उलूक टाइम्स

सोमवार, 10 अगस्त 2026

"सरगोशियों के स्वर" का विमोचन

बिन्सर की सुरम्य वादियों में बादलों वाले आसमान के नीचे
'फारेस्ट विस्प' में एक साहित्यिक चर्चा !

गिर्दा कहते थे :=
“सावनी साँझ आकाश खुला है ओ हो रे ओ दिगौ लाली।
छानी खरीकों में धुआं लगा है ओ हो रे ओ दिगौ लाली।
थन लागी बाछी कि गै पंगुरी है द्वी - द्वा, द्वी - द्वा दुधी धार छूटी है
दुहने वाली का हिया भरा है ओ हो ये मन धौ धिनाली ओ हो रे ओ दिगौ लाली”।
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             ऐसी ही एक सावनी सांझ में एक बहुत अच्छी पुस्तक, जिसको एक बहुत अच्छे इंसान ने रचा है, के विमोचन समारोह में शामिल होने का अवसर मिला।  साहित्य में अगर आज के समय की चिन्ताएं नहीं हैं तो वह साहित्य, साहित्य नहीं है। वो बस काले या नीले किये पन्ने मात्र हैं।
             इस तरह प्रो0 सुशील जोशी जी का कविता संग्रह ‘सरगोशियों के स्वर’ अपने आप में एक वक्तव्य है बदले हुए समाज में फैलती विद्रूपताओं के खिलाफ़। सुशील सर का रचना संसार नया नहीं है। वे काफी समय में अपने समय की चिंताओं पर बात करते आये हैं। सुमित्रा नन्दन पन्त कहते हैं “आह से उपजा होगा गान”। ये जो आह है ये जो पीड़ा है, ये ही कविता बनती है। जब आप जिया हुआ सच लिखते हैं तो वो और प्रभावी हो जाता है। ऐसी ही कुछ बात ‘सरगोशियों के स्वर’ में है। 
              आज की इस साहित्यिक चर्चा में कुमाऊं विश्वविद्यालय के हिंदी के आचार्य डॉ देव सिंह पोखरिया जी को सुनने के अवसर मिला। उन्होंने कहा कि कवि को अपने लिए और दूसरों के लिए निर्मम होना होगा। तभी सच लिखा जा  सकेगा। कविता और साहित्य का समाज को बदलने में क्या योगदान है इस पर भी उन्होंने बात की। सोबन सिंह जीना विश्विद्यालय के पूर्व कुलपति प्रोफेसर जगत सिंह बिष्ट जी ने कविता संग्रह की बहुत सारी कविताओं को हमारे सामने रखा और उनके भाव पर बातचीत की। बदलते हुए समय में ये कवितायें कैसे महत्वपूर्ण हैं इस पर भी बिष्ट सर ने दृष्टि डाली। इसके बाद मशहूर रंगकर्मी और कवि नवीन बिष्ट जी ने सुशील सर के रचना संसार पर बात की। उनके ब्लॉग उलूक टाइम्स की चर्चा की। सोबन सिंह जीना विश्विद्यालय में सांख्यिकी विभाग के विभागाध्यक्ष  प्रोफेसर नीज तिवारी जी ने इन कविताओं के समसामयिकता पर बात की और बताया कि ये रचनायें कैसी आज प्रासंगिक हैं।
               इसी क्रम में प्रधानाचार्य इंटर कॉलेज स्यालीधार श्री उमेश पाण्डे जी ने वर्तमान समय में शिक्षक और विद्यार्थियों के सम्बन्धों और सुशील जोशी सर की जीवन शैली और सिद्धांतों पर बात की। साथ उनके पिता के जीवन चरित्र पर भी प्रकाश डाला। फोटोग्राफर और अध्येता श्री जय मित्र बिष्ट जी ने सुशील सर के बहु आयामी व्यक्तित्व और डॉ शमशेर सिंह बिष्ट जी के साथ उनके सम्बन्धों को याद किया। साथ ही अपनी फोटो ग्राफी की पुस्तक भी उन्हें भेंट की। सोबन सिंह जीना विश्विद्यालय में जनसंचार एवं पत्रकारिता के प्राध्यापक डा0 ललित जोशी ने आज की बातचीत को अंतरानुशासनिक बताते हुए ये उम्मीद जताई कि ऐसी चर्चाएं भविष्य में होती रहेंगे। सोबन सिंह जीना विश्विद्यालय प्राणिविज्ञान के प्राध्यापक डॉ अरुण ने अपनी बातचीत में कविता संग्रह को वर्तमान परिस्थितियों से जोड़ा और संग्रह की प्रशंसा की।
              सोबन सिंह जीना विश्विद्यालय के छात्र और एक अच्छे पाठक गौरव कांडपाल ने कविता संग्रह से कुछ कवितायें बहुत उतार-चढाओं के साथ पढ़ी और उनको समकालीन स्थितियों से जोड़ा। युवा साईक्लिस्ट दिनेश दानु ने युवाओं के जीवन में खेलों और फिट रहने और अपनी संस्कृति, धरोहर के संरक्षण पर चर्चा की। अंत में 'फारेस्ट विस्प' के संचालक और सुशील सर के पुत्र अभिषेक ने अपने पिता की  कविताओं पर बात की और सबको  धन्यवाद दिया।
              आज की ये चर्चा बिलकुल अनौपचारिक थी जिसमें सबको खुलकर बोलने का अवसर मिला। साहित्य की यही विशेषता है कि वह वाचाल को मृदुभाषी और कम बोलने वाले को विचार व्यक्त करना सिखा देता है। सुशील सर के कारण आज ये सम्भव हो सका। चर्चा में सोबन सिंह जीना विश्विद्यालय में भूगोल विभाग की विभागाध्यक्ष प्रो
0 ज्योति जोशी, साहित्यकार शम्भु राणा जी, एडवोकेट श्रीमती विभा पांडे, डी आर डी ओ के वैज्ञानिक डा0 हेमंत पांडे, वरिष्ठ पत्रकार जगदीश जोशी जी तथा डॉ पूरन जोशी भी शामिल रहे।                                                                           
 रिपोर्ताज --- डा0 पूरन जोशी

प्रधानमंत्री जी के पूर्व सलाहकार आई ए एस श्री भास्कर खुल्बे जी
कुलपति जी सोबनसिंह जीना विश्वविद्यालय प्रो0 एस पी एस बिष्ट
श्री विनीत कांडपाल केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण मुंबई न्यायपीठ में अनुवाद अधिकारी

               
                                                                 वीडियो साभार श्री सागर रौतेला

शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

चिट्ठाकार हैं कुछ स्वाभिमानी हैं कुछ थोड़ा सा बस पानी पानी हैं

 
थोड़ी सी हैं कुछ बातें हैं
खुद की हैं जो
खुद को बस थोड़ी सी समझानी हैं

किसी और से क्या कहना है कुछ
जब समझ में उसको
उसकी अपनी ही बातें नहीं आनी हैं

दिखता जो कुछ है
उसपर कुछ लिखना है
कहानी तो बस कुछ और ही
दिखे से इतर दो एक बनानी हैं

गांधी रखकर खोज  में अपनी
बंदर तीन उठा गोद में अपनी
नाख  कान आंख अपनी ही
खुद की ही तो बंद करवानी हैं

सच ही सोचेंगे सच ही खोदेंगे
सच की ही लड़ाई 
लड़ने को  ही
बस कुछ लिखने में ही ठानी है

अपने अपने लिखे लिखाए में
अपनी बातें इसकी बातें उसकी बातें
बातें तो बस आनी जानी हैं

कुछ पढ़ते हैं इसका ही लिखा
कुछ को लिखा उसका बस पढ़ना है
कुछ को बस लिखना ही है
पढ़ना ही बस बेमानी है

कुछ लिखते पढ़ते हैं
कुछ पढ़ते हैं फिर लिखते हैं
सब की अपनी आदत हैं
समझ में कुछ कुछ ही तो आनी हैं

चिट्ठाकारी से जन्मे हैं
कुछ चिट्ठे हैं
चिट्ठाकार हैं कुछ
स्वाभिमानी हैं
कुछ थोड़ा सा बस
पानी पानी हैं
|

                                                         
                                            चित्र साभार: https://www.dreamstime.com/

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मंगलवार, 28 जुलाई 2026

अल्बर्ट पिन्टो गुस्सा भूल जाता है लीला देख कर कल्कियों की भुनभुनाता है

 


घर के राम कृष्ण हनुमान को साथ ले
सड़क कोई एक नापने निकल जाता है
अल्बर्ट पिन्टो गुस्सा भूल जाता है
लीला देख कर कल्कियों की भुनभुनाता है

समझने में गलतियाँ करता है अनेकों एक साथ
सीधे रास्ते में ही उलझ जाता है
दिखाने को बनाए चित्र अपने रंगों से भरे
अंधे साथ रखता है उन्हें मनाता है

सुनाने को कहानियां देखी हुई खुद की
बहरों को सुबहो शाम आवाजें लगाता है
लूले गाते हैं गीत लिखे भक्ति भाव से उसके
यही आगास नई रागों की धुन बनाता है

भरम होते हैं टूट कर गिरते भी हैं पता नहीं
बेखयाली उन्हें फिर से चुन उठाता है
‘उलूक’ खुद समझता है समझ गया है खुद का लिखा
फिर से समझाने को चला आता है |

चित्र साभार : https://www.wallpaperflare.com/

सोमवार, 27 जुलाई 2026

कुछ अलग से हो निर्भया के साथ हुए को भी समझाओगे

 


अब कौन सा छछूंदर और ढूंढ के तुम ले आओगे
कितना गिरोगे हजूरे आला तुम अब लुढ़क जाओगे

रहने दो नापना एक फुट को तीस सेंटीमीटर से अब
अपनी उलझनों को जनता को खुद आ दिखाओगे

अपना चेहरा खुद तो देख लिया करो किसी का नोचने से पहले
हमाम की दीवार ढह गई है अब कहो किसका क्या छुपाओगे

लिखे में दिखता है लिखने वाले का सबकुछ बहुत साफ साफ
अपने लिखे में खुद को लिखा हुआ कभी तो कुछ दिखाओगे

बेटियां किस की थी किसने सोचना था तुम क्यों पछताओगे
कुछ अलग से  हो निर्भया के साथ हुए को भी समझाओगे

‘उलूक’ चिकने घड़े से भी पूछेगा मजबूरी में हमेशा आदतन
जतन कर लो फिसल गए किसी और के हाथों से टूट जाओगे |

चित्र साभार https://www.shutterstock.com/

रविवार, 19 जुलाई 2026

कल कत्ल हो खबर आज की मगर होनी ही चाहिए

 

इंतहा है बेशरमी की होनी भी चाहिए
शरम निगोड़ी कभी धोनी भी चाहिए

मुहं खोलते ही फैलता है रायता जिसका
ककड़ी हरी हो पीली हो धोनी ही चाहिए

पढ़े लिखे होने का घमंड लिखे में भी दिखे
एक अनपढ़ की जी हजूरी होनी ही चाहिए

गिरना जरूरी है गिरे हुए को और कहीं नीचे
ऊंचाइया देखने में सिर से टोपी गिरनी ही चाहिए

इतिहास में दर्ज होगी फेंकी गई स्याही सरेआम
अनपढ़ सरदार की कलम कबाड़ में बिकनी ही चाहिए

कितना कुछ लिखे कोई क्या लिखे किसपर लिखे 
सब उतार के बैठे की खाल भी  उतरनी ही चाहिए

‘उलूक’ अपनी खीज अपने पर ही उतार ले आज
कल कत्ल हो खबर आज की मगर होनी ही चाहिए | 

चित्र साभार: https://www.reddit.com/

शुक्रवार, 17 जुलाई 2026

छोटी सी बात है चोरी मत उछाल मजाक की भी हद्द है सरकार



चोरी डकैती हत्या बलात्कार भ्रष्टाचार व्यभिचार
कौन सा आज का है एक नया समाचार
इतिहास में भी होता आया हो जो कई कई बार
उसका किसलिए जिक्र करना बार बार

चोर घर का हो अपना हो
किसलिए उसपर बात करना
किसलिए बैठाया है हर थाने में एक थानेदार
चोर चोर चिल्लाए जो चोर के सामने सामने
उसका श्राद्ध बहुत जरूरी हो गया है करना इस बार

खुद गुनाह करे और करे इबादत भी वही गुनहगार
सबसे अच्छा है वही आज का उत्कृष्ट कारोबार
क्या जरूरत वकील की क्या अदालत की
सजा देने को हर खजूर बैठा है जब कलम ले तैयार

किसी को कुछ नहीं आता है समझ में
दिमाग रखता है बस एक हजूर का ठेकेदार
सारी निविदाएं होती हैं उसकी
उसी को लिखनी होती है खबर उसी का होता है अखबार

‘उलूक’ समझ को ठोक लिया कर अपनी हथौड़े से
कुछ भी पढ़ने से पहले हर बार
भगवान जब लिख रहा हो कुछ
बिना पढे ही लिख क्यों नहीं देता
दंडवत प्रणाम और नमस्कार ?

चित्र साभार: https://www.dreamstime.com/

बुधवार, 15 जुलाई 2026

फिर हुई खुजली अंगुलियों में मगर कलम की स्याही आजकल जाम है

 

वर्णांधता या रंग अंधापन
परिभाषित करना
आज जब बहुत ही आसान है
समझ में आए रंग भी
और दिखे इंद्रधनुष रक्त में
साधू फिर क्यों परेशान है

सौ झूठ बोलते
दिव्य दर्शन सच के हो जाना
सुना आज बहुत आम है
कहीं कितने भी हों विलाप भक्तो
मूल्यों का आलाप जरूरी सुबहो शाम है

सही की परिभाषा गढ़ रहा है नई कोई
समझा करो बहुत ही विद्वान है
गिरोह से प्रेम रखता है तो क्या
गिरोह के कत्लेआम में ही तो सम्मान है

बतला रहा है
टांग पर खड़ा है एक बरसों से
क्या हुआ अगर हम्माम है
कपड़े खुद के उतरे हुए हैं सारे सभी
आईने में तो दिख रहा सब गुलफाम है

किसलिए करें बात शर्म करने की
लाशों के ढेर हैं ठहाके भी हैं
बस रोना हराम है
लिखे में दिख रहा है चेहरा किसी का
और लिखा माथे पर भी गुलाम है

‘उलूक’ गिनना मोतियाबिंद सोच पर पड़े
और बिखरे हुए कागजों पर
एक बड़ा काम है
किसको देखनी है अब रोशनी सुबह की भगत
अंधेरे का ही बस करना जब गुणगान है?

चित्र साभार: https://pixabay.com/

रविवार, 31 मई 2026

तिलचट्टे तिलचट्टे तिलचट्टे बस तिलचट्टे



सभी यहीं हैं कई कई हैं
यट्टे बट्टे सट्टे कट्टे
कितने कितने गिनते गिनते
मौज मनाते तिलचट्टे

इसने लिक्खे उसने लिक्खे
शब्द जोड़ कर हट्टे कट्टे
हवा में उड़ते फर फर फिरते
खिल खिलाते तिलचट्टे

इसके खाए उसके खाए
राजा लाए चोखे लिट्टे
खुशबू पाए घर घर जाए
पाले पोसे तिलचट्टे

किसने पढ़ने किसने लिखने
ढोल बजाते गिरगिट गिट्टे
आंख मूद कर कूद कूद कर
गाने गाएं तिलचट्टे

जिसकी सुलगी उसने उगली
गली गली कित्ते कित्ते
तुलसी सूर कबीर जायसी
लगते आज बित्ते बित्ते

छोड़ ‘उलूक’ मना मौज
रहने दे खुजली
घिस घर पर ही सिलबट्टे
लिखने दे लिखते रहते हैं
उड़ते गिरते चिढ़ते चिढ़ते
तिलचट्टे ही तिलचट्टे |

चित्र साभार: https://www.vecteezy.com/

शुक्रवार, 30 जनवरी 2026

पिता होना बात तो है पर राष्ट्रपिता होना ? कभी न चाहते हुए भी कुछ लिखना जरूरी हो जाता है

हम हैं
कितना हैं
हमको आभास है
अपने उतना होने का
हम बिल्कुल भी नहीं थे
जब तुम थे पूरे से भी जियादा
तुम नहीं थे तब हम हैं
कितना हैं पता नहीं है
हमारे होने और हमारे न होने में
बहुत बड़ा फासला नहीं है
आज हैं कल नहीं भी होंगे
कितना नहीं होंगे
समय फैसला करेगा
तुम कल भी थे आज भी हो
और तुम रहोगे भी
तुम्हारा होना भी उतना ही जरूरी है
तुम थे तब हालात बहुत खराब थे
तुम नहीं थे हालात और भी खराब हो गए
संतुलन की धुरी में
तुमने तब भी बनाए रखा विश्वास
आज भी है तुम्हारे नहीं होने के बाद भी
हमने तुम्हें नहीं देखा हमने तुम्हारे बारे में सुना
कितने भाग्यशाली होंगे वो लोग जो तुम्हारे साथ थे
कितने अभागे हैं हम
तुम नहीं हो हमारे साथ हमारे ही कारण
एक पीढ़ी से लेकर दूसरी पीढ़ी
क्या अनंत तक अंत नहीं है तुम्हारा
आज के दिन तुम्हें याद करना
सबसे जरूरी है
क्योंकि
आज भी वैसे ही दिन हैं
जैसे तब थे जब तुम थे
‘उलूक’ नतमस्तक है तेरे सामने
जब तू नहीं है
राष्ट्रपिता बापू
आज ही नहीं हर दिन तेरा दिन है
नमन |

चित्र साभार: https://www.shutterstock.com/



रविवार, 30 नवंबर 2025

लिखना कूड़ा कुछ फैलाना सफाई से कुछ

 

कुछ वो भी नहीं लिख रहे कुछ
कुछ हम भी नहीं लिख रहे कुछ  

कहीं वो भी नहीं दिख रहे हैं कुछ
वहीं हम भी नहीं दिख रहे हैं कुछ

कहा है उन्होंने ही
किसलिए लिख रहे कुछ
कुछ कह रहे हैं
वो दिख रहे हैं इसीलिए
लिख रहे हैं कुछ

पड़ा हुआ है इतना इधर कुछ
कुछ उधर बिछा रहे हैं कुछ
कैसे पढ़े कोई सभी कुछ
रहने दिया जाए कुछ
पढ़ लिया सब कुछ जरूरी नहीं है 
सब से ही कह दिया जाए कुछ

कब से साफ सफाई से
बहुत साफ सुथरा सा लिख रहे कुछ
कुछ लिखा रहे हैं साफ कूड़ा कुछ
कुछ सिखा रहे हैं सरताज कूड़ा कुछ
पहले बेतरतीब लिख फ़ैला रहे थे जो कुछ
घेर कर बाड़े में उनको सबक सीखा रहे हैं कुछ

‘उलूक’ रहने दे नहीं बस में तेरे कुछ
लिखना कुछ दिखाना कुछ
आसान नहीं है इतना सब कुछ
समेटने में सफाई से कूड़ा कुछ
फैलाने में सफाई से कूड़ा कुछ

चित्र साभार: https://pngtree.com/

सोमवार, 20 अक्टूबर 2025

शुभ हो मंगलमय हो प्रकाश मय हो बाहर भीतर ऊपर नीचे नौ दिशाएं जमीन आसमान


सभी के पास होते हैं
मिट्टी के दिए रुई की बाती
तेल और दियासलाई
जलाने के लिए कुछ भी कहीं भी कभी भी
सभी को जरूरत होती है
रोशनी की
सभी चाहते है फैलाना भी
प्रकाश को
इधर उधर सभी जगह कहीं भी कभी भी
रोशनी कहें प्रकाश कहें उजाला कहें
या ऐसा ही कुछ कहें
जिस से आभास हो सके
कुछ ऐसा दिखाई देने का सामने से
जो घुस सके दिमाग में
और कुलबुला सके
सुसुप्त पड़े जीवन कणों को
एक पुराने हो चुके मकान की
जीर्ण शीर्ण खिड़कियों के
हलकी हवा में भी हिलते
पल्लों के बीच की झिररियां भी
जीवंत हो उठती हैं कुछ देर के लिए ही सही
रोशनी बेचने से लेकर
रोशनी खरीदने के बीच की
दूरियां कहें या खाई कहें
बहुत प्यार से भरती चली जाती हैं स्वत: ही
गरीब की रोशनी और अमीर की रोशनी
सब साई के
"सबका मालिक एक" के मानिंद
आत्मसात कर लेती हैं एक दूसरे को
रोशनी का मजहब कह लिया जाए
या धर्म का प्रकाश कहें
दोनों एक ही बात
सोचिए कितनी इफ़रात रोशनी ही रोशनी
रोशनी ही इबादत रोशनी ही सौगात
बस एक ही
कुछ उलझन से भरा जीव ‘उलूक’
आंखें झपकाता ऊंघता हुआ अपने कोटर में
रात में हो चुके दिन से हैरान
जपता रोशनी की कामना ही है सबसे महान
शुभ हो मंगलमय हो प्रकाश मय हो
बाहर भीतर ऊपर नीचे
नौ दिशाएं जमीन आसमान |

चित्र साभार: https://pngtree.com/

सोमवार, 22 सितंबर 2025

समय के हिसाब से गिरगिटिया सहूर हजूर के हिसाब से कुछ रंग बदलना सीख



हौले हौले से कर आंखे बंद
ध्यान में कुछ लिखना सीख उसके बाद
साध कान को बांध आवाज को
व्यवधान में कुछ लिखना सीख उसके बाद
बंद कर मुंह दिल में गुनगुना राग सुन बिना आवाज
संधान में कुछ लिखना सीख उसके बाद
साधक हो जाएगा सधेगा खुद भी
बाधाओं के बाजार लगेंगे
बस तू थोड़ा सा कुछ बिकना सीख
सधी हुई लेखनी से सधा हुआ कुछ लिखा हुआ
सामने कागज पर उतर आएगा
भीड़ होगी मधुमक्खियों की तरह
जहर के पानदानों के विज्ञापनों में निखरना सीख
सम्मान मिलेगा अनुदान मिलेगा
जुटेंगे लोग मंच में बैठे सद्गुरुओं के मध्य स्थान मिलेगा
थोड़ा सा बस झपटना सीख
लिख दिया कर ‘उलूक’ उबकाइयां सभी
रोकना क्यों हैं उलटियां होने से पहले
संवेदनाएं कुछ लपकना सीख |


चित्र साभार: https://www.dreamstime.com/

बुधवार, 17 सितंबर 2025

राम को लिखते हैं खत बस एक डाकखाना नहीं मिलता

 


तेरे लिखे हुए में अपना अक्स नहीं मिलता  
और अपने लिखे हुए में आईना नहीं मिलता  
ख्वाहिश देखने की खुद को अपने हिसाब से अपनी
कहीं भी देखो खुद का चेहरा खुद से नहीं मिलता  

क्या क्या लिखे और कितना लिखे लिखने वाला  
मौजूँ के ढेर हैं और गिनतियां अंगुलियों के पोरों पर
जोड़ने घटाने में लिखे को लिखे लिखाए के पैमाने में
कलम को कागज पे चलाने का बहाना नहीं मिलता

रोज आते हैं अपने अपने रास्ते से यहां आदतन सभी
अपने रास्ते पर आने जाने का नाम और निशाना नहीं मिलता
वो खुदा में मसरूफ़ हैं इन्हें अल्लाह नहीं मिलता
ये राम को लिखते हैं खत बस एक डाकखाना नहीं मिलता

पुरानी आदत है तेरी बक बकाने की उलफ़त में ‘उलूक’
तू भी गा जन्मदिन मना केक खाएगा तेरे साथ में जमाना
नहीं लिखेगा अपने लिखे लिखाए में आबोदाना नहीं मिलता

चित्र साभार: https://www.istockphoto.com/  

शनिवार, 16 अगस्त 2025

“बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी” मेंहदी हसन की गाई ज़फ़र की गजल की ही बात करें


कृष्ण की बात करें
गीता की बात करें
जो हो रहा है उसे तो
होना ही है मानकर
आत्मसात करें

स्वतंत्रता दिवस मनाएं 
जन्माष्टमी भी मनाएं
झंडे साथ में लहरा घर घर
हर घर तिरंगे की बात करें

सकारात्मकता की
बात को फैलाएं
सकारात्मक होना ही होता है
जैसा माहौल बनाएं

करने कराने की बातें भी
कर ही लेंगे फिर कभी
फिलहाल के हाल पर
बबाल छोड़
जयमाल की बात करें

प्रकृति के इंद्रधनुष में
बेमिसाल सात रंगों की
मिसाल की बात करें

बादलों के फटने
हिमनदों के घटने
इंसानों के मरने मिटने की बात को
गीता के श्लोकों में छुपा
ज्ञान विज्ञान बता
संधान की बात करें
अनुसंधान की बात करें

युद्ध की विभीषिका
की बात पर बात करें
परमाणू हथियारों के साथ करें
युद्धभूमी पर ही दिया
कृष्ण ने अर्जुन को जो ज्ञान
उस गीता पर लिखी
मरने मारने की बातों पर बात करें

बात करना कौन सा मुश्किल है
समाधान ना भी निकले फिर भी
आयें बैठें
चाय समोसे पकौड़ी के साथ
हाथ से मिलाकर हाथ
गले मिलकर नारे लगाकर बात करें

रहने दें ना कर सकें बात तो ‘उलूक’
 “बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी”
मेंहदी हसन की गाई
ज़फ़र की गजल की ही बात करें |

चित्र साभार: https://www.shutterstock.com/

मंगलवार, 12 अगस्त 2025

जंगल की बात कर दिखा चारों तरफ सारा हरा हरा


सोच कर के लिख कुछ
कुछ लिख कर के सोच
सिक्का उछाल
हवा में रोज का रोज
चित भी तेरी पट भी तेरी
किसे देखना है
किसे है कुछ होश
खड़ा हो जाए अगर
दे डाल एक भोज
दे डाल एक भोज
अखबार में सिक्का जरूर छपवा
परदे के पीछे हो चुके अनर्थ को
मिट्टी डाल ले दे के पीछा छुड़ा
ले दे के पीछा छुड़ा
बर्बाद कर खुद ही घर को जरा जरा
खीसें निपोर रोज सुबह शाम को मुस्कुरा
जंगल की बात कर दिखा चारों तरफ सारा हरा हरा
पूछे कोई कुछ
आंखें लाल कर नस दबा
मोगेमबो की फ़ोटो दिखा और डरा
‘उलूक’ कथा “नौ महीने”
पटाक्षेप सुनहरा
सूंघे पत्रकार खबर फैली हुई
जो हो गया उस पर तिरंगा लहरा |

चित्र साभार: https://www.shutterstock.com/

वैधानिक चेतावनी : सत्य कथा पर आधारित बकवास में पात्रों का जिक्र नहीं किया गया है |