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गुरुवार, 31 मई 2012

निठल्ले का सपना

कौआ अगर
नीला होता
तो क्या होता

कबूतर भी
पीला होता
तो क्या होता

काले हैं कौए
अभी भी
कुछ नया कहाँ
कर पा रहे हैं

कबूतर भी
तो चिट्ठियों 

को नहीं ले
जा रहे हैं

एक निठल्ला
इनको कबसे
गिनता हुवा
आ रहा है

मन की कूँची
से अलग
अलग रंगों
में रंगे
जा रहा है

सुरीली आवाज
में उसकी जैसे
ही एक गीत
बनाता है

कौआ
काँव काँव
कर चिल्ला
जाता है

निठल्ला
कुढ़ता है
थोड़ी देर
मायूस हो
जाता है

जैसे किसी
को साँप
सूँघ जाता है

दुबारा कोशिश
करने का मन
बनाता है

कौए को छोड़
कबूतर पर
ध्यान अपना
लगाता है

धीरे धीरे तार
से तार जोड़ता
चला जाता है

लगता है जैसे
ही उसे कुछ
बन गयी
हो बात

एक सफेद
कबूतर
उसके सर
के ऊपर से
काँव काँव कर
आसमान में
उड़ जाता है।

बुधवार, 30 मई 2012

झंडा है जरूरी

ये मत समझ लेना
कि वो बुरा होता है

पर तरक्की पसन्द
जो आदमी होता है

किसी ना किसी
दल से जरूर
जुड़ा होता है

दल से जो 
जुड़ा
हुवा नहीं होता है

उसका दल तो
खुद खुदा होता है

स्टेटस उसका बहुत
उँचा उठा होता है

जिसके चेहरे पर
झंडा लगा होता है

सत्ता होने ना होने
से कुछ नहीं होता है

इनकी रहे तो
ये उनको
नहीं छूता है

उनकी रही तो
इनको भी कोई
कुछ नहीं कहता है

इस बार इनका
काम आसान होता है
उनका ये समय तो
आराम का होता है

अगली बार उनका
हर जगह नाम होता है
इनका कुन्बा दिन
हो या रात सोता रहता है

बिना झंडे वाले
बकरे का
बार बार काम
तमाम होता है

जिसे देखने
के लिये भी
वहाँ ना ये होता है
ना ही वो होता है

भीड़ काबू करने का
दोनो को जैसे कोई
वरदान होता है

भीड़ के एक छोटे
हिस्से पर इनका
दबदबा होता है
बचे हिस्से को
जो काबू में
कर ही लेता है

अपने कामों को
करने के लिये
झंडा मिलन भी
हो रहा होता है

मीटिंग होती है
मंच बनता है
उस समय इनका
झंडा घर में सो
रहा होता है

पर तरक्की पसंद
जो आदमी होता है
किसी ना किसी
झंडे से जुड़ा होता है

जिसका
कोई झंडा
नहीं होता है
वो कभी भी
ना ये होता है
ना वो होता है।

मंगलवार, 29 मई 2012

कुत्ते की पूँछ

कुत्ते सारे
मोहल्ले के

आज सुबह
देखा हमने
जा रहे थे

सब अपनी
अपनी पूँछ
सीधी करके

पूछने पर
पता चला
नाराज हैं

हड़ताल
पर जा
रहे हैं

आज
रात से
गलियों में
भौंकने के
लिये भी
नहीं आ
रहे हैं

क्या दोष
है इसमें
माना सीधी
नहीं हो पाती है
पूँछ हमारी
अगर पाईप के
अन्दर भी रख
दी जाती है

छ: महीने का
प्लास्टर भी
अगर लगाओ
फिर से वैसी
ही टेढ़ी पाओ
जब प्लास्टर
खुलवाओ

सभी लोगों का
अपना अपना
कुछ सलीका
होता है

हर आदमी का
अपने काम को
अपनी तरह
करने का 

एक अलग
तरीका 
होता है

अब अगर
किसी को
किसी का
काम पसंद
नहीं आता है

तो इसके बीच
में कोई कुत्ते
और
उसकी पूँछ
को क्यों
ले आता है

बस बहुत
हो गया

आदमी की
बीमारियों
को अब
उसके अपने
नामों से ही
पंजीकृत
करवाओ

लोकतंत्र है
कुत्तों के
अधिकारों
पर चूना
मत लगाओ

कोई सोच
खुद की
अपनी भी
तो बनाओ।

सोमवार, 28 मई 2012

कूड़ा (एक)

रोज घर के
कूड़े की
एक थैली
बनाता है

मुंह अंधेरे
एक चेहरा
खिड़की से
बाहर निकल
कर आता है

ताकत लगा
कर थैली को
दूसरे घर
के आंगन में
पहुँचाता है

चेहरा
खिड़की बिना
आवाज किये
बंद करता
हुआ लौट
कर अपने
बिस्तरे पर
जा कर
फिर से
लुढ़क
जाता है

इस आँगन
से उस
आँगन तक
होता हुवा
थैला थैलों
से टकराते
छटकते
अंतत:
कूडे़दान
में समा तो
नहीं पाता है

पर कुछ
मुरझाये
कुछ थके हारे
सा होकर
सड़क तक
पहुँच कर
फट फटा
जाता है

कूड़ा अंदर
का निकल
कर बाहर
खुले में फैल
जाता है

बाहरी कूडे़
का सलीकेदार
प्रबंधन मेरे
शहर के हर
पढे़ लिखे
को आता है

जैविक अजैविक
कूडे़ की थैलियाँ
आते जाते कहीं
ना कहीं टकरा
ही जाती हैं

घर वालों की
औकात कूड़े
में फेंके गये
सामान से
मेल भी
खाती हैंं

थोड़ी सी
बात 'उलूक'
के पाव भर
के हवा भरे
दिमाग में
बस यहाँ
पर नहीं
घुस पाती है

दिमाग में
भरे हुवे
कूडे़ का
निस्तारण
वही चेहरा
अपने
अंदर से
कौन से
थैले में
और कहाँ
जा कर
कराता है

टी वी में
होता है कुछ
रेडियो में
होता है कुछ
कुछ अखबार
के समाचार में
चिपका हुआ
नजर आता है

चेहरा अपने
अंदर के कूड़े
के साथ
ईमानदारी
दिखाता है

कोई थैला
कहीं भी
फटा हुआ
किसी गली
किसी सड़क
में नजर
दूर दूर
तक भी
नहीं आता है ।

चित्र साभार: cliparts.co

रविवार, 27 मई 2012

एहसानमंद

एक बूढ़ा और
उसकी बुढ़िया
के एहसानो के
तले मैंने जब
अपने को गले
गले तक दबा
हुआ पाया
कुछ तो
करना ही
चाहिये उनके
लिये मेरे मन
में विचार
एक आया
हालत उनकी
देख कर
देखा नहीं
जा रहा था
एक चल नहीं
पा रहा था
दूसरे से
दाँत टूटने
के कारण
खाया ही
नहीं जा
रहा था
पैसे बच्चों
को देने से
बच्चे बिगड़
जाते हैं
किताबों में
लिखा है
आस पास
में उदाहरण
भी बहुत
मिल जाते हैं
बूढे़ लोग भी
उम्र के इस
पडा़व में
आकर बच्चे
जैसे ही तो
हो जाते हैं
ऎसा करता हूँ
समुद्र के
किनारे से
सौ कोस
दूर टापू
में एक
बडा़ सा
महल
बनाता हूँ
दोनो के
आने जाने
के लिये
दो दो
हाथी भी
रख कर
आता हूँ
खाने के
लिये एक
जहाज भर
कर अखरोट
पहुँचाता हूँ
कुछ धन
उनके नाम
से अपने
खाते में
हर महीने
जमा
करवाता हूँ
उपर वाला
जैसे ही उनको
बुलाता है
मैं समुद्र किनारे
एक मंदिर
बनवाता हूँ
उसमें दोनो
की मूर्ति
लगवाकर
माला फूलों की
पहनाता हूँ ।

शनिवार, 26 मई 2012

वकील साहब काश होते आज

मेरे शहर अल्मोड़ा
की लाला बाजार

ऎतिहासिक शहर
बुद्धिजीवियों की
बेतहाशा भरमार

बाजार में लगा
ब्लैक बोर्ड पुराना

नोटिस बोर्ड की
तरह जाता है
अभी तक भी जाना

छोटा शहर था
हर कोई शाम को
बाजार घूमने जरूर
आया करता था

लोहे के शेर से
मिलन चौक तक
कुछ चक्कर जरूर
लगाया करता था

शहर
का आदमी
कहीं ना कहीं
दिख ही जाता था

शहर की
गतिविधियाँ
यहीं आकर पता
कर ले जाता था

मेरे शहर में
मौजूद थे
एक वकील साहब

वकालत
करने वो कहीं
भी नहीं जाते थे
हैट टाई लौंग कोट
रोज पहन कर
बाजार में चक्कर
लगाते चले जाते थे

बोलने
में तूफान
मेल भी साथ
साथ दौड़ाते थे
लकडी़ की छड़ी
भी अपने हाथ
में लेके आते थे

कमप्यूटर उस
समय नहीं था
कुछ ना कुछ
बिना नागा
ब्लैक बोर्ड
पर चौक
से लिख
ही जाते थे

उस समय
हमारी समझ
में उनका
लिखा
कुछ भी
नहीं आता था

पर
लिखते गजब
का थे उस समय
के बुजुर्ग लोग
हमें बताते थे

बच्चे
उनको
पागल
कह कर
चिढ़ाते थे

आज
वकील साहब
ना जाने
क्यों याद
आ रहे हैं

भविष्य
की कुछ
टिप्पणियां
दिमाग
में आज
ला रहे हैं

मास्टर
साहब एक
कमप्यूटर
पर रोज
आया  करते थे

कुछ ना कुछ
स्टेटस पर
लिख ही
जाया करते थे।


शुक्रवार, 25 मई 2012

नंदू और पैट्रोल

पैट्रोल
के दाम
जब से
हैं बढे़

मुझे
अभी तक
नहीं दिखाई
दिये किसी के
कान खड़े

कल शाम
मैंने सोचा
आज
जब मैं
सड़क के
रास्ते से जाउंगा
गाड़ियांं स्कूटर
मोटरसाईकिल
सब को
गायब पाउंगा

पर सारे
छोरा छोरी
लोग
और जोर के
फर्राटे की
आवाज आज
बना रहे थे
कल तक
एक दो
चक्कर
टकराते थे
आज
सात आठ
चक्कर
लगा रहे थे

स्कूल
पहुंचने पर
किसी ने भी
पैट्रोल की
बात भी नहीं की
कारें सभी
लोगों ने
लाकर
मैदान में
आज जरूर
खड़ी की

ट्रक ट्राँस्पोर्ट
गाड़ियोंं
वाले नेता
जगह जगह
भीड़ लगवा रहे थे

पुतले सरकार
के बना बना कर
आग भी लगाते
जा रहे थे

पैट्रोल की
बात पर
किसी ने
जब मुझे
मुँह नहीं
कहींं लगाया

कामगार
नंदू की याद
ने मुझे घर को
वापस लौटाया

घर जल्दी
आकर
मैंने नंदू से
सहानुभूति
जब जताई

नंदू को
मेरी बात
आज
बिल्कुल भी
समझ में
नहीं आई

बोला
बाबू साहब
पैट्रोल बढे़
गैस बढे़
मेरा कुछ
भी कहीं
नहीं जाने
वाला है

मेरे परिवार
में तो कोई
घासलेट भी
नहीं खाने
वाला है

आप लोग
तो कार
गाड़ी पर
हमेशा जायेंगे

मेरे पैर
के छाले
तुम्हारी
सरकार
को
कहाँ
नजर
आयेंगे।

गुरुवार, 24 मई 2012

अंडा बिक गया

अंडे एक टोकरी
के अपने को बस
चरित्रवान दिखाते हैं
दूसरी टोकरी की
मालकिन को
चरित्रहीन बताते हैं
कल दूसरी टोकरी के
अंडों ने पहली के एक
अंडे को फुसला लिया
चरित्रवान अंडा
चरित्रहीन कहलाये
जाने वाले अंडों
मे मिला लिया
इधर का एक
अंडा उधर के
एक अंडे का  

रिश्तेदार भी
बताया जाता है
पहली बार
उसने चुराया था
इस बार ये वाला
बदला ले जाता है
आमलेट बनाने वाले
भी दो तरह के
पाये जाते है
एक माँसाहारी दूसरे
माँस के पुजारी
बताये जाते हैं
अंडा फोड़ों का
हर बार  इन्ही
बातों पर झगडा़
हो जाता है
ये झगड़ा करते
रह जाते हैं
इस बीच इनका
अपना अंडा
इनको ही
धोखा दे जाता है
अब पहली
टोकरी में अंडा
जगह खाली
करके आया है
दूसरी टोकरी
का अंडा ये बात
मुर्गी रानी को
पहुंचाके आया है
छ: महीने के
भीतर एक नया
अंडा मुर्गी
लेकर आयेगी
अंडे से अंडा
लड़वाया जायेगा
जो जीत जायेगा
उसे टोकरी
का राजा
बनवाया जायेगा
आमलेट बनाने
वाले फिर
लंगोट पहन
कर आयेंगे
चरित्र दिखा
कर लाइन
के इधर
उधर जायेंगे
कब्बडी एक
बार फिर से
मैदान में
खेली जायेगी
मैदान के
बाहर अंडे
की बोली
लगायी जायेगी
अंडों के पोस्टर
भी बड़े बड़े
छपवाये जायेंगे
अंडे उछलते रहेंगे
टोकरी वालों को गंजा
कर चले जायेंगे
अंडे इस टोकरी से
उस टोकरी में जायेंगे
टोकरी वाले अपनी
धोती को खिसकते
हुवे फिर से पकड़ 
कर खिसियायेंगे। 

बुधवार, 23 मई 2012

सुन्दर घड़ीसाज

चंदू वैसे हर
कोण से ऎलर्ट
नजर आता है
हर काम में
अपने को
परफेक्ट
वो बनाता है
मायूस होते
हुवे मैने
उसे कभी
भी नहीं पाया
समय के पाबंद
ने कल जब
अपनी घड़ी को
चलते हुवे
नहीं पाया
हाथ झटकते
हुवे तब थोड़ा
सा वो झल्लाया
पर आज सु
बह फिर से
आफिस में
सीटी बजाते
हुवे दाखिल हुवा
जैसे कल के दिन
उसकी सेहत
को रत्ती भर
भी कुछ
नहीं हुआ
घड़ी उसकी
उसकी अपनी
कलाई पर ही
नजर आ रही थी
पर टिक टिक
उसकी आज
एक बिल्कुल
नई कहानी
सुना रही थी
महिलाओं की 

ओर मुखातिब
हो कर भाई
ने बतलाया
सैल बदलने
घड़ी की
दुकान पर
कल शाम
जब वो आया
एक सुंदर
सुघड़
मोहतरमा
को काम
करते वहाँ पाया
घड़ी को बड़ी
नजाकत से
पेचकस से
खोल कर
उसने सैल
को जब से
अंदर को
सरकाया
जैसे जैसे
पूरा वाकया
सुनाता
चला गया
घड़ीसाज
के काम का
वो कायल
होता गया
चलती है
या रुकी है
अब नहीं
देखने वाला है
अपने घर की
सारी घड़ियों
के सैल एक
एक करके
बदलने वाला है
महिलायें अभी
तक चुपचाप
चंदू को सुनती
जा रही थी
बस थोड़ा
थोड़ा बीच
बीच में कभी
मुस्कुरा रही थी
बोली इस से
पहले हमारे
पतिदेव लोग
दुकान का
पता चला लेंगे
हम लोग भी
अपने घर की
सारी घड़ियों
के सारे सैल
आज ही
जा कर के
बदलवा
डालेंगे ।

मंगलवार, 22 मई 2012

चप्पल और ओपन हार्ट

हृदयाघात होने का
जैसे ही हुवा अंदेशा
लल्लू शहर छोड़
हार्ट केयर सेंटर पहुंचा
ऎंजियोग्राफी
की नौबत आई
डाक्टर ने ओपन हार्ट
सर्जरी की राय बनाई
तुरंत ही कर दिया जायेगा
बस पाँच से छ:लाख का ही
खर्चा इसमें आ जायेगा
क्या करता बेचारा
किस्मत का मारा
आपरेशन थियेटर को जब
ट्राली ले जायी जा रही थी
लल्लू को अपनी हवाई चप्पल
की चिंता सताये जा रही थी
डाक्टर साहब आपरेशन
थोड़ा सा टलवा दीजिये
मेरे भाई से मेरी चप्पल
पहले आप सम्भलवा दीजिये
नामी सर्जन बिल्कुल भी
नहीं तिलमिलाया
बस थोड़ा सा मुस्कुराया
चप्पलों को एक पोलिथिन
लाकर खुद उस में बंधवाया
लल्लू को दिखा कर बाहर
खड़े उसके भाई पप्पू के
हाथ में थमा आया
चप्पल देख कर पप्पू
थोड़ी देर को चकराया
फिर जा कर चप्पल की
थैली रिसेप्शन के एक कोने
में रखकर चला आया
आपरेशन चल रहा था
पप्पू भी सोफे में लेटा
लेटा जम्हाइयाँ भर रहा था
इतने में पप्पू की बेगम
पप्पी वहाँ पर आई
पप्पू ने पप्पी को सारी
बात फटाफट समझाई
वो जब रिसेप्शन पर
जाकर देख के आई
चप्पल की थैली वहाँ
से गायब देख कर
घबरा के लौट के आई
उधर आपरेशन चलता
चला जा रहा था
इधर चप्पल का गायब होना
पप्पू और पप्पी का चैन
उडा़ता जा रहा था
पप्पी ने अचानक दिमाग
अपना खुजलाया
रिसेप्शन पर जा कर
ह्ल्ला जोर से मचाया
सी सी टी वी खुलवाने
का जब भय दिखाया
दरवाजे पर खड़ा दरबान
तुरंत थैला लेकर आया
बोला मैने आपकी चप्पलों
का बहुत ख्याल रखा था
इसी लिये इसको संभाल
के अपने पास रखा था।

सोमवार, 21 मई 2012

चोरवा विवाह और मास्टर

आमीरखान का
धारावाहिक
सत्यमेव जयते
हम नहीं भी देखते
दूर दर्शन का डब्बा
घर पर कपड़े से ढक
कर जरूर हैं रखते
साथियों के बीच हो
रही चर्चा से पर क्या
कह कर बचते
कल के साप्ताहिक
अंक का एक पहलू
रहा चोरवा विवाह
जिसको सुन सुन कर लोग
भर रहे थे आह पर आह
अजब गजब का किस्सा
बताया जा रहा था कि
देश के कुछ इलाकों में
होनहार बुद्धिमान वरों को
बंदूक की नोक पर उठवा
लिया जाता है
उसके बाद किसी एक कन्या
से उसका जबरदस्ती विवाह
भी करा दिया जाता है
प्रशाशक अभियंता चिकित्सक
प्राथमिकता से उठवाये जाते है
उसके बाद धमकी के देकर
वधू के साथ उसके घर
छोड़ दिये जाते हैं
वैसे तो होता क्या है
विवाह तो विवाह होता है
ऎसे होता है या वैसे होता है
किसी को भी इस किस्से में
मजा नहीं आ रहा था
तभी किसी ने एक नयी
बात वहां पर बताई
जिसको सुन कर सारे
चर्चाकारों के चेहरे पर
अच्छी सी मुस्कान आई
अब तो कभी कभी
मास्टरों को भी उठवा
लिया जाता है
उनका भी चोरवा विवाह
करवा दिया जाता है
इस बात से पता चला
मास्टर भी अब तरक्की
के रास्ते पर आ रहा है
कुछ लोकप्रियता इस तरह
से वो भी पा जा रहा है
सम्मानित लोगों के साथ
उसको भी कभी कभी
उठा लिया जा रहा है
चलो शादी के बाजार में
बड़े लोगों के बीच
कुछ कीमत कोई तो
उसकी भी लगा रहा है।

रविवार, 20 मई 2012

वट सावित्री

श्रीमती जी
सुबह से
ही आज
इधर उधर
जा रही थी


कभी
नयी साड़ी
पहन रही थी


कभी
नाक में
नथ चड़ा
रही थी


अरे
आज तो
जल्दी उठ
कर के नहा
भी लीजिये
का हल्ला
मचा रही थी


पता चला
'वट सावित्री'
का व्रत कर


पूजा
घर पर ही
करवा रही थी


मैने पूछा उनसे


अजी ये
वट सावित्री
क्या बला है


घरवाली बोली


मेरे इस व्रत
को करने से ही
आपका होने
वाला भला है


सावित्री
के पति
सत्यवान
के प्राण
वट वृक्ष के नीचे
जब लेने आता
है यमराज


वापस
लौटने में
स्वर्ग के
द्वार तक
सावित्री को
अपने ही पीछे
आता हुवा
पाता है जब धर्मराज


उसकी
जिद के आगे
जब वो हार जाता है


सत्यवान
के प्राण
उसे लौटाता
है यमराज


इसी लिये
सावित्री
वट वृक्ष
के साथ
अभी तक
पूजी जाती है


हर पत्नी को
प्राण प्यारी
का दर्जा वो
ऎसे ही
दिलवाती है


पत्नी
पति के
प्राणों को
बिल्कुल भी
निकलने देना
कभी नहीं
चाहती है


एक ही बार में
पति के प्राण
निकाल निकाल
के यमराज
अगर ले जायेगा


तो बताइये
पत्नी के
निकालने
के लिये फिर
क्या कुछ
रह जायेगा


यमराज जी
आप ये काम
पत्नियों
को ही
सौंप दीजिये


काहे
पंगे में पड़ते हैं
धीरे धीरे
प्राण प्यारी को ही
पति परमेश्वर
के प्राण
निचोड़ने दीजिये।

शनिवार, 19 मई 2012

ब्राह्मण और मीट

ब्राह्मणों ने शुरु किया
जब से मीट है खाना
बूचडो़ ने सोच लिया
मीट का दाम है बढ़ाना
चाह रहे थे बैंक वाले भाई
तिवारी जी को समझाना
कालेज को जाते समय
ये वाकया सामने आया
तिवारी जी ने जब मुझे
आवाज दे कर बुलाया
एक जमाना था पुराना
कर्म आधार था
वर्ण व्यवस्था का
चार वर्ण में मेरे देश
का आदमी आपस
में बंटता था
जमाना बहुत ही आगे
चला आज आया
आदमी ने भी अपने
कर्मों का दायरा बढा़या
मास्टर स्कूल में
पढा़ना छोड़ के आया
डाक्टर हस्पताल की
दवाई ही बेच आया
बैंक वाले ने गरीब की
भैंस के लोन पर खाया
हर कोई आज ऊपर की
कमाई चाहता है
करता खुद कुछ है और
सामने वाले को समझाता है
बिना कुछ करे किसी के भी
कंधे पर चढ़ कर ऊपर की
ओर जाना चाहता है
उस समय वो वर्ण व्यवस्था
को पूरा पूरा भुनाता है
एक वर्णी लोगों से मिलकर
कहीं भी हाथ मारने में
बिल्कुल नही हिचकिचाता है
काम पूरा जब हो जाता है
वर्ण व्यवस्था के खिलाफ
झंडा खुद उठाता है
सफेद टोपी निकाल के
अन्ना के जलूस की
आगवानी करने भी
आ जाता है
आज जब अधिकतर लोग
देश में हर तरफ कुछ
भी खाते चले जा रहे हैं
फिर भी बाजार में हम
रुपये का भाव गिरता
हुआ देखते चले जा रहे हैं
ऎसे में समझ में नहीं
मेरे आ पा रहा है
ब्राह्मण का मीट खाना
मीट के दाम को
कैसे बढा़ रहा है
तिवारी जी हम ये बात
बिल्कुल भी नहीं
पचा पा रहे हैं
हम भी वैसे शिकार नहीं
खा पा रहे हैं और आपके
प्रश्न का उत्तर भी नहीं
आज दे पा रहे हैं।

शुक्रवार, 18 मई 2012

तबादला मंत्री

नयी सरकार लग रहा है
कुछ कर दिखायेगी
सुना जा रहा है पहाड़ी
राज्य में तबादला उद्योग
जल्दी ही लगायेगी
पिछली सरकार के तबादला
ऎक्ट को रद्द करने
वो जा रही है
उसके लिये विधान सभा
की मुहर जरूरी है
बता रही है
वैसे तबादले करने से क्या
हो पाता है
मेरी समझ मे आज भी
ये नहीं आता है
मेरा विश्वविद्यालय संस्था
एक स्वायत्तशाशी है
तबादला करने करवाने की
यहाँ नहीं बदमाशी है
जो काम करता है
वो करता ही चला जाता है
जो नहीं करता है उससे
काम करवाने की हिम्मत
कोई नहीं कर पाता है
क्यों नहीं करता पूछने पर
"बने रहो पगला
काम करेगा अगला"
मुहावरा बड़े चाव से सुनाता है
अपनी सरकार को एक
सुझाव मैं देने जा रहा हूँ
पहाड़ी राज्य को प्रगति के पथ
पर ले जाना चाह रहा हूँ
ये ऎक्ट वेक्ट खाली
काहे बदलवा रहे हो
तबादला मंत्री का
पोर्टफोलियो एक
क्यों नहीं बना रहे हो
लाल बत्ती के एक चाहने
वाले को क्यों नहीं
इसमें खपा रहे हो
तबादले में सुना था
पिछली बार बहुत
कुछ खाया जा रहा था
राज्य की उन्नति में
उसमे से धेला भी नहीं
लगाया जा रहा था
मंत्रालय हो जायेगा
तो एक उद्योग
पनप जायेगा
कुछ हिस्सा
तबादलाखोरी का
राज्य के खजाने में
दो चार कौड़ी तो
जमा कर जायेगा।

गुरुवार, 17 मई 2012

कड़वी चीनी

चीनी के
बारे में
सबसे
कड़वी
बात

दैनिक
हिन्दुस्तान
में छपी
एक खबर
ने हमें
बतायी
है आज

"ज्यादा
चीनी
का सेवन
बनाता है
बेवकूफ़"

बात वैसे
लग रही
है बहुत
ही खूब

इस बात
को हम
कब से
रहे थे
अपने ही
घर में सूंघ

श्रीमती जी
बहुत दिनों
से हमें
चाय
बिना चीनी
के पिलाये
जा रही थी

ये बात
मेरी समझ
में बिल्कुल
भी नहीं
आ रही थी

इसके
खिलाफ
मेरा
परम मित्र
मुझे
भड़का
रहा था
अपने
घर मेंं
एक कप
चाय में
दो चम्मच
चीनी
डाल कर
पिला
रहा था

श्रीमती जी
को कभी
महसूस
मैं फिर
भी नहीं
करा पाया

चीनी कम
खाने से
मेरी
बेवकूफी
में कुछ
अंतर
भी आया

ये समाचार
पत्र भी
अजीब
अजीब
समाचार
छाप के
ले आते हैं

किसी
दिन
चीनी
तो
किसी
दिन
नमक
खाने से
परहेज
करवाते हैंं

घूस
खाने
वाला
बनता है
या
बनाता है
बेवकूफ
नहीं बता
पाते हैं

चीनी
नमक
जैसी चीज
खाने वाले
के पीछे
ही पड़
जाते हैं

देखिये
किस तरह
बेवकूफ
बना ले
जाते हैं।

बुधवार, 16 मई 2012

सफेद बाल

मेरे सफेद बाल
हो गये हैं अब
खुद मेरे लिये
आज एक बवाल

हर कोई इनसे
दिखता है परेशान

जैसे
उड़ रहे हों
मेरे सर के
चारों ओर
कुछ अजीब
से विमान

एक मित्र जो रोज
बाल काले करता है

उसकी बीबी
का डायलाग
हमेशा ऎसा
ही रहता है

अरे आपके
कुछ बाल
अभी काले
नजर आते हैं
आप
अपने बाल
डाई क्यों
नहीं कराते हैं

हर दूसरा भी राय
देने की कोशिश
करता है एक नेक
भाईसाहब आपके
बाल इतनी जल्दी
कैसे हो गये सफेद

एक सटीक दवाई
हम आपको बताते हैं

एक ही रात में
उसको खा के सारे
बाल काले हो जाते हैं

कल जब मैं सड़क पर
बेखबर जा रहा था
देखा एक आदमी
सड़क किनारे रेहड़ी
अपनी सजा रहा था

कुछ जड़ी बूटियां
बेचने वाला जैसा
नजर आ रहा था

मुझे देखते ही दौड़
कर मेरी ओर आया
हाथ पकड़ मेरा
मुझे अपनी रेहड़ी
की तरफ उसने बुलाया

अंकल अंकल ये वाली
बूटी आप मुझ से ले जाओ
एक हफ्ते में अपने
सारे बाल काले करवाओ

सौ रुपये में इतना
आप और कहाँ पाओ
असर ना करे तो
दो सौ मुझसे ले जाओ

उसको इतना उतावला देख
कर मैं धीरे से मुस्कुराया
उसकी तरफ जाकर
उसके कान में फुसफुसाया

पचास साल लगे हैं
इन बालों को
सफेद करवाने में
तुझे क्या मजा
आ रहा है
इनको एक हफ्ते में
काले करवाने में
मेरी की गई मेहनत
पर पानी फिरवाने में

कोई दिल काला
करने की दवा है
तो अभी दे जा
सौ की जगह
पाँच सौ तू ले जा

काले दिल वालों का
जमाना आ रहा है
उन सब को जेल से
बाहर निकाला जा रहा है

उनके खुद किये गये
घोटालों पर ब्याज भी
सरकार की तरफ से
दिया जा रहा है।

मंगलवार, 15 मई 2012

कार्टून और लंगोट

विधान सभा लोक सभा में
चर्चा अभी अगर नहीं कराओगे
लिखने लिखाने कार्टून बनाने
के कुछ नियम नहीं बनाओगे
संविधान का कार्टून अब भी
कुछ बंदरों से नहीं बनवाओगे
भारत देश की नागरिकता से
कभी भी हाथ धुला पाओगे
किसी पर भी कार्टून बनाओगे
आज नहीं फंसोगे पचास साल
बाद ही सही फंसा दिये जाओगे
जिंदा रहे तो टांक दिये जाओगे
मर खप गये तो किसी जिंदे
आदमी का जनाजा निकलवाओगे
कार्टून छोड़ो मुस्कुराने पर भी
सवाल जवाब होता देख पाओगे
सबके लिये बुरके जालीदार
सिलवाते ही रह जाओगे
अपने अपने कार्टून बनाओगे
अपने ही गले में लटकाओगे
ईश्वर को मंदिर से अगर भगाओगे
आदमी को ईश्वर मान जाओगे
शायद अपनी लंगोट बचा पाओगे
नंगे होने से पक्का बच जाओगे।

सोमवार, 14 मई 2012

दिखता है आतंकवाद

बम फोड़ना मकान उड़ाना
निरीह लोगों की हत्या
यूँ ही करते चले जाना
आतंक फैलाना फिर
आतंकवादी कहलाना
खबर में छा जाना
पकड़े जाना जेल चले जाना
दिखता है हो रहा है
दिखाता है होगा
आगे भी अभी और कुछ
देश कर सकता है तैयार
रक्षा रणनीति और हथियार
बिना रीढ़ की हड्डी
अपने ही घर की टिड्डी
उतरी हुई है मैदान मैं
उतार के अपनी चड्डी
हल्ला खूब मचाती है
लोगों को बताती है
आतंकवादियों से देश
को बचा लो बचा लो की
डुगडुगी रोज बजाती है
खूबसूरत रंगीन पंख फैलाती है
सुंदर नाच भी दिखाती है
ध्यान बंटाती है
अंदर ही अंदर अपने
पैरों के नाखूनों से देश की
नींव खुरचती जाती है
अपने जैसी सोच के लोगों
को इकट्ठा इस तरह
करती चली जाती है
एक भी गोली नहीं चलाती
किसी को बम से नहीं उड़ाती
बिना रीढ़ की हड्डी के
बाकी लोग माला ले आते हैं
टिड्डी को पहनाते हैं
जयजयकार के साथ
कंधे पर बैठा के जुलूस
उसका बनाते हैं
इसी सब में देश की
नींव दरकती जा रही है
सबको नींद आ रही है
आतंकवादी तो जेल में
बाँसुरी बजा रहा है
टिड्डा अपने भाई बहनों के
साथ सबका ध्यान बटा रहा है
कुछ नहीं दिखता है कि
कुछ कहीं हो रहा है
ना दिखाता है कुछ होगा
देश कैसे कर सकता है तैयार
रक्षा रणनीति और हथियार।

रविवार, 13 मई 2012

हैप्पी मदर्स डे

गाय भी माता
कहलाती है
सूखी हरी
जैसी भी
मिले घास
खा ही जाती है
दूध कीनदियाँ
बहाती है
दूध देना
बंद करती है
तुरंत कसाई
को बेची जाती है
कुछ नहीं कहती है
चुपचाप चली जाती है
इसी तरह
कई प्रकार की
माँऎं संसार में
पायी जाती हैं
जिस में भी
ममता हो कुछ
माँ का प्रतिरूप
हो जाती हैं
माँ की ही तरह
जानी जाती हैं
कौन सी माँ
किसी के द्वारा
ज्यादा भाव
पाती हैं वो तो
उसकी क्वालिटी
बताती है
धरती माँ है
देश भी माँ है
प्रकृति माँ है
ईश्वर भी माँ है
जननी देने
से कभी भी
घबराती नहीं है
लेने वाले को भी
दोहन करने में
शरम आती नहीं है
संपन्न होती है तो
आती जाती रहती है
नहीं होती है तो सबसे
नालायक पुत्र को
सौंप दी जाती है
कहीं नहीं भेजी
जाती है तो वृ्द्धाश्रम
पहुंचायी जाती है
माँ के भी
सपने होते हैं
वो ही तो सिर्फ
उसके अपने होते हैं
हमें पता होता है
माँ क्या चाहती है
हमारी बड़ी
मजबूरियां
उसके सपनो के
आढे़ आती हैं
माँ वाकई तेरे
सहने की क्षमता
दुनियाँ का आठवां
आश्चर्य हो जाती है
दुनिया तेरह मई को
मदर्स डे मनाती है
तरह तरह के संदेश
इधर से उधर
करवाती है
एक दिन के लिये माँ
किसी किसी को याद
आ ही जाती है
माँ के लिये
तो हर दिन
एक खास
दिन हो जाता है
जननी को कुछ
तो जनना है
ये बस उसे
याद रह पाता है
हर क्षण में
एक नयी रचना
वो रचती ही
चली जाती है
माँ आज तू नहीं है
हमें तेरी बहुत ही
याद आती है ।

शनिवार, 12 मई 2012

जा एक करोड़ का होजा

बीबी बच्चों का
भविष्य बना
एक करोड़ का
तू बीमा करा

इधर अफसर
तीन सौ करोड़
घर के अन्दर
छिपा रहा है

उधर उसका
अर्दली
दस करोड़
के साथ
पकड़ा
जा रहा है

तू कभी
कुछ नहीं
खा पायेगा

बस सपने
ही देखता
रह जायेगा

अपने पास
ना सही
किसी के पास
एक करोड़
इस तरह तो ला
एक करोड़ का
सपना तू होजा

चल सोच मत
किश्त जमा
कर के आ

अभी करायेगा
कम किश्त में
हो जायेगा

बूढ़ा हो जायेगा
किश्त देने में
ही मर जायेगा

आज करा
अभी करा
एक करोड़
की पेटी होजा

दो रोटी
कम खा
बीमा
जरूर करा

बीमा
करते ही
अनमोल
हो जायेगा
किसी के
चेहरे पर
रौनक
ले आयेगा

तेरे जीने
की ना सही
मरने की
दुआ करने
कोई ना कोई
अब मंदिर की
तरफ जायेगा

किसी की
मौत पर
रोना शुरु हो
जाते हैं लोग
तू पैदा हुआ
खुश हुवे
थे लोग

मरेगा
तब भी
हर कोई
मुस्कुरायेगा
चल सोचना
बंद कर

तीन सौ
का नहीं
बस एक
करोड़ का
ही सही

करा
जल्दी करा
साठ पर करा
और सत्तर पर
पार होजा पर
बीमा एक करोड़
का जरूर करा।

शुक्रवार, 11 मई 2012

धैर्य मित्र धैर्य

आज प्रात:उठने
से ही विचार
आ रहा था
श्रीमती जी पर
कुछ लिखने का
दिल चाह रहा था
सोच बैठा पूरे दिन
इधर उधर कहीं
भी नहीं देखूंगा
कुछ अच्छा सा
उन पर लिख कर
शाम को दे दूंगा
घर से विद्यालय तक
अच्छी बातें सोचता रहा
कूड़ा दिखा भी तो
उसमें बस फूल
ही ढूंढता रहा
पर कौए की
किस्मत मे कहां
मोर का पंख आता है
वैसे लगा भी ले अगर
तो वह मोर
नहीं हो जाता है
कितना भी सीधा
देखने की कोशिश करे
भैंगे को किनारे में
हो रहा सब नजर
आ ही जाता है
उधर मेरा एक साथी
रोता हुआ सा कहीं
से आ रहा था
एक महिला साथी से
बुरी तरह डांट
उसने अभी अभी
खायी है सबको
आके बता रहा था
ऎसा पता चला
कि महिला को
महिला पर ही
गुस्सा आ रहा था
मेरे को तो भाई जी
पर बहुत तरस
आ रहा था
इसी उधेड़बुन में
घर वापस आया
तो श्रीमती जी 
मैने अपनी भुलायी
कलम निकाली मगर
श्रीमती तो दूर दूर
तक कहीं भी
नजर नहीं आयी
दिमाग ने बस एक
निरीह मित्र को
किसी से मार
खाते हुवे जैसी
छवि एक दिखाई
योजना आज की
मैंने खटाई में डुबायी
कोई बात नहीं
कुम्भ जो क्या है
फिर कभी मना लूंगा
अपनी ही है श्रीमती
उसपर कविता एक
किसी और दिन
चलो बना लूंगा।

गुरुवार, 10 मई 2012

आभा मण्डल

चार लोगों से
कहलवाकर
अपने लिये
अलग कुर्सी
एक चाँदी
की लगवाकर

सब्जी लेने
हुँडाई में जाकर
कपड़ो में सितारे
टंकवाकर

कोशिश होती है
अपना एक
आभा मण्डल
बनाने की

अब
आभा मण्डल हो
या
प्रभा मण्डल हो
या
कुछ और
यूँ ही अच्छी
शक्लो सूरत
से ही थोड़े ना
पाया जाता है

कुछ लोग
अच्छे
दिखते नहीं 
हैं
पर चुंबक सा
सबको अपनी
ओर  खींचते
चले जाते 
हैंं

पहनते कुछ
खास भी नहीं 
हैं
और हरी सब्जी
वो खाते 
हैं

चुपचाप रहते हैंं
और
बस थोड़ा थोड़ा
मुस्कुराते 
हैं 

लोग बस यूँ ही
उनके दीवाने
पता नहीं क्यों
हो जाते 
हैं 

बहुत कड़ी
मेहनत करके
अपने कर्मों
का कुछ भी
हिसाब
ना धर के
चमकने वाले
एक व्यक्तित्व
का मुकाबला
जब हम नहीं
कहीं भी
कर   पाते 
हैं

तो यू हीं
खिसियाते 
हैं 

मदारी
की तरह
किसी
भी तरह
की डुगडुगी
बजाना शुरू 
हो जाते 
हैं

एक बड़ी
भीड़ का घेरा
अपने चारों
ओर  बनाते 
हैं 

आभा मण्डल
की रोशनी
से पीछा
छुड़ाते 
हैं

कुछ देर के
लिये ही सही
शुतुरमुर्ग की
तरह गर्दन
रेत के अंदर 
 घुसाते 
हैं ।

बुधवार, 9 मई 2012

गैंग

सभ्य एवम
पढे़ लिखे
कहलाये
जाने वाले
एक बड़े
समूह में
छितराये
हुए से
कुछ लोग
कहीं कहीं
साथ साथ से
हो जाते है
आपस में
बतियाते हैं
रोज मिल
पाते हैं
लोगों को
दिख जाते हैं
ऎसे ऎसे
कई झुरमुट
कुकुरमुत्ते
की तरह
जगह जगह
उगते चले
जाते हैं

अब
कुकुरमुत्ते
भी तो
माहौल के
हिसाब से
ही पनप
पाते हैं
कुछ ही
कुकुरमुत्ते
मशरूम
की श्रेणी
में आते है
सँयमित
तरीके से
जब उगाये
जाते हैं
तभी तो
खाने में
प्रयोग में
लाये जाते हैंं

कभी कभी
जब इधर के
कुछ लोग
उधर के
लोगों में
चले जाते हैं
बातों बातों
में फिसल
जाते है
सामने वाले
से उसके
समूह को
गैंग कह
कर बुलाते हैं
उस समय
हम समझ
नहीं पाते हैं
कि
वो उन्हे
गिरोह
कह रहे हैं
टोली
कह रहे हैं
दल
कह रहे हैं
या
मँडली
कह रहे हैं
संग गण
वृन्द मजदूर
गुलाम भी
तो गैंग के
रूप के रूप
में कहीं कहीं
प्रयोग किये
जाते हैं

अच्छा
रहने दो
अब
बातो को
हम लम्बा
खींच कर
नहीं ले
जाते है
मुद्दे पर
आते हैं

भले लोग
बात करने
में अपनी
मानसिकता
का परिचय
जरूर
दे जाते हैं
बता जाते हैं
सभ्य एवम
पढे़ लिखे
लोग
सही समय
पर सही
शब्द ही
प्रयोग में
लाते हैं।

मंगलवार, 8 मई 2012

अज्ञानता और परमानंद

"ये विद्वांसा न कवय:"
का अर्थ
जब गूगल
में नहीं
ढूंढ पाया

कहने वाले
विद्वान का
द्वार तब
जा कर
खटखटाया

विद्वान
और कवि
दोनो का
भिन्न भिन्न
प्रतिभायें
होना पाया

कुछ
कसमसाया
दूर दूर तक
एक को भी
अभी तक
नहीं कहीं
छू पाया

कल रात
का सपना
सोच
घर पर
छोड़ आया

आज 
एक गुरु
ने जब
इन्कम
टैक्स का
हिसाब
कुछ लगाया

अचानक
सामने बैठी
महिला से
उसके वेतन
में लगने
वाला
डी ऎ
कितना है
पुछवाया

महिला ने
नहीं मालूम है
करके अपना
सिर जब
जोर से
हिलाया

गुरू जी ने
थोड़ा सा
मुस्कुराया

'इग्नोरेंस इज ब्लिस'
कह कर
फिर ठहाका
लगाया

गूगल
का पन्ना
फिर से
जब एक
बार और
खुलवाया

अज्ञानता
परमानंद है
का अनुवाद
वहाँ पर 
लिखा पाया

कल का
सपना
फिर से याद
जरा जरा
साआया

परमानंद
अभी बचा है
मेरे पास
सोच कर
'उलूक' ने
अपनी पीठ
को फिर से
खुद ही
थपथपाया।

**********


रविकर फैजाबादी
की टिप्पणी
भी देखिये

विज्ञानी सबसे दुखी, कुढ़ता सारी रात ।
हजम नहीं कर पा रहा, वह उल्लू की बात ।
वह उल्लू की बात, असलियत सब बेपर्दा ।
है उल्लू अलमस्त, दिमागी झाडे गर्दा ।
आनंदित अज्ञान, बहे ज्यों निर्मल पानी ।
बुद्धिमान इंसान, ख़ुशी ढूंढे विज्ञानी ।।

****************************

सोमवार, 7 मई 2012

श्रंगार रस सौंदर्य बोध और कबाड़ी

सौंदर्य
बोध होना
और
श्रंगार
रस लेना

जिसको
आता है
वो उसी
रास्ते पर
चलता चला
जाता है

कबाड़ी का
सौंदर्य बोध
तो कबाड़
होता है
कहीं भी
पड़ा रहे
कबाड़ी
के लिये
बस वो
ही तो
श्रंगार
होता है

कबाड़ी
जब कहीं
से कबाड़
उठाता है
घर आंगन
रास्ते शहर
को साफ
कर ले
जाता है

शाबाशी
ना किसी से
वो कभी
चाहता है
ना ही
शाबाशी की
टिप्प्णी
ईनाम में
कहीं पा
पाता है

कबाड़
उठाने
और
ठिकाने
लगाने तक
भी सब
ठीक है

मजा तो
तब आता है
जब कबाड़ी
कविता लिखना
शुरू हो जाता है

सौंदर्य बोधी
श्रंगार रसियों
को हैरान
परेशान पाता है

पर उसे तो
बस कबाड़
में ही मजा
आता है

उठाता है
दिखाता है
कबाड़
पर रोज
कुछ
ना कुछ
लिख ले
जाता है

पर भंवरे
को तो बस 

फूल ही
नजर
आता है
वो फूल पर
मडराता है

कबाड़ी
सड़क के
किनारे
खड़ा 
खड़ा
थोड़ा थोड़ा
मुस्कुराता
चला जाता है।

रविवार, 6 मई 2012

बैठे ठाले उलूक चिंतन

रविवार को
उलूक चिंतन
कुछ ढीला
पढ़ जाता है

लिखने के लिये
कुछ भी नया
आसपास जब
नहीं ढूँढा जाता है

घर पर बैठे ठाले
अगर कुछ
कोई लिखना
भी चाहता है

परिणाम के
रूप में झाड़ू
अपने सामने
से पाता है

अपनी
कमजोरियों
को दिखाना
भी कहाँ अच्छा
माना जाता है

हर कोई
अपनी छुरी को
तलवार ही
बताना चाहता है

दो काम हों
करने अगर
अच्छा काम
पहले करने को
हमेशा से
कहा जाता है

पर ऎसा
कहाँ किसी से
हर समय
हो पाता है

रावण भी
तो स्वर्ग तक
सीढ़ियाँ नहीं
बना पाता है

पहले सीता
मैया जी को
हरने के लिये
चला जाता है

पुरुस्कार
के रूप में
रामचन्द्र जी
के हाथों मार
दिया जाता है

उलूक भी
इसीलिये
सोच में कुछ
पड़ जाता है

सब्जी
बाजार से
लाने से पहले
चौका बरतन
झाड़ू पौछा
करने को चला
ही जाता है

कभी कभी
बुद्धिमानी कर
मार खाने से
बच जाता है ।

शनिवार, 5 मई 2012

चोर ना ना कामचोर

बहाने के ऊपर
जब बहाने
को चढ़ाते हैं
बहाने का समुंदर
कब वो लबालब
भर ले जाते हैं
पता कुछ कहाँ
कोई कर पाते हैं
अंदाज उस समय
ही आ पाता है
जब बहानेबाज
के जाने के बाद
हर कोई अपने को
बहाने में बहा
हुआ पाता है
ठगा सा
रह जाता है
बहाने बनाते बनाते
कुछ बहानेबाज
इतना भावुक
हो जाते हैं कि
सामने वाले
की आँखों
में आंसूँ भर
ही आते हैं
बहाने कितनी
आसानी से
किस समय
सच्चाई में
ढाल ले जाते हैंं
कितने
कलाकार हैं
उस समय
बताते है
हम देखते
रह जाते हैं
भावावेग प्रबल
हो जाता है
हर बहाना
सामने वाले
की समझ
में आता है
वो बेवकूफ
की तरह
ये दिखाता है
बहाना बनाया
तो जा रहा है
पर उसकी
समझ में
बिलकुल भी
नहीं आ रहा है
इसी तरह बहाना
बनाया जाता है
फिर भी
अन्जाने में वो
बहाना कब
सामने वाले को
बहा ले जाता है
अन्दाज ही नहीं
कोई लगा पाता है
मालूम रहता है 
वो जब भी आता है
बहाना बनाता है
बहुत अच्छा बनाता है।

शुक्रवार, 4 मई 2012

अर्जीनवीस

कैसे कैसे
पढे़ लिखे
बेवकूफ यहाँ
पाये जाते हैं
बात बात पर
प्रार्थना पत्र 
एक लिखवाये
जाते हैं
परास्नातक
परीक्षा देने
के लिये जब
आये हो
पार्थना पत्र
लिखना भी
अब तक सीख
नहीं पाये हो
कह कह कर
आंखें हमें
दिखाये
चले जाते हैं
अब आप
ही बताईये
कुछ तरस
हम लोगों
पर भी
तो खाइये
इतिहास
भूगोल की
परीक्षा में
प्रार्थना पत्र
लिखो कहाँ
कहा जाता है
कक्षाओं में
विषय पढ़ाने
के लिये ही
जब कोई
नहीं आता है 
प्रार्थना पत्र
कि कोचिंग
लेने थोड़े
कोई जाता है
न्यायालय के
वकील भी
तो स्नातक होते हैं
प्रार्थना पत्र
लिखवाने के लिये
आसपास
अर्जीनवीस होते है
आप भी कुछ
लोगों को
प्रार्थना पत्र
लिखना क्यों
नहीं सिखलाते हो
परीक्षा केन्द्रों में
उन्हे लाकर क्यों
नहीं बैठाते हो
रोजगार के
अवसर इसी बहाने
कुछ लोग
यहाँ पा जायेंगे
हम लोग भी
आप लोगों की
किच किच
से बच जायेंगे
हो सके तो
कुछ नोटरी भी
आप बैठा सकते हो
मुहर भी उनसे
प्रार्थनापत्रों में
लगवा सकते हो
उसपर लगने
वाली फीस भी
निर्धारित
कर लीजियेगा
अपने कुछ लोगों
को 
नोटरी की सीट 
दिलवा दीजियेगा
कुछ हिस्सा
फीस का
अपनी चाय
पानी के लिये
कभी कभी
इसी बहाने 
उठा भी
लीजियेगा।

गुरुवार, 3 मई 2012

इनविजिलेटर

शब्दकोष
विजिलेंट
का अर्थ
जागरूक
बताता है
महिलाओं
को परीक्षा
काल में
अच्छा निरीक्षक
माना जाता है
नकल करता
हुआ विद्यार्थी
इनके द्वारा
तुरंत पकड़
लिया जाता है
एक नकलची
विवाह हेतु
वधू की तलाश
में जब गया
लड़की शिक्षिका
है उसे वहाँ
पहुंच कर
पता लगा
पूछ बैठा
बेचारा
कितने
नकलचियों
को उसने
नकल करते
हुए पकड़वाया
कितनों का
निष्कासन कर
विद्यालय से
बाहर निकलवाया
लड़की मुस्कुराई
और बोली
मेरी नजर से
कोई नहीं
बच पाता है
नकलची कितना
भी शातिर हो
मेरे सामने नकल
नहीं कर पाता है
लड़का तो
पहले से ही
दूध से जला
बैठा था
छाँछ भी
फूँक फूँक
कर पीता था
सुनते ही
ये बात
उल्टे पैर
लौट कर आया
घर पहुँच कर
अपनी माँ को
उसने बताया
माँ इस लड़की से
शादी नहीं
कर पाऊँगा
नकल पकड़ती है
मैं तो रोज
ही धर
लिया जाऊँगा
स्कूल में
रोज नकल
पकड़वाती
हो जो
उसको दुल्हन
बना के
कैसे मैं घर
ला पाऊँगा
बीबी ला रहा हूँ
वैसे ही
घबरा रहा हूँ
दो आँख
वाली होती
तो भी चला
ही लेता
किसी तरह
इस लड़की
के पास
तो मैं
बारह आँख
देख कर
आ रहा हूँ
शादी करने
की हिम्मत
नहीं कर
पा रहा हूँ ।

बुधवार, 2 मई 2012

सरकार का आईना

उन्होंने
जैसे ही
एक बात
उछाली

मैंने तुरन्त
अपने मन
की जेब
में सम्भाली

घर आकर
चार लाईन
लिख
ही डाली

कह रहे थे
जोर लगाकर

किसी
राज्य की
सरकार का
चेहरा देखना
हो अगर 

उस राज्य के
विश्वविद्यालय 
पर सरसरी
नजर डालो

कैसी चल
रही है सरकार
तुरत फुरत में
पता लगालो

वाह जी
क्या इंडीकेटर
ढूंढ के चाचा
जी लाये हैं

अपनी पोल
पट्टी खुद ही
खोलने का
जुगाड़
बनाये हैं

मेरी समझ
में भी बहुत
दिनों से
ये नहीं
आ रहा था

हर रिटायर
होने वाला
शख्स
कोर्ट जा जा
कर स्टे
क्यों ले
आ रहा था

अरे
जब बूढ़े
से बूढ़ा
सरकार में
मंत्री हो
जा रहा था

इतने
बड़े राज्य
का बेड़ा गर्क
करने में
बिल्कुल भी
नहीं शरमा
रहा था

तो
मास्टर जी
ने 
किसी
का 
क्या 
बिगाड़ा था

क्यों
उनको साठ
साल होते ही
घर चले जाओ
का आदेश दिया
जा रहा था

काम धाम के
सपने
खाली पीली
जब राजधानी
में जा कर
सरकार जनता
को दिखाती है

उसी तरह
विश्विद्यालय
की गाड़ी
भी तो
खरामे खरामे
बुद्धि का
गोबर बनाती है

जो कहीं
नहीं हो
सकता है
उसे करने की
स्वतंत्रता भी
यहाँ आसानी से
मिल जाती है

बहुत सी
बाते तो
यहाँ कहने
की मेरी भी
हिम्मत नहीं
हो पाती है

सुप्रीम कोर्ट
भी केवल
बुद्धिजीवियों
के झांसे
में ही आ
पाती है

वाकई में
सरकार का
असली चेहरा
तो हमें
ये ही
दिखाती है।

मंगलवार, 1 मई 2012

"चर्चा जारी है"

बहुत वाद
विवाद
के बाद
कुछ निकल
कर के आया

एक वक्ता
ने बताया

बंदरों की
शक्लों में
समय
के साथ

किस
तरह का
परिवर्तन
है आया

शहर में
आजकल
हर मुहल्ले
के बंदर
अलग अलग
सूरतों के
नजर आ रहे हैं

आदतों में भी
किसी मुहल्ले
वासी से मेल
नहीं खा रहे हैं

जबकि
देखा गया है
अफ्रीका के
बंदर अफ्रीकी

योरोप के
बंदर यूरोपी

भारत के बंदर
भारतीय
जैसे ही
दिखाई
दिया करते हैं

जैसा जनता
करती है
वैसा ही
वहां के
बंदर भी
ज्यादातर
किया करते हैं

कोई
ठोस उत्तर
जब कोई
नहीं दे पाया

तो इस विषय
को अगली
संगोष्ठी में
उठाया जायेगा
करके
किसी ने बताया

वैसे भी
इस बार
थोड़ी
जल्दीबाजी
के कारण

बंदरों का
प्रतिनिधि
शरीक
नहीं हो पाया

बंदरों की
तरफ से
कोई जवाब
किसी ने भी
दाखिल
नहीं कराया।

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