उलूक टाइम्स

मंगलवार, 24 जुलाई 2012

कबूतर कबूतर

नर
कबूतर ने
मादा
कबूतर को

आवाज
देकर
घौंसले से
बाहर
को बुलाया

घात
लगाकर
बैठी हुई
उकड़ू

एक
बिल्ली को
खेत में

सामने
से दिखाया

फिर
समझाया

बेवकूफ
बिल्ली

पुराने
जमाने की
नजर
आ रही है

कबूतर
को पकड़ने
के लिये

खुद
ही घात
लगा रही है

जमाना
कहाँ से कहाँ

देखो
पहुँचता
जा रहा है

इस
पागल को
अब भी

बिल्ली
को देखकर

आँख बंद
करने वाला
कबूतर याद
आ रहा है

अरे
इसे कोई
समझाये

ठेका
किसी

स्टिंग
आपरेशन
करने वाले
को देकर
के आये

किसी भी

ईमानदार

सफेद
कबूतर
पर पहले

काला धब्बा
एक लगवाये

उसके बाद

उसका
जलूस एक
निकलवाये

उधर

अपने
खुद के घर

पत्रकार
सम्मेलन
एक करवाये

फोटो सोटो
सेशन करवाये

इतना कुछ

जब हो
ही जायेगा

कबूतर
खुद ही

शरम के मारे
मर ही जायेगा

समझदारी
उसके बाद

बिल्ली दिखाये

कबूतर
के घर

फूल
लेकर
के जाये

शवयात्रा
में शामिल
होकर

कबूतरों
के दिल में
जगह बनाये

फिर
जब भी
मन में आये

कबूतर
के किसी भी

रिश्तेदार
को घर बुलाये

आराम से

खुद
भी खाये

बिलौटे
को भी
खिलाये ।

सोमवार, 23 जुलाई 2012

आज बस मुर्गियाँ

आज कुछ
मुर्गियाँ
लाया हूँ

खाने वाले
खुश ना
होईयेगा

चिकन नहीं
बनाया हूँ

बस
लिख कर
मुर्गियाँ
फैलाया हूँ

सुबह सुबह
मुर्गियों ने मेरी
बहुत कोहराम
मचाया हुआ था

कल देर से
सोया था
रात को

सुबह के
शोर से जागा
तो बहुत
झल्लाया था

कल ही नयी
कुछ तमीजदार
मुर्गियाँ खरीद
के लाया था

पुराने दड़बे
में पुरानी
कम 

पढ़ी लिखी
मुर्गियों में
लाकर उन को
घुसाया था

नयी मुर्गियाँ
पुरानी 

मुर्गियों से
नाराज नजर
आ रही थी

इसलिये 

सब के सब 
जोर जोर
से चिल्लाये
जा रही थी

मुर्गियों को
मुर्गियों में
ही मिलाया था

मुर्गीखाना था
उसी में डाल
कर के 

आया था

किसी को
लग रहा हो
कबूतर खाना
मैंने तो कहीं
नहीं बनाया था

क्यों कर
रही होंगी
मुर्गियाँ ऎसा

समझने की
कोशिश
नहीं कर
पा रहा था

अपने खाली
दिमाग की
हवा को
थोड़ा सा
बस हिलाये
जा रहा था

थक हार
कर सोचा

मुर्गियों से ही
अब पूछा जाये

इस सब बबाल
का कुछ हल तो
ढूँढा ही अब जाये

मुर्गियों ने बताया
कल जब उनको
लाया जा रहा था

तब उनको ये भी
बताया जा रहा था

इधर की मुर्गियाँ
कुछ अलग
मुर्गियाँ होंगी
कुछ नहीं करेंगी

उनको बहुत
आराम से
सैटल होने को
जगह दें देंगी

पर यहाँ तो
अलग माजरा
नजर आ रहा है
हर मुर्गी में
हमारे यहाँ की
जैसी मुर्गियों का
एक डुप्लीकेट
नजर आ रहा है

मैने बहुत
धैर्य से सुना
और प्यार से
मुर्गियों को
थपथपाया
और समझाया

वहाँ भी मुर्गियाँ थी
यहाँ भी मुर्गियाँ है

वहाँ से यहाँ
आने पर मुर्गी
आदमी तो
नहीं हो जायेगी

हो भी जायेगी
तब भी मुर्गी
ही कहलायेगी

चुप रहे तो
शायद
कोई नहीं
पहचान पायेगा

मुँह खोलते
ही दही दूध
फैलायेगी

अपनी हरकतों से
पकड़ी ही जायेगी

इसलिये
ज्यादा मजे
में तो मत
ही आओ

दाना मिल
तो रहा है
पेट भर के
खाते जाओ

फिर
कुकुड़ूँ कूं
करते रहो

मेरा
बैंड बाजा
पहले से ही
बजा हुआ है
तुम उसको
फिर से तो
ना बजाओ

मुर्गियो
आदमी हो
जाने के ख्वाब
देखने से

 बाज आओ ।

रविवार, 22 जुलाई 2012

लोटा प्रतियोगिता

नीचे लिखे
लम्बे को
सब से छोटा
बनायेगा जो
प्रतियोगिता
में भाग लेगा
सब से बड़ा
लोटा भी
इनाम में ले
जायेगा वो ।


अजीब सा
महसूस होता है
अजीब अजीब
तरह के लोग
अजीब तरह से
पेश आते हैं
अजीब अजीब
सी बातें
पता नहीं
कैसे कैसे
अजीब अजीब
तरीकों से
सामने आ आ
कर गुनगुनाते हैं
अब एक
अजीब सी
शख्सियत
सामने आये
अजीब तरह
की हरकतें करे
और आशा करे
सामने वाला
मुस्कुराये
अजीब होने पर भी
किसी को कुछ भी
अजीब सा
ना लग पाये
ऎसे बहुत से
अजीब लोग
अजीब तरह
से रोज ही
तो टकराते हैं
अजीब लोगों को
कुछ हो या ना हों
हम भी तो सारा
अजीब पी जाते है
वैसे अजीब हो जाना
या अजीब सा कुछ
कर जाना ही
तो ज्यादा से
ज्यादा शोहरत
दिला जाता है
देख लीजिये
दुनिया की
सबसे अजीब
चीजों को ही
सातवें आश्चर्य की
सूची में शामिल
किया जाता है
इसलिये समय रहते
कोशिश करने में
क्या जाता है
अगर कोई अजीब
ना होते हुऎ भी
अजीब हो
जाना चाहता है
इसलिये खोजिये
अपने में भी
कुछ भी
अजीब अगर
आपको नजर
आता है
क्या पता उस
अजीब का होना
आपको भी
दुनिया का
सबसे अजीब
चीज बना
जाता है।

शनिवार, 21 जुलाई 2012

आज कुछ नहीं है

आप
कुछ भी
कह कर
के देखो
वो उस पर
कुछ कुछ
कह ही
जाते हैं

कुछ
जनाब
कुछ भी
हो जाये
कुछ नहीं
कह कर
जाते हैं

कुछ को
हमेशा
कुछ ना
कुछ होता
रहता है

कुछ ने
देखा नहीं
कुछ कहीं
कुछ कुछ
होना उनको
शुरु होता है

कुछ हुआ
है या नहीं
कुछ को
कुछ तो
जरूर पता
होता है

जाकर
देखना
पड़ता है
कुछ इस
सब के लिये
कुछ ना कुछ
कुछ जगह
पक्का ही
लिखा होता है

कुछ नहीं
भी हो कहीं
तो भी
क्या होता है

कुछ हो
जाता है
अगर तब
भी कौन
सा कुछ
होता है

कुछ होने
या ना
होने से
कुछ
बहुत कुछ
कहने से
बच जाते है

कुछ
कहूंगा
पक्का
सोचते हैं
पर कुछ
कहने से
पहले ही
कुछ भ्रमित
हो जाते हैं

कुछ
आते हैं
कुछ
जाते है
कुछ
पढ़ते हैं
कुछ
लिखते हैं

कुछ
कुछ
भी नहीं
करते हैं

बस कुछ
करने
वालों
से कुछ
दुखी हो
जाते हैं

कुछ दिन
कुछ नहीं
करते हैं

कुछ  दिन
बाद फिर
कुछ कुछ
करना शुरू
हो जाते हैं ।

शुक्रवार, 20 जुलाई 2012

मान भी जाया कर इतना मत पकाया कर

अब
अगर
उल्टी
आती है
तो कैसे
कहें उससे
कम आ

पूरा मत
निकाल
थोड़ा सा
छोटे छोटे
हिस्सों में ला

पूरा निकाल
कर लाने का
कोई जी ओ
आया है क्या

कुछ पेट में भी
छोड़ कर आ

लम्बी कविता
बन कर के क्यों
निकलती है
कुछ क्षणिंका
या हाईगा
जैसी चीज
बन के आ जा

अब अगर
कागज में
लिखकर
नहीं होता हो
किसी से
हिसाब किताब
तो जरूरी
तो नहीं ऎसा
कि यहाँ आ आ
कर बता जा

अरे कुछ
बातों को रहने
भी दिया कर
परदे में
बेशर्मों की
तरह घूँघट
अपना उधाड़
के बात बात
पर मत दिखा
रुक जा

वहाँ भी कुछ
नहीं होने वाला
यहाँ भी कुछ
नहीं होने वाला
नक्कार खाने
में कितनी भी
तूती तू बजाता
हुआ चले जा

इस से
अच्छा है
कुछ अच्छी
सोच अपनी
अभी भी
ले बना

मौन रख
बोल मत
शांत हो

अपना भी
खुश रह
हमको भी
कभी चाँद
तारों सावन
बरसात
की बातों
का रस
भी लेने दे

बहुत
पका लिया
अब जा ।

गुरुवार, 19 जुलाई 2012

किसी का भी जुर्म हो वो तेरा बहूरानी


स्कूल कालेज 
सरकारी हो
या 
गैर सरकारी 

किसी की
संपत्ति थोड़े 
ना हो जाता है

उस पर 
अधिकार 
होता है
तो 
केवल उसका 

जिसकी
दीवार से 
आसानी से कूड़ा
शिक्षाकेन्द्र के 
अंदर तक 
किसी तरह 
फेंका जाता है

फायदे ही 
फायदे 
गिन लीजिये 
अंगुलियों में 

उस
के लिये 
जो ऎसी
जगह पर 
मकान एक 
बना ही 
ले जाता है

घर तक 
जाने के लिये
मेटल्ड रोड 
स्कूल ही
दरवाजे तक 
खुद ही 
पहुँचा जाता है

कार रख 
सकता है 
अपनी

और 
किराये पर 
दूसरे तीसरे 
की भी

गैरेज बनाने 
के खर्चे से 
सीधे सीधे 
बच जाता है

बेवकूफ 
मैदान इसी के 
तो काम 
में आता है

फर्नीचर
की 
जरूरत में 
चारपाईयों 
की ही हो 
सकती है 

क्योंकि वो ही 
एक फर्नीचर 
होता है जो 
कालेज में 
कम ही 
खरीदा 
जाता है 

कुर्सी मेज 
कितनी हैं 
कौन गिनने में 
लगा रहता है 

अगर कोई 
अपने घर 
को भी 
दो चार एक 
उठा ले 
जाता है 

गाय पालन 
आसान 
और गाय 
का दूध 
सस्ता मिल 
जाता है 

घास मैदान 
में उगती है 
और 
गोबर कालेज 
का जमादार 
जब
उठा ले जाता है

पानी बिजली 
की
जरूरत 
रात को तो 
होती नहीं वहां 

इसलिये ये 
दोनो रात के 
लिये ही बस 
ले जाता है 

देखो कितना 
मितव्ययी होकर
बर्बाद होने से 
दोनो महंगी 
चीजों को 
बचाता है

अब इन 
छोटी छोटी 
चीजों को 
कहने के लिये 
किसके पास 
फुर्सत है

स्कूल कालेज 
किसी का 
अपना ही 
घर जैसा 
थोड़े ना 
हो जाता है

ज्यादा
ही 
परेशानी
किसी 
को हो 
रही होती है 
समस्याओं
से 
इस तरह 
की
कहीं तो 

दिल्ली में 
बैठी तो है 
इंदिरा की बहू 

उसके के 
सर में जाकर 
इसका भी 
ठीकरा
फोड़ने में 
क्या जाता है।

बुधवार, 18 जुलाई 2012

उस समय और इस समय और दिल

पहलू
और उसपर
दिल का होना

पता
चल जाता है

जिस दिन से
शुरू हो जाती है
कसमसाहट

हमारे पुराने
जमाने में भी
कोई नया जो
क्या होता था

ऎसा ही होता था

पर थोड़ा सा
परदे में होता था

स्टेज एक में
धक धक करने
लगता था

स्टेज दो में
उछलने लगता था

स्टेज तीन में
किसी के कंट्रोल
में चला जाता था

स्टेज चार में
भजन गाना शुरु
हो जाता था

अब तो डरता
भी नहीं है
बस लटक जाता है

बहुत
मजबूती से
बाहर से ही
दिखाई
देता है कि है

स्टेज वैसे ही
एक से चार
ही हो रही हैं

गजब का स्टेमिना है

चौथे में जाकर
भी बहार हो रही है

इस जमाने के
कर रहे हों तो
अजूबा सा नहीं लगता

हमारे जमाने के
कुछ कुछ में
हलचल
लगातार हो रही है

ऎ छोटे से
खिलौने
मान जा
इतनी सी
शराफत
तो दिखा जा

पुराने
जमाने के
अपने भाई बहनों
को थोड़ा समझा जा

अभी भी कटेगा
तो कुछ हाथ नहीं
किसी के आयेगा

फिर से उसी बात
को दोहराया जायेगा

कतरा ए खून
ही गिरेगा
वो भी किसी के
काम में नहीं आयेगा

दिल है तो क्या
गुण्डा गर्दी पर
उतर जायेगा।

मंगलवार, 17 जुलाई 2012

सोच दिखती नहीं फैल जाती है

चल रहा था
मुस्कुरा रहा था
हाथ की अंगुलियां
हिलाये जा रहा था
बड़बड़ा रहा था
उसके आस पास
जबकि कोई भी
दूर दूर तक कहीं
नजर नहीं आ रहा था
ये सब मैं उसके
सामने से देखता
हुआ आ रहा था
बगल से जैसे ही
वो निकला
मेरा दिमाग ऎसे चला
जैसे चलने वाली मशीन
का बटन किसी ने हो
तुरंत ही दबा दिया
मुस्कुरा रहा था
पक्का कोई अच्छी
खबर अभी अभी
सुन कर आ रहा था
हाथ हिला रहा था
पक्का क्या करने
जा रहा था
उसका प्लौट
अपने सामने से
देख पा रहा था
बड़बड़ा रहा था
पक्का शादी शुदा
होगा बता रहा था
जो कुछ बीबी से
कह नहीं पा रहा था
कह ले जा रहा था
अरे अरे देखिये
उसको तो जो भी
हुऎ जा रहा था
ये सब मैं काहे
सोच ले जा रहा था
अच्छा हुआ इस सब
के बीच मेरे अपने
सामने से कोई नहीं
दूर दूर तक आ रहा था।

सोमवार, 16 जुलाई 2012

बस इधर और उधर

इधर जा
उधर जा
देखना मत
झांक आ

कहीं रूखा है
कहीं सूखा है
कहीं झरने हैं
कहीं बादल हैं
कोई खुश है
कोई बिदका है
जैसा भी है
कुछ लिखता है

इधर जा
उधर जा
झांक मत
देख आ

किसी का
अपना है
किसी का
सपना है
वो बनाता है
ये ढूँढ लाता है
उसकी आदत है
इधर जाता है
उधर जाता है
इसका लाता है
उसको दिखाता है
अपनी प्रोफाइल पर
कौए उड़ाता है

इधर जा
उधर जा
झाँक मत
देख मत

अपना खाना
अपना पीना
सब कुछ रख
फेंक मत
कैलेण्डर ला
दीवार पर लगा
अपनी तारीख
किसी को
ना बता
जाली चढ़ा
शीशे लगा
कुछ दिखे
बाहर से
काला भूरा
पेंट लगा

इधर जा
उधर जा
रुक जा
चुप हो जा
फालतू
ना सुना ।

रविवार, 15 जुलाई 2012

कविता कमाल या बबाल

अखबार
में छपी
मेरी
एक कविता

कुछ
ने देख कर
कर दी
अनदेखी

कुछ
ने डाली
सरसरी नजर

कुछ
ने की
कोशिश 
समझने की

और
दी 
प्रतिक्रिया

जैसे
कहीं पर
कुछ हो गया हो

किसी
का जवान लड़का 
कहीं खो 
गया हो

हर
किसी 
के भाव

चेहरे पर 
नजर
आ जा रहे थे

कुछ 
बता रहे थे

कुछ 
बस खाली

मूँछों
के पीछे
मुस्कुरा रहे थे

कुछ 
आ आ कर
फुसफुसा रहे थे

फंला फंला 
क्या
कह रहा था

बता के
भी
जा रहे थे

ऎसा 
जता रहे थे

जैसे
मुझे 

मेरा कोई
चुपचाप 
किया हुआ
गुनाह 
दिखा रहे थे

श्रीमती जी 
को मिले
मोहल्ले के 
एक बुजुर्ग

अरे 
रुको 
सुनो तो 
जरा

क्या 
तुम्हारा वो
नौकरी वौकरी
छोड़ आया है

अच्छा खासा 
मास्टर
लगा तो था
किसी स्कूल में

अब क्या 
किसी
छापेखाने 
में
काम पर 
लगवाया है

ऎसे ही 
आज

जब अखबार में
उसका नाम 
छपा हुआ 
मैंने देखा

तुम 
मिल गयी
रास्ते में 
तो पूछा

ना 
खबर थी वो

ना कोई 
विज्ञापन था

कुछ 
उल्टा सुल्टा
सा
लिखा था

पता नहीं 
वो क्या था

अंत में 
उसका
नाम भी 
छपा था

मित्र मिल गये
बहुत पुराने

घूमते हुवे 
उसी दिन
शाम को 
बाजार में

लपक 
कर आये
हाथ मिलाये 
और बोले

पता है 
अवकाश पर
आ गये हो

आते ही 
अखबार
में छा गये हो

अच्छा किया
कुछ छ्प छपा
भी जाया करेगा

जेब खर्चे के लिये
कुछ पैसा भी
हाथ
में आया करेगा

घर 
वापस पहुंचा
तो

पड़ोसी की
गुड़िया आवाज
लगा रही थी

जोर जोर से
चिल्ला रही थी

अंकल 
आप की
कविता आज के
अखबार में आई है

मेरी मम्मी 
मुझे आज 
सुबह दिखाई है

बिल्कुल 
वैसी ही थी
जैसी मेरी 
हिन्दी की
किताब में 
होती है

टीचर 
कितनी भी
बार समझाये 

लेकिन
समझ से 
बाहर होती है

मैं उसे 
देखते ही
समझ गयी थी 

कि ये जरूर 
कोई कविता है

बहुत ही 
ज्यादा लिखा है

और
उसका 
मतलब भी
कुछ नहीं 
निकलता है।