहीं
पता लगाता है

अखबार
वालों को
सब कुछ
बताता है

पांच
अगले दिन
खबर में पाता है

सारी
खबर में
अखबार
तीन ही तीन
दिखाता है

तीन
घर में रखी बीन
फिर से बजाता है

पांच
अपनी बीबी से

डांठ
जोर की
खाता है।

शुक्रवार, 30 दिसंबर 2011

राज काज


़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़
नैनीताल समाचार में छपी थी मेरी कुछ लाइने कुछ वर्ष पूर्व।
वहाँ त्रिवार्षिक कार्यकाल वालों के लिये था।
यहां त्रिवार्षिक बदल कर पंचवर्षीय कर दे रहा हूँ।
शेष लाइने वही हैं ।
़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़
कुत्तों की सभा का पंचवर्षीय चुनाव
गीदड़ ने पहना ताज 
ऎल्सेशियन से बुलडौग लडा़या
पौमेरियन एप्सो को छोटा बतलाया
ये था इसका राज 
ये था इसका राज गीदड़ अब रेवड़ी बांटे
कुत्ता अब कुत्ते को काटे कोई ना रहा अपवाद
कोई ना रहा अपवाद
ढटुओं को अब रोना आया 
रोते रोते अलख जगाया गये शेर की मांद
शेर गुर्राया
डर डर कर कुत्तों ने फरमाया
हर शाख पे उल्लू बैठा है अंजामें गुलिस्ताँ क्या होगा 
सुन शेर को गुस्सा आया पी0 ए0 को आदेश लिखाया
क्यों शाख पर उल्लू बैठाया
तुरंत जाओ कुत्ता देश
तुरंत जाओ कुत्ता देश शाख को काट के लाओ
उल्लू को आकाश उड़ाओ 
हुवा पालन आदेश उल्लू अब गीदड़ पर बैठे 
कुत्ता राज गीदड़ राजा
ना रहे उल्लू ना रही अब शाखा ।

[ढटुआ = Street Dog]

चित्र साभार: https://www.istockphoto.com/

गुरुवार, 29 दिसंबर 2011

भीड़

भीड़ को
पढा़ते पढ़ाते
अब वो
भीड़ बनाना
अच्छा सीख
गया है

भीड़ पहले
कभी भी
उसका पेशा
नहीं रही

भीड़ से
निपटने में
अचानक
उसे लगा
भीड़ बहुत
काम की
चीज हो
सकती है

उस दिन
से उसने
पेशा ही
बदल डाला

अब वो
केवल एक
इशारा भर
करता है

कुछ
अजीब सा
वो भी
आसमान
की तरफ
देख कर

भीड़
चली आती है
भीड़
आपस में
बात करती है
खुले हाथ
लहराती है

लौटते हुवे
भीड़ की
मुट्ठियाँ
बंद होती हैं

एक दूसरे
से कुछ
छिपाते हुवे

एक भीड़
लौटी
वो फिर
इशारा
शुरू
कर देता है

मैने
बहुत दिन
असफल
कोशिश की
उस भीड़
का हिस्सा
बन जाने
के लिए

अब मैंने
भी वही
इशारा
करना शुरु
कर दिया है

पर कोई
नहीं आता
मेरे आसपास

भीड़
रोज
देखती है
मुझे उसी
इशारे के
साथ
जो उसका
भी है
और मैं
भीड़
देखता हूँ
जाते हुवे
उसकी तरफ
उसी इशारे
की तरफ
जिस इशारे
को सीखने
के लिये
मैने
भी अपना
पेशा छोड़
दिया है ।