उलूक टाइम्स

मंगलवार, 28 जुलाई 2026

अल्बर्ट पिन्टो गुस्सा भूल जाता है लीला देख कर कल्कियों की भुनभुनाता है

 


घर के राम कृष्ण हनुमान को साथ ले
सड़क कोई एक नापने निकल जाता है
अल्बर्ट पिन्टो गुस्सा भूल जाता है
लीला देख कर कल्कियों की भुनभुनाता है

समझने में गलतियाँ करता है अनेकों एक साथ
सीधे रास्ते में ही उलझ जाता है
दिखाने को बनाए चित्र अपने रंगों से भरे
अंधे साथ रखता है उन्हें मनाता है

सुनाने को कहानियां देखी हुई खुद की
बहरों को सुबहो शाम आवाजें लगाता है
लूले गाते हैं गीत लिखे भक्ति भाव से उसके
यही आगास नई रागों की धुन बनाता है

भरम होते हैं टूट कर गिरते भी हैं पता नहीं
बेखयाली उन्हें फिर से चुन उठाता है
‘उलूक’ खुद समझता है समझ गया है खुद का लिखा
फिर से समझाने को चला आता है |

चित्र साभार : https://www.wallpaperflare.com/

सोमवार, 27 जुलाई 2026

कुछ अलग से हो निर्भया के साथ हुए को भी समझाओगे

 


अब कौन सा छछूंदर और ढूंढ के तुम ले आओगे
कितना गिरोगे हजूरे आला तुम अब लुढ़क जाओगे

रहने दो नापना एक फुट को तीस सेंटीमीटर से अब
अपनी उलझनों को जनता को खुद आ दिखाओगे

अपना चेहरा खुद तो देख लिया करो किसी का नोचने से पहले
हमाम की दीवार ढह गई है अब कहो किसका क्या छुपाओगे

लिखे में दिखता है लिखने वाले का सबकुछ बहुत साफ साफ
अपने लिखे में खुद को लिखा हुआ कभी तो कुछ दिखाओगे

बेटियां किस की थी किसने सोचना था तुम क्यों पछताओगे
कुछ अलग से  हो निर्भया के साथ हुए को भी समझाओगे

‘उलूक’ चिकने घड़े से भी पूछेगा मजबूरी में हमेशा आदतन
जतन कर लो फिसल गए किसी और के हाथों से टूट जाओगे |

चित्र साभार https://www.shutterstock.com/

रविवार, 19 जुलाई 2026

कल कत्ल हो खबर आज की मगर होनी ही चाहिए

 

इंतहा है बेशरमी की होनी भी चाहिए
शरम निगोड़ी कभी धोनी भी चाहिए

मुहं खोलते ही फैलता है रायता जिसका
ककड़ी हरी हो पीली हो धोनी ही चाहिए

पढ़े लिखे होने का घमंड लिखे में भी दिखे
एक अनपढ़ की जी हजूरी होनी ही चाहिए

गिरना जरूरी है गिरे हुए को और कहीं नीचे
ऊंचाइया देखने में सिर से टोपी गिरनी ही चाहिए

इतिहास में दर्ज होगी फेंकी गई स्याही सरेआम
अनपढ़ सरदार की कलम कबाड़ में बिकनी ही चाहिए

कितना कुछ लिखे कोई क्या लिखे किसपर लिखे 
सब उतार के बैठे की खाल भी  उतरनी ही चाहिए

‘उलूक’ अपनी खीज अपने पर ही उतार ले आज
कल कत्ल हो खबर आज की मगर होनी ही चाहिए | 

चित्र साभार: https://www.reddit.com/

शुक्रवार, 17 जुलाई 2026

छोटी सी बात है चोरी मत उछाल मजाक की भी हद्द है सरकार



चोरी डकैती हत्या बलात्कार भ्रष्टाचार व्यभिचार
कौन सा आज का है एक नया समाचार
इतिहास में भी होता आया हो जो कई कई बार
उसका किसलिए जिक्र करना बार बार

चोर घर का हो अपना हो
किसलिए उसपर बात करना
किसलिए बैठाया है हर थाने में एक थानेदार
चोर चोर चिल्लाए जो चोर के सामने सामने
उसका श्राद्ध बहुत जरूरी हो गया है करना इस बार

खुद गुनाह करे और करे इबादत भी वही गुनहगार
सबसे अच्छा है वही आज का उत्कृष्ट कारोबार
क्या जरूरत वकील की क्या अदालत की
सजा देने को हर खजूर बैठा है जब कलम ले तैयार

किसी को कुछ नहीं आता है समझ में
दिमाग रखता है बस एक हजूर का ठेकेदार
सारी निविदाएं होती हैं उसकी
उसी को लिखनी होती है खबर उसी का होता है अखबार

‘उलूक’ समझ को ठोक लिया कर अपनी हथौड़े से
कुछ भी पढ़ने से पहले हर बार
भगवान जब लिख रहा हो कुछ
बिना पढे ही लिख क्यों नहीं देता
दंडवत प्रणाम और नमस्कार ?

चित्र साभार: https://www.dreamstime.com/

बुधवार, 15 जुलाई 2026

फिर हुई खुजली अंगुलियों में मगर कलम की स्याही आजकल जाम है

 

वर्णांधता या रंग अंधापन
परिभाषित करना
आज जब बहुत ही आसान है
समझ में आए रंग भी
और दिखे इंद्रधनुष रक्त में
साधू फिर क्यों परेशान है

सौ झूठ बोलते
दिव्य दर्शन सच के हो जाना
सुना आज बहुत आम है
कहीं कितने भी हों विलाप भक्तो
मूल्यों का आलाप जरूरी सुबहो शाम है

सही की परिभाषा गढ़ रहा है नई कोई
समझा करो बहुत ही विद्वान है
गिरोह से प्रेम रखता है तो क्या
गिरोह के कत्लेआम में ही तो सम्मान है

बतला रहा है
टांग पर खड़ा है एक बरसों से
क्या हुआ अगर हम्माम है
कपड़े खुद के उतरे हुए हैं सारे सभी
आईने में तो दिख रहा सब गुलफाम है

किसलिए करें बात शर्म करने की
लाशों के ढेर हैं ठहाके भी हैं
बस रोना हराम है
लिखे में दिख रहा है चेहरा किसी का
और लिखा माथे पर भी गुलाम है

‘उलूक’ गिनना मोतियाबिंद सोच पर पड़े
और बिखरे हुए कागजों पर
एक बड़ा काम है
किसको देखनी है अब रोशनी सुबह की भगत
अंधेरे का ही बस करना जब गुणगान है?

चित्र साभार: https://pixabay.com/

रविवार, 31 मई 2026

तिलचट्टे तिलचट्टे तिलचट्टे बस तिलचट्टे



सभी यहीं हैं कई कई हैं
यट्टे बट्टे सट्टे कट्टे
कितने कितने गिनते गिनते
मौज मनाते तिलचट्टे

इसने लिक्खे उसने लिक्खे
शब्द जोड़ कर हट्टे कट्टे
हवा में उड़ते फर फर फिरते
खिल खिलाते तिलचट्टे

इसके खाए उसके खाए
राजा लाए चोखे लिट्टे
खुशबू पाए घर घर जाए
पाले पोसे तिलचट्टे

किसने पढ़ने किसने लिखने
ढोल बजाते गिरगिट गिट्टे
आंख मूद कर कूद कूद कर
गाने गाएं तिलचट्टे

जिसकी सुलगी उसने उगली
गली गली कित्ते कित्ते
तुलसी सूर कबीर जायसी
लगते आज बित्ते बित्ते

छोड़ ‘उलूक’ मना मौज
रहने दे खुजली
घिस घर पर ही सिलबट्टे
लिखने दे लिखते रहते हैं
उड़ते गिरते चिढ़ते चिढ़ते
तिलचट्टे ही तिलचट्टे |

चित्र साभार: https://www.vecteezy.com/

शुक्रवार, 30 जनवरी 2026

पिता होना बात तो है पर राष्ट्रपिता होना ? कभी न चाहते हुए भी कुछ लिखना जरूरी हो जाता है

हम हैं
कितना हैं
हमको आभास है
अपने उतना होने का
हम बिल्कुल भी नहीं थे
जब तुम थे पूरे से भी जियादा
तुम नहीं थे तब हम हैं
कितना हैं पता नहीं है
हमारे होने और हमारे न होने में
बहुत बड़ा फासला नहीं है
आज हैं कल नहीं भी होंगे
कितना नहीं होंगे
समय फैसला करेगा
तुम कल भी थे आज भी हो
और तुम रहोगे भी
तुम्हारा होना भी उतना ही जरूरी है
तुम थे तब हालात बहुत खराब थे
तुम नहीं थे हालात और भी खराब हो गए
संतुलन की धुरी में
तुमने तब भी बनाए रखा विश्वास
आज भी है तुम्हारे नहीं होने के बाद भी
हमने तुम्हें नहीं देखा हमने तुम्हारे बारे में सुना
कितने भाग्यशाली होंगे वो लोग जो तुम्हारे साथ थे
कितने अभागे हैं हम
तुम नहीं हो हमारे साथ हमारे ही कारण
एक पीढ़ी से लेकर दूसरी पीढ़ी
क्या अनंत तक अंत नहीं है तुम्हारा
आज के दिन तुम्हें याद करना
सबसे जरूरी है
क्योंकि
आज भी वैसे ही दिन हैं
जैसे तब थे जब तुम थे
‘उलूक’ नतमस्तक है तेरे सामने
जब तू नहीं है
राष्ट्रपिता बापू
आज ही नहीं हर दिन तेरा दिन है
नमन |

चित्र साभार: https://www.shutterstock.com/



रविवार, 30 नवंबर 2025

लिखना कूड़ा कुछ फैलाना सफाई से कुछ

 

कुछ वो भी नहीं लिख रहे कुछ
कुछ हम भी नहीं लिख रहे कुछ  

कहीं वो भी नहीं दिख रहे हैं कुछ
वहीं हम भी नहीं दिख रहे हैं कुछ

कहा है उन्होंने ही
किसलिए लिख रहे कुछ
कुछ कह रहे हैं
वो दिख रहे हैं इसीलिए
लिख रहे हैं कुछ

पड़ा हुआ है इतना इधर कुछ
कुछ उधर बिछा रहे हैं कुछ
कैसे पढ़े कोई सभी कुछ
रहने दिया जाए कुछ
पढ़ लिया सब कुछ जरूरी नहीं है 
सब से ही कह दिया जाए कुछ

कब से साफ सफाई से
बहुत साफ सुथरा सा लिख रहे कुछ
कुछ लिखा रहे हैं साफ कूड़ा कुछ
कुछ सिखा रहे हैं सरताज कूड़ा कुछ
पहले बेतरतीब लिख फ़ैला रहे थे जो कुछ
घेर कर बाड़े में उनको सबक सीखा रहे हैं कुछ

‘उलूक’ रहने दे नहीं बस में तेरे कुछ
लिखना कुछ दिखाना कुछ
आसान नहीं है इतना सब कुछ
समेटने में सफाई से कूड़ा कुछ
फैलाने में सफाई से कूड़ा कुछ

चित्र साभार: https://pngtree.com/

सोमवार, 20 अक्टूबर 2025

शुभ हो मंगलमय हो प्रकाश मय हो बाहर भीतर ऊपर नीचे नौ दिशाएं जमीन आसमान


सभी के पास होते हैं
मिट्टी के दिए रुई की बाती
तेल और दियासलाई
जलाने के लिए कुछ भी कहीं भी कभी भी
सभी को जरूरत होती है
रोशनी की
सभी चाहते है फैलाना भी
प्रकाश को
इधर उधर सभी जगह कहीं भी कभी भी
रोशनी कहें प्रकाश कहें उजाला कहें
या ऐसा ही कुछ कहें
जिस से आभास हो सके
कुछ ऐसा दिखाई देने का सामने से
जो घुस सके दिमाग में
और कुलबुला सके
सुसुप्त पड़े जीवन कणों को
एक पुराने हो चुके मकान की
जीर्ण शीर्ण खिड़कियों के
हलकी हवा में भी हिलते
पल्लों के बीच की झिररियां भी
जीवंत हो उठती हैं कुछ देर के लिए ही सही
रोशनी बेचने से लेकर
रोशनी खरीदने के बीच की
दूरियां कहें या खाई कहें
बहुत प्यार से भरती चली जाती हैं स्वत: ही
गरीब की रोशनी और अमीर की रोशनी
सब साई के
"सबका मालिक एक" के मानिंद
आत्मसात कर लेती हैं एक दूसरे को
रोशनी का मजहब कह लिया जाए
या धर्म का प्रकाश कहें
दोनों एक ही बात
सोचिए कितनी इफ़रात रोशनी ही रोशनी
रोशनी ही इबादत रोशनी ही सौगात
बस एक ही
कुछ उलझन से भरा जीव ‘उलूक’
आंखें झपकाता ऊंघता हुआ अपने कोटर में
रात में हो चुके दिन से हैरान
जपता रोशनी की कामना ही है सबसे महान
शुभ हो मंगलमय हो प्रकाश मय हो
बाहर भीतर ऊपर नीचे
नौ दिशाएं जमीन आसमान |

चित्र साभार: https://pngtree.com/

सोमवार, 22 सितंबर 2025

समय के हिसाब से गिरगिटिया सहूर हजूर के हिसाब से कुछ रंग बदलना सीख



हौले हौले से कर आंखे बंद
ध्यान में कुछ लिखना सीख उसके बाद
साध कान को बांध आवाज को
व्यवधान में कुछ लिखना सीख उसके बाद
बंद कर मुंह दिल में गुनगुना राग सुन बिना आवाज
संधान में कुछ लिखना सीख उसके बाद
साधक हो जाएगा सधेगा खुद भी
बाधाओं के बाजार लगेंगे
बस तू थोड़ा सा कुछ बिकना सीख
सधी हुई लेखनी से सधा हुआ कुछ लिखा हुआ
सामने कागज पर उतर आएगा
भीड़ होगी मधुमक्खियों की तरह
जहर के पानदानों के विज्ञापनों में निखरना सीख
सम्मान मिलेगा अनुदान मिलेगा
जुटेंगे लोग मंच में बैठे सद्गुरुओं के मध्य स्थान मिलेगा
थोड़ा सा बस झपटना सीख
लिख दिया कर ‘उलूक’ उबकाइयां सभी
रोकना क्यों हैं उलटियां होने से पहले
संवेदनाएं कुछ लपकना सीख |


चित्र साभार: https://www.dreamstime.com/

बुधवार, 17 सितंबर 2025

राम को लिखते हैं खत बस एक डाकखाना नहीं मिलता

 


तेरे लिखे हुए में अपना अक्स नहीं मिलता  
और अपने लिखे हुए में आईना नहीं मिलता  
ख्वाहिश देखने की खुद को अपने हिसाब से अपनी
कहीं भी देखो खुद का चेहरा खुद से नहीं मिलता  

क्या क्या लिखे और कितना लिखे लिखने वाला  
मौजूँ के ढेर हैं और गिनतियां अंगुलियों के पोरों पर
जोड़ने घटाने में लिखे को लिखे लिखाए के पैमाने में
कलम को कागज पे चलाने का बहाना नहीं मिलता

रोज आते हैं अपने अपने रास्ते से यहां आदतन सभी
अपने रास्ते पर आने जाने का नाम और निशाना नहीं मिलता
वो खुदा में मसरूफ़ हैं इन्हें अल्लाह नहीं मिलता
ये राम को लिखते हैं खत बस एक डाकखाना नहीं मिलता

पुरानी आदत है तेरी बक बकाने की उलफ़त में ‘उलूक’
तू भी गा जन्मदिन मना केक खाएगा तेरे साथ में जमाना
नहीं लिखेगा अपने लिखे लिखाए में आबोदाना नहीं मिलता

चित्र साभार: https://www.istockphoto.com/  

शनिवार, 16 अगस्त 2025

“बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी” मेंहदी हसन की गाई ज़फ़र की गजल की ही बात करें


कृष्ण की बात करें
गीता की बात करें
जो हो रहा है उसे तो
होना ही है मानकर
आत्मसात करें

स्वतंत्रता दिवस मनाएं 
जन्माष्टमी भी मनाएं
झंडे साथ में लहरा घर घर
हर घर तिरंगे की बात करें

सकारात्मकता की
बात को फैलाएं
सकारात्मक होना ही होता है
जैसा माहौल बनाएं

करने कराने की बातें भी
कर ही लेंगे फिर कभी
फिलहाल के हाल पर
बबाल छोड़
जयमाल की बात करें

प्रकृति के इंद्रधनुष में
बेमिसाल सात रंगों की
मिसाल की बात करें

बादलों के फटने
हिमनदों के घटने
इंसानों के मरने मिटने की बात को
गीता के श्लोकों में छुपा
ज्ञान विज्ञान बता
संधान की बात करें
अनुसंधान की बात करें

युद्ध की विभीषिका
की बात पर बात करें
परमाणू हथियारों के साथ करें
युद्धभूमी पर ही दिया
कृष्ण ने अर्जुन को जो ज्ञान
उस गीता पर लिखी
मरने मारने की बातों पर बात करें

बात करना कौन सा मुश्किल है
समाधान ना भी निकले फिर भी
आयें बैठें
चाय समोसे पकौड़ी के साथ
हाथ से मिलाकर हाथ
गले मिलकर नारे लगाकर बात करें

रहने दें ना कर सकें बात तो ‘उलूक’
 “बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी”
मेंहदी हसन की गाई
ज़फ़र की गजल की ही बात करें |

चित्र साभार: https://www.shutterstock.com/

मंगलवार, 12 अगस्त 2025

जंगल की बात कर दिखा चारों तरफ सारा हरा हरा


सोच कर के लिख कुछ
कुछ लिख कर के सोच
सिक्का उछाल
हवा में रोज का रोज
चित भी तेरी पट भी तेरी
किसे देखना है
किसे है कुछ होश
खड़ा हो जाए अगर
दे डाल एक भोज
दे डाल एक भोज
अखबार में सिक्का जरूर छपवा
परदे के पीछे हो चुके अनर्थ को
मिट्टी डाल ले दे के पीछा छुड़ा
ले दे के पीछा छुड़ा
बर्बाद कर खुद ही घर को जरा जरा
खीसें निपोर रोज सुबह शाम को मुस्कुरा
जंगल की बात कर दिखा चारों तरफ सारा हरा हरा
पूछे कोई कुछ
आंखें लाल कर नस दबा
मोगेमबो की फ़ोटो दिखा और डरा
‘उलूक’ कथा “नौ महीने”
पटाक्षेप सुनहरा
सूंघे पत्रकार खबर फैली हुई
जो हो गया उस पर तिरंगा लहरा |

चित्र साभार: https://www.shutterstock.com/

वैधानिक चेतावनी : सत्य कथा पर आधारित बकवास में पात्रों का जिक्र नहीं किया गया है |




रविवार, 10 अगस्त 2025

पहुंचा कर महफ़िलों में बिना भूले कि प्रश्न पाठ्यक्रम से हटा दिए गए हैं

हां सही किया
देर से ही सही
इधर उधर देखना छोड़ दिया
और सीख लिया
नाक की सीध में चलना
नाक को ही बस देखते हुए

तुझे ज्ञान होना चाहिए
कि तेरा अस्तित्व तभी तक है
जब तक तेरी आंखें बंद हैं
जुबां सिली हुई है
और कानों में मैला जमा हुआ है

हां तेरे आने जाने में
कोई रोक टोक
कहीं भी नहीं है कभी भी नहीं है
बड़ी महफिलों में तो खासकर
पर वैधानिक चेतावनी के साथ
कि शर्तें लागू हैं

हां तू स्वतंत्र भी है
और 15 अगस्त भी
बस 5 ही दिन नजदीक है
सफेद कपड़े देख लेना
सिलवटें तो नहीं बची हैं
पिछले सालों की

आना है तुझे अनिवार्य रूप से
झंडारोहण देखने और सुनने भाषण
वो बात अलग है
तुझे रहना होगा वहां भी शशर्त

खबरदार
आदत डाल ले कि सब कुछ उत्तर होता है
प्रश्न पाठ्यक्रम से हटा दिए गए हैं

हां बकवास करने से
तुझे कोई नहीं रोक रहा है ‘उलूक’
वो भी शशर्त वैधानिक चेतावनी के साथ
कि पढ़ने के बाद कोई ये नहीं कह बैठे
समझ में आ गया है |

चित्र साभार: https://www.istockphoto.com/

शुक्रवार, 8 अगस्त 2025

कह नहीं देना जरा सा भी मंजूरे खुदा होता है

 
गले तक आता है कुछ
मुंह में कुछ और होता है
उलटने में निकलता है जो
वो कुछ और होता है

जलन होती ही है
जब जलता है कुछ हौले हौले अंदर कहीं
आग किसने लगायी है
आग कैसे लगायी है से क्या होता है

लौ होती नहीं है कोयला बनता नहीं है
राख उड़ती नहीं है
दियासलाईयां कागज पर कई
एक साथ लिखने से क्या होता है

ख़लिश को कसक कह लें
टीस कह लें या चुभन भी कह लें
तोहफा किस ने दिया है
सोच लेना ही बस जरूरी होता है

तंग नजर को चश्मे दिलाने की
सोचना किस लिए
आत्मघाती के लिए
मरने मारने का जज़्बा होना
जरूरी नहीं होता है

हजार आंखें देखेंगी
एक कबूतर बैठा हुआ मुंडेर पर
समझाएंगी तीतर बटेर कौआ
 आंखे खोल कर देखने से भी क्या होता है

‘उलूक’ देखना तुझ को भी है
आंखें खुली भी रखनी है
कबूतर है सोच ही लेना खाली
कह नहीं देना जरा सा भी
मंजूरे खुदा होता है |

चित्र साभार: https://stock.adobe.com/


बुधवार, 6 अगस्त 2025

हर किसी को करना है बहुत कुछ ऐसा जो तेरे हिसाब का कुछ भी नहीं

पता है लिख रहे हो तुम
बहुत कुछ बहुत संजीदा सा
मगर इस दुनियां का उसमें कुछ भी नहीं

सारे जवाब हैं
तुम्हारे खुद के प्रश्नों के हैं
और हैं भी सटीक
किसी के मतलब का उसमें कुछ भी नहीं

नदी ने
सवाल नहीं पूछे हैं कभी भी
बस चल दी है
लाव लश्कर के साथ
अपने ही रास्ते
तेरा कुछ हुआ क्या कुछ भी नहीं

कविता लिखने में
किसने कह दिया तुझसे
सवाल होने जरूरी होते हैं
रहने भी दे
होना नहीं है कुछ कुछ भी नहीं

कुछ होने के लक्षण
कुछ करने वालों के
लक्षणों से मिलाए जाते हैं
जैसे कुण्डली के
कुछ गुण होते हैं कुछ भी नहीं

कुछ भी
और कुछ भी नहीं में
अंतर किसे समझाए कोई कुछ
समझदानी किसी की छोटी
किसी की बहुत बड़ी किसी की कुछ भी नहीं 

‘उलूक’ रहने क्यों नहीं देता है
सबको अपने अपने हिसाब से
जब हर किसी को करना है
बहुत कुछ ऐसा जो तेरे हिसाब का कुछ भी नहीं

चित्र साभार:https://www.shutterstock.com/


सोमवार, 4 अगस्त 2025

फिलम साधू साधू -दो


 पिछला 
साधू साधू 
अभी कोई समझ नहीं पाया 
तू दूसरा एपिसोड 
साधू साधू का ले कर के क्यों आया 

तेरा
कुछ नहीं हो सकता है कालिये 
कुछ भी लिखने की आदत से 
बता रहे हैं
हजूर 
खुद को निकालिए 

आज खबर में
एक साधू दिख रहा है 
सारा मीडिया साधू के खिलाफ 
लिखा लिखाया कुछ बक रहा है 

जनता को वैसे भी 
कुछ समझ में नहीं आता है 
उसे तो बस वोट देते समय 
एक दाड़ी वाला साधू
सामने से नजर आता है 

लिखना सबको आता है 
कोई कहानी लिखता है 
कोई एक अपने  लिखे  कूड़े को 
कविता है बताता है 

कौन पढ़ने आता है कौन नहीं आता है 
पेज हिट गजब की चीज होती है 
बकवासी के लाखों हो गए होते हैं 
वो बताने में इतराता है 

एक कथावाचक की कहानी 
टी वी आज चला रहा है 
जनता रस ले रही है 
सबको मजा आ रहा है 

जय श्री राम वाले 
जय श्री राधे जय श्री कृष्णा 
अब सुना रहे हैं 
दाड़ी बाबा को नई कहानी सुना रहे हैं 

बकवासी 
बकवास करने से बाज नहीं आ रहा है 
अंधा रात का 
दिन की कहानी 
यहां किसलिए लेकर के आ रहा है 

बूझिए कभी 
लिखने पढ़ने में कौन सा जो हो जा रहा है 
‘उलूक’ भी
बकने से कौन सा बाज आ रहा है  

चित्र साभार:
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शनिवार, 2 अगस्त 2025

नागा बाबा होना साधू साधू से अच्छा होता है का मतलब समझ में आ जाता है

 

सारे साधू एक ही होते हैं
पता चल जाता है
एक साधू साधू की खबर
खुद अपने पैसे दे कर
अखबार में छपवाता है
साधू साधू
किसलिए कहा जाता है
तब समझ में आता है
जब टाई पहना हुआ एक साधू
सामने से आके
आपसे हाथ मिलाता है
और मुस्कुराता है
साधुओं से मिलकर
अंतरात्मा खुश ही नहीं तृप्त हो जाती है
साधू ही धर्म होता है
साधू ही जाति होती है
साधू ही मानवता होती है
साधू ही कृष्ण साधू ही राम हो जाता है
सबसे बड़ा साधू
आपके आस पास ही होता है
साधू साधू खेलता है
आपको पता ही नहीं चल पाता है
हम सब कितने भ्रमित होते हैं
कहां जा रहे होते हैं
क्या कर रहे होते हैं
साधू हमें भटकने से बचाता है
समय बदल गया है
साधू इसे भी समझाता है
साधू साधू जपिए
फायदे  गिनाता है
साधू की एक मुहिम होती है
कुछ भी कर ले जाने के लिए
किसी भी एक साधू को
तीर बनाता है
एक साधू धनुष हो जाता है
एक साधू अर्जुन हो जाता है
एक साधू मछली की आंख हो जाता है
साधू साधू है
सभी साधुओं के लिए
‘उलूक’ को गर्व है
कलयुगी ऐसे सारे साधुओं में
उसे नागा बाबा होना
साधू साधू से अच्छा होता है
का मतलब समझ में आ जाता है |

चित्र साभार:
https://www.vecteezy.com/

गुरुवार, 31 जुलाई 2025

नमी का धुआं धुआं सा हुआ है जैसे भी हुआ है

फिर से टपकने लगी हैं बूंदें
सूखी कलम से
न जाने ऐसा क्या हुआ है

रेत के सन्नाटे ने भी करवट ली है
कुछ धूल सी उड़ी है
ऐसा क्यों हुआ है

हुआं हुआं बरसों हो गए हैं सुने
शहर के जंगलों में फिर कुछ हुआ है
कितना हुआ है

शब्द डगमगाते लगे हैं
कागज में चले हैं आभास कुछ हुआ है
खाली बोतलों ने कुछ कहा है
कैसे कुछ हुआ है

पागल हो चुका है कोई
पागलपन नापने का थर्मामीटर
 कहीं 
कल ईजाद ही हुआ है
कितना हुआ है 

टपकेगा आसमान से पानी सुना है
अभी बादलों के बीच में
कोई समझौता हुआ है
कहां पर हुआ है

पन्ने भरें हैं लिखे हुए से
पढ़ दी गई हैं किताबें सारी
फिर से लिखने को कहा है
किसने कहा है किससे कहा है
किसका लिखना अपना सा हुआ है

चू लेता है ‘उलूक’ भी 
यूं ही घिसते घिसते
कहीं किसी छिद्र से गीला भी 
हुआ है
 नमी का धुआं
धुआं सा हुआ है जैसे भी हुआ है |

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मंगलवार, 29 जुलाई 2025

मगर आज गांधी खुद अपनी ही लकड़ी लेकर भी खड़ा हो नहीं पाता है



लिखने में खुद के भगवान फूंकता है
और वो पसर भी जाता है
कोई ढूंढे मशाल ले कर के इंसान
मगर दूर तक नजर नहीं आता है

बड़ी शिद्दत से लिख कर
शब्दों में आईने उतार लाता है
अफसोस उसका खुद का चेहरा
कलम की रोशनाई में डूबा रह जाता है

दर्द गम खुशी सब होते हैं
लबालब भी होते हैं और छलकते भी हैं
अपने हिसाब से समय देखकर
लिखने वाले के बटुवे में
आंख कान मुंह ही केवल
और केवल बंद नजर आता है

पाठक का अपना ही होता है ईश्वर
पढ़ते समय वो अपने  साथ ले 
ही आता है
ईश्वर अल्लाह तेरो नाम सबको सन्मति दे भगवान
गाने के बोल लब से फिसलते हैं मगर
आज गांधी खुद अपनी ही लकड़ी लेकर भी
खड़ा हो नहीं पाता है

इतनी बेशर्मी भी अच्छी नहीं ‘उलूक’
जब समझना सब कुछ के बाद भी
नासमझी से
झूठ की वैतरणी को पार किया जाता है | 

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